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कंगना रानावत के साक्षात्कार के बाद इंडस्ट्रीज में बवाल

शनिवार 2 सितंबर को एक टीवी चैनल की अदालत में कंगना रानावत के साक्षात्कार के बाद फिल्म इंडस्ट्रीज के तमाम मठाधीशों को बवासीर की बीमारी हो गई है।जब यह साक्षात्कार खत्म हुआ तो इंडस्ट्रीज के तमाम निर्माता-निर्देशकों के सिर सिरे से घूमे हुए थे। रात कुछ बड़े निर्माता व स्वंयभु पनवेल के एक फार्म हाउस पर पार्टी कर रहे थे। इस पार्टी में बेशक मैं नहीं था लेकिन मेरे एक डिस्ट्रीब्यूटर दोस्त जरूर थे। उनका देर रात फोन आया कि तुमने क्या क॔गना का साक्षात्कार देखा? मैंने कहा -“हाॅ देखा…. इंडस्ट्रीज के सफेदपोश मठाधीशों के कपड़े उतारे हैं कंगना ने।” डिस्ट्रीब्यूटर मित्र बोले मैं तो नहीं देख पाया। मैं रास्ते में था। जब तक पार्टी में पहुँचता कंगना का साक्षात्कार खत्म हो चुका था। ….जब पहुँचा तो पार्टी में लोगों की लाल हुई पड़ी थी।

दरअसल कंगना ने फिल्म इंडस्ट्रीज में सक्रिय उस बड़े गिरोह पर हल्ला बोला है जिस पर बोलने की कोई हिम्मत नहीं करता है। चंद फिल्मी दुनिया के परंपरागत लोगों ने 90% फिल्म इंडस्ट्री पर पाक अधिकृत कश्मीर की तरह कब्जा कर रखा है। लाखों लड़के-लडकियां….कलाकार, राइटर, डायरेक्टर …बनने का सपना पाले हुए मुंबई पहुंचते हैं और पूरी जिंदगी वहीं खत्म कर देते हैं। बहुत कम लोगों को नसीरूद्दीन शाह, ओम पुरी, अमरीशपुरी, इरफान खान, नवाजुद्दीन या प्रसून जोशी बनने का मौका मिलता है। वरना 90% हिस्सेदारी फिल्मी दुनिया के उन घरानों की है जो यह मानकर चलते हैं कि मां के गर्भ के वो “अभीमन्यु” हैं । शक्ल नहीं है लेकिन हीरो हैं, हिंदी बोलना-लिखना नहीं आता लेकिन राइटर हैं …..छोटे-छोटे शहरों से गई प्रतिभाओं के साथ क्या होता है जरा फिल्म राइटर्स एसोसिएशन या प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के ऑफिस में चल रहे समझौतों या मुकदमों की फेहरिस्त पर नजर डाल लें ।

एक बहुत बड़ा प्रोडेक्शन हाउस है उसके बहुत “यशस्वी” मालिक व निर्माता-निर्देशक थे, अब ऊपर जा चुके हैं ….वो तमाम राइटर्स को बुलाते थे….कहानी व गाने सुनते थे…फिर कहा करते थे कहानी पसंद नहीं आई। बाद मे पता चलता था नरेट की हुई कहानी में बदलाव करके फिल्म बन गई । लिरिक राइटर से मुखडा ही सुनते थे और उसको चलता करते थे….बाद में गाना तैयार । उत्तर प्रदेश में यशभारती टाइप पुरस्कार प्राप्त एक बहुत नामी-गिरामी लिरिक्स राइटर हैं ……साहब ने ऑफिस में तमाम लिरिक्स राइटर रख रखें हैं । च॔द हजार रूपए टपका कर पूरा गाना अपने नाम…दरअसल ये इंडस्ट्री बौद्धिक चोरों व प्रतिभा चोरों के संगठित गिरोह के कब्जे में है । जिनको मौका मिला उन्हें दरअसल अपने माता-पिता के आशीष व ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए । कंगना ने दरअसल इसी गिरोह के अंडकोष पर हमला किया है। इसलिए गिरोह दर्द से बिलबिला उठा है। मीडिया पोषित व पल्लवित ये वह गिरोह है जो दारू चढ़ता और सिगरेट के कश मारता चार अंग्रेजी या विभिन्न विदेशी भाषाओं की अंग्रेजी में डब फिल्में देखता है और हिंदी में चेप देता है।

हालात यह हो चले हैं कि दक्षिण भारत की फिल्मों की री-मेक पर आ गिरे हैं । करन जौहर, राकेश रौशन, यमराज ग्रुप, केतन मेहता, श्रृतिक रोशन को लेकर कंगना ने क्या गलत कहा। कंगना से मैं दो बार मिला…..वहां बिंदास और अपनी मर्जी व अपनी मस्ती में जीने वाली लड़की है…..सेल्फ मेड…..कोई गाॅड फादर नहीं । जो भी इस स्थापित गिरोह से बाहर का है वह रोज संघर्ष करता है। इस गिरोह का औरा ये है कि अव्वल तो तमाम फाइनेंस इनकी जेब में होते हैं या ये इतने सक्षम हैं कि आधा पैसा या पूरा फाइनेंस खुद ही कर लेते हैं । अच्छी स्क्रिप्ट लेकर गिरोह से बाहर का डाॅयरेक्टर सालों- साल फाइनेंस तलाशता रहता है। अब गर उसने फिल्म बना भी ली तो रिलीज करने में वो रो देता है। …….बहुत ही निर्मम और स्वार्थी है हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ……ये जितनी चकाचौंध भरी है दरअसल उतनी ही खोखली है। ईगो के गड्ढे नहीं खांईयां लेकर लोग टहल रहे हैं । रियल्टी शो का सच व दर्द फिर कभी…..दुख होता है जब बच्चे और होनहार युवा इस तिलिस्म में फंसकर अपने भविष्य को नष्ट कर लेता है……बाकी फिर कभी…… धन्यवाद कंगना आईना दिखाने के लिए ….

(पवन सिंह)
वरिष्ठ पत्रकार/ लेखक
यूपी

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