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पुलिस की ‘सरपरस्ती’ में आरोपी कर रहे ‘मौजमस्ती’

अमेठी: अमेठी के महोना निवासी पत्रकार राजीव ओझा के ऊपर जानलेवा हमला करने के आरोपी खुले आम घूम रहे हैं और पुलिस गिरफ्तारी में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। जिससे अभियुक्तो का मनोबल बढ़ता जा रहा है। वहीं पत्रकार के परिजन भयभीत व सहमे हुए हैं। आए दिन आरोपियो के द्वारा केश उठा लेने की घमकी भी दी जा रही है। घटना हुए लगभग 1 माह से ज्यादा बीतने को है गिरफ्तारी के नाम पर शुकुल बाजार पुलिस केवल खानापूर्ति कर रही हैं। जिससे पत्रकार व उनके परिजनों का प्रशासन से विश्वास उठता जा रहा है।

इस संबंध मे पत्रकार राजीव ओझा ने जनपद के पत्रकारो के साथ पुलिस अधीक्षक अमेठी से मिलकर अभियुक्तों पर कार्रवाई करने के साथ गिरफ्तारी की मांग की है दरअसल पत्रकार राजीव ओझा पर ये हमला 04 जनवरी 2017 को तब हुआ जब एक वह शुकुल बाजार थाना अंतर्गत महोना में घटी एक दर्दनानक वारदात को कवर करने के लिए मौके पर गये थे नामजद आरोपियो ने पत्रकार को मार डालने की नीयत से हमलाकर करके पत्रकार की इंडिगो कार सहित मीडिया-उपकरणों को भी आग के हवाले कर दिया था पत्रकार राजीव ओझा पर हुए हमले बाद जनपद के पत्रकारों में भारी रोष व्याप्त हो गया जिसके चलते पुलिस को हमले के चार आरोपियों के खिलाफ 307,504,435,सहित कई अन्य धाराओं में मुकदमा लिखना पडा लेकिन हैरानी की बात यह कि शुकुल बाजार पुलिस ने केस करने के बाद अभी तक कोई अग्रेतर कार्रवाई नहीं की गई।

आरोप यह भी है कि शुकुल बाज़ार पुलिस विपक्षीगण से मिली है। चूँकि विपक्षीगण सरहंग और दबंग किस्म रसूखदार है,जो आए दिन गांव में घुमा करते हैं,साथ ही केश उठा लेने की धमकी देते फिरते हैं। कहते हैं कि अगर केश नहीं उठाओगे तो सभी को जान से मार देंगे। वही पुलिस अधीक्षक अमेठी उचित कार्यवाही करने की बात कह रहे है ।

पत्रकारिता अगर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है तो पत्रकार इसका एक सजग प्रहरी है। देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पत्रकारिता आज़ादी के बाद भी अलग-अलग परिदृश्यों में अपनी सार्थक जिम्मदारियों को निभा रही है। लेकिन मौजूदा दौर में पत्रकारिता दिनोंदिन मुश्किल बनती जा रही है। जैसे-जैसे समाज में अत्याचार, भ्रष्टाचार, दुराचार और अपराध बढ़ रहा है, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।

पत्रकारों से मारपीट, अपहरण और हत्याओं की पृष्ठभूमि की एक मात्र मंशा मीडिया की आवाज को दबाना है सवाल उठना लाज़िमी है कि पत्रकारों के प्रति जिस तरह से हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, कहीं वो लोकतंत्र में असहमति और आलोचना की घटती जगह का सबूत तो नहीं। इन सभी मामलों में जो बातें सामने आई हैं वो ये कि हत्या और हमले का आरोप नेताओं, बाहुबलियों और पुलिस पर समान रूप से लगा है। पत्रकार मुश्किल हालात में काम कर रहे हैं।और पुलिस-तंत्र पत्रकारों की सुरक्षा करने में नाकाम रहा है।

रिपोर्ट @राम मिश्रा 






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