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आखिर कांग्रेस इमरजेंसी की बातें क्यों भूल गई: जेटली

 jaitleymनई दिल्ली- राज्यसभा में संविधान दिवस पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस के खिलाफ जमकर निशाना साधा. जेटली ने असहिष्णुता पर हो-हंगामे को लेकर कांग्रेस को घेरते हुए पूछा कि इमरजेंसी की बात क्यों भूल गई कांग्रेस?

इंदिरा गांधी पर हमला बोलते हुए जेटली ने कहा कि आज असहिष्णुता को लेकर कांग्रेस हंगामा मचा रही है लेकिन इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गए इमरजेंसी की बात क्यों भूल गई कांग्रेस? तब संविधान की धारा 21 को भी निलंबित कर दिया गया था. आज देश में ऐसा कोई माहौल नहीं है बल्कि जानबूझकर ऐसा दिखाने की कोशिश की जा रही है. जेटली ने कहा कि इसी तरह की कोशिशों के कारण पाकिस्तान समेत दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र हमेशा खतरे में रहा है।

बाबा साहब ने तैयार किया न्याय का रास्ता
जेटली ने संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने देश को एक सामाजिक दिशा दिखाई. बाबा साहब हमेशा सामाजिक बुराईयों से लड़ते रहे और सामाजिक न्याय का रास्ता तैयार किया।

संविधान निर्माता ही नहीं समाज सुधारक भी
अरुण जेटली ने कहा कि हम बाबा साहब को केवल संविधान निर्माता ही नहीं एक समाज सुधारक के रूप में भी देखते हैं. उन्होंने कहा कि बाबा साहब ने देश को मजबूत संविधान दिया जिसमें सबका प्रतिनिधित्व है. उन्होंने ने कहा कि हमारी पार्टी के प्रेरणा रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी संविधान सभा के सदस्य थे. उन्होंने भी देश को दिशा दिखाने में अहम भूमिका निभाई।

राज्यों में लागू होंगे एक जैसे टैक्स
वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने पहले ही जीएसटी में बदलाव की कांग्रेस पार्टी की मांग पर काम करना शुरू कर दिया है. इसके तहत राज्‍यों में लागू होने वाले एक दर्जन से ज्यादा टैक्सों को हटाकर एक जैसे टैक्स लागू किए जाएंगे।

वहीं, पूर्व वित्‍त मंत्री पी. चिदंबरम ने जेटली की टिप्‍पणी पर निशाना साधते हुए कहा कि वित्‍तमंत्री ने एसोचैम के कार्यक्रम में जो भाषण दिया है वह जीएसटी के मुद्दे पर विपक्ष से मिलने और सहमति बनाने का सही तरीका नहीं है. जीएसटी बिल को लेकर कांग्रेस का रुख अभी भी पूरी तरह साफ नहीं है. जबकि सरकार को बिल पास कराने के लिए दो तिहाई सांसदों का समर्थन चाहिए होगा।

जानकारी के मुताबिक, केंद्र सरकार जीएसटी बिल को अप्रैल 2016 से लागू करना चाहती है लेकिन यदि शीतकालीन सत्र में यह बिल पास नहीं हो पाया तो एक बार फिर सरकार को मशक्कत करनी पड़ेगी।

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