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आदिवासियों की मांग, हमें गुलाम घोषित करे सरकार

betul news Tribesmen demand government declared slave#बैतूल बैतूल में आज आदिवासियों ने अनोखा प्रदर्शन किया।। खुद को रस्स्सियो से बने एक घेरे में बंद कर और हाथो में हथकड़ियां बाँधकर। आदिवासियों ने सरकार से मांग की की वह उन्हें गुलाम घोषित कर दे।

आज़ादी का भ्रम खत्म करो| कानून और संविधान का राज नहीं कायम कर सकते, तो हम आदिवासीयों को गुलाम घोषित करो । यह मांग करते हुए आदिवासियों ने बैतूल के लल्ली चौक पर मौन रहकर प्रदर्शन किया और कलेक्टर को ज्ञापन सौपा। आदिवासियों के मुताबिक हम चिचोली ब्लाक के बोड और पीपल्बर्रा गाँव के आदिवासीयों इस आवेदन के जरिए आपसे यह निवेदन करते है कि आप हमें वापस गुलाम घोषित कर दे; और आजादी का भ्रम ख़त्म करो|

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जिले के अधिकारीयों ने अपनी मनमर्जी से खाकी वर्दी का गुंडा राज मचा रखे – जैसे हम उनके गुलाम है| वो न तो कानून को मानते है, और ना ही कोर्ट के आदेश को और ना सविधान को। हम गांधीजी के मार्ग पर चलने वाले है, इसलिए हम हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं देना चाहते| लेकिन, ऐसे में हम अपने आपको आज़ाद मानने का भ्रम भी नहीं पालना चाहते| इसलिए हमे वापस गुलाम घोषित कर दे|

आदिवासियों ने बताया की सबसे पहले 19 दिसम्बर 2015 को हमारे गाँव के के पास उमरडोह के जंगल में बसे 45 घरों की बस्ती पर आपके निर्देश में जिला प्रशासन की टीम ने ऐसा हमला कर पूरा गाँव जमीनदोस्त कर दिया; जैसे दुश्मन सेना ने हमला कर दिया हो| उसके बाद, हमने भर ठंड में बैतूल में आठ दिन-तक धरना दिया; उस धरने में वन अधिकार कानून के पालन की बात आपने मंजूर की| उस कानून में हमारे अधिकार तय होने तक हमें वन-भूमि से बेदखल करने से रोक है| लेकिन जब 1 जनवरी को वापस हम गाँव पहुंचे, तो वहां वन –विभाग और एस ऍफ़ के जवानों ने फिर हमारे घर तोड़े डाले ; फिर रोज हमारा खाना, बैलों का चारा फेंक देना और जलाऊ लकड़ी जला देना जारी रहा|

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हमने इस बारे में 6 जनवरी को आपको शिकायत भी की| और 20 जनवरी को हाईकोर्ट ने आदेश भी दिया कि आप हमारे इन सारे आवेदनों पर कार्यवाही कर आदेश पारित करे और वन-भूमि पर हमारे दावे वन अधिकार कानून, 2006 के तहत तय किए जाए| हमारे गाँव के सरपंचों ने भी आपको पत्र लिखा कि वन अधिकार कानून में जंगल पर ग्रामसभा का अधिकार है और आप हमारा यह अधिकार नहीं छीन सकते| लेकिन, आपके अधिकारी उसे नही मान रहे और हमारे सरपंच के को भी जेल और कार्यवाही का डर बता रहे है|

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इतना ही नहीं, 18 जनवरी को हमारे गाँव के भूता आदिवासी को वन-विभाग के अधिकारी उठाकर ले गए और 48 घंटे तक अवैध रूप से बंद रख कर मारा; और शिकायत करने पर 20 जनवरी की रात को छोड़ा|

अब जब सरकारी अधिकारी अंग्रेजों जैसे अपनी तानाशाही चला रहे है, और कानून या कोर्ट किसी को नहीं मानते है; हमारे लिए खाकी वर्दी में गुंडे बन गए है| हमारी ग्रामसभा जिसका अधिकार लोकसभा और राज्यसभा की तरह है, उसे नहीं मानते| हमसे गुलामों से बद्दतर व्यवहार कर रहे है, ऐसे में बेहतर होगा आप हमें अधिकारिक तौर पर फिर से गुलाम घोषित कर दे|

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ऐसा होने पर हम आदिवासी कम से काम इस भुलावे में तो नहीं जिएंगे कि इस आजाद देश में कानून, कोर्ट और सविंधान का राज है और सरकारी अधिकारी और कर्मचारी उनके अंग्रेजों की तरह मालिक नहीं बल्कि नौकर है| और एक बार गुलाम घोषित होने और आज़ादी के भ्रम से दूर होने पर हम हमारे पुरखों की तरह फिर से आजादी की लड़ाई लड़ेंगे । रिपोर्ट @ अकील अहमद अक्कू

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