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रंग – बिरंगी पतंगों पर न पड़े खूनी धब्बे !

kite-festivalमानसून के आगमन साथ त्यौहारों की शुरुआत भी हो चुकी हैं । मानसून के बाद 15 अगस्त , रक्षाबन्धन , जन्माष्टमी जैसें कई महत्वपूर्ण त्यौहार आने वाले हैं । त्यौहारों के इस आगमन के साथ आसमान में मानसून के बादल के साथ – साथ नई रंग – बिरंगी पतंगो की सौगात भी आएंगी । यूपी , बिहार में जुलाई ,अगस्त , सितम्बर और अक्टूबर इन चार महीनों में पूरा आसमान रोज शाम को रंगीन पंतगों से ठक जाता हैं । पतंगो का त्यौहार इन राज्यों में इसी मौसम में मनाया जाता हैं , जबकि गुजरात , महाराष्ट्र और देश के बाकी कोनों में पंतगों का त्यौहार जनवरी के महीनें में मनाया जाता हैं । उत्साह एंव उल्लास सें भरे इन त्यौहारों में जब पतंगों के कारण मौत की खबर आती हैं तो वें रंग में भंग पङने जैसी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं ।

बच्चों में पतंगों का उल्लास कुछ इस तरह का रहता हैं कि पेंच लङाकर सामनें वाले की पतंग काटने के लिए वें बिना कुछ सोचें सबसें तेज धार वाला पतंग का मांजा खरीदते हैं , इस बात सें अन्जान की यें मांजा उनके भी मौत का कारण बन सकता हैं । दुकानदार , पुलिस और कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए तेज धार वालें मांजे को बेचनें में लगे हैं जबकि कोर्ट नें सख्त आदेश दिया हैं कि बाजार में तेज धार वालें मांजे की बिक्री नही होनी चाहिए । पुलिस भी ठान कर बैठी हैं कि बिना कोर्ट के फटकार कें वें उसकें आदेश के पालन के लिए सख्ती नहीं दिखाएगी , तभी तो जब तक पुलिस कों कोर्ट सें तेजाब की सार्वाजनिक बिक्री पर रोक के लिए फटकार नहीं पङी तब तक पुलिस नें इस तरफ कोई बङा कदम नहीं उठाया। मांजे के मामलें में भी अब तक पुलिस शायद कोर्ट के फटकार का ही इन्तजार कर रहीं हैं ।

 तेज धार वाले मांजे के कारण जाने – अनजानें में कई बार गलें की नस कट जाने सें मौत की खबरें आनी अब सामान्य बात हो गयी हैं इसीलिए पुलिस अब इस खबर पर अपना ध्यान ही नहीं दे रहीं हैं। पुलिस की इस मामलें नें बेरुखी एकबार समझी भी जा सकती हैं पर अभिभावकों का इस गम्भीर मुद्दें पर ध्यान न देना समझ सें पङे लगता हैं । केवल पंतग खरीद देने भर अभिभावकों की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती हैं । उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे किस तरह के मांजे और किस तरह की पतंग का प्रयोग कर रहें हैं ? पतंगो के बाजार में पॉलिथिन की पंतगे भी आ रही हैं जो कागज की पतंगो की तुलना में बहुत सस्ती तो हैं पर पर्यावरण को बहुत बङा नुकसान पहुँचा रही हैं । कई बार पतंगबाजी के कारण झगङ इतना बढ जाता हैं कि पङोसी ही पङोसी की जान लेने को उतारु हो जाता हैं । पतंग कटनें सें बचाने के लिए बच्चों की भाग – दौङ में बच्चें कई बार छतों सें भी गिर जाते हैं लेकिन अगर इन छोटी – छोटी बातों पर अभिभावक एंव स्वय बच्चें भी ध्यान दे तों वें त्यौहार को अच्छें सें खुशियों के साथ मनानें के साथ अपना और अपने आस – पास वालों का जीवन भी बचा सकतें हैं । पतंगो के त्यौहार में जोश के साथ होश रखनें से न केवल जान बचाई जा सकती हैं बल्कि उम्र भी बढाई जा सकती हैं ।

अगर पॉलिथिन की पतंग की जगह कागज की पतंग का प्रयोग किया जाएं और मांजे की जगह सफेद धागा , जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में ‘ सद्दी ‘ बोला जाता हैं तो बाजार में मांग के अनुसार वस्तुओं में खुद बदलाव आ जाएंगा ।  हालांकि सद्दी मांजे की तुलना में कमजोर जरुर होती हैं और मांजे सें उङने वाली पतंग को भले न काट पाएं पर कम से कम ये किसी के जीवन की पतंग तो नहीं काटती हैं न । सद्दी के प्रयोग को बढाया जाना चाहिए और इसे मांजे के वैक्लिपक स्त्रोत के रुप में प्रयोग करना चाहिए । त्यौहारों की रंगत एंव खुशियों को बनाए रखने के लिए अभिभावक , पुलिस के साथ बच्चों को भी सहयोग करना चाहिए , जिससें सबके जीवन का आसमान रंग – बिरंगा रहें ।

लेखक :- सुप्रिया सिंह छप्परा बिहार

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