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हाई प्रोफाइल बनी खंडवा संसदीय सीट में करो या मरो का मुकाबला, होंगी मोदी-सिद्धू की सभाएं

खंडवा: भाजपा के उस प्रचार को झटका लगा है जिसमें वह किसानों के 2लाख रूपये के कर्ज माफी को लेकर कांग्रेस का झूठा वायदा बताकर अपने कद बढाने का प्रयास कर रही थी लेकिन चुनाव आयोग द्वारा सशर्त कर्ज माफी योजना को दी गयी आचार संहिता से छूट के बाद अब भाजपा के पास मोदी का ही सहारा रह गया है और इसके लिये उनकी सभा कराने के लिये ताकत लगाई गयी है। भाजपा के भरोसमंद सूत्रो के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा 16 मई को होगी जबकि सातवे व अंतिम चरण मे खडवा सीट के लिये मतदान 19 मई को होगा।यह सभा ब्लाक मुख्यालय छैगांवमाखन  के तीगडडे पर होगी । पिछले लोस चुनाव मे भी मोदी की सभा इसी स्थान पर हुई थी। 16 मई की तिथि लगभग तय बताई जा रही है। अधिकृत कार्यक्रम की प्रतीक्षा है।

खंडवा सीट पर मुकाबला कांटे का हैं ओर सीमीत वोटो में हार जीत का फैसला होने के आसार है। 8 विस क्षेत्र वाले खडवा सीट पर 5 सीटो पर कांग्रेस का कब्जा है। वही बांगी प्रत्याशी जयश्री ठाकुर के नाम वापस लेने से कांग्रेस की राह आसान हुई है। मतदान की तिथि नजदीक खडे होते जाने और दिन में 43 डिग्री से अधिक आग उगलता तापमान के आगे चुनावी फौजे भी पस्त नजर आ रह है। मुठठीभर समर्थकों के साथ कांग्रेस व भाजपा के प्रत्याशी जनसंपर्क व नुक्कड सभाओ का सिलसिला जारी रखे हुये जबकि मैदान के अन्य 11 उम्मीदवारों  का चुनाव प्रचार औपचचारिकता भरा ही है।

मध्यप्रदेश की हाई प्रोफाइल लोकसभा सीटों में शुमार खण्डवा कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमारसिंह चौहान  के लिए करो या मरो की अग्निपरीक्षा वाला साबित हो रहा है। कांग्रेस और भाजपा में अपनी-अपनी पार्टी के लिए निमाड़ की नैया बने यादव और चौहान  दोनों मतदाताओ के साथ-साथ अपनो की कसौटी पर कसे जा रहे हैं। कार्यकर्ताओं और टिकट के दावेदारों की सीधी नाराजगी ने दोनों के होश उड़ा दिए हैं। भितरघात की आशंका ने यादव व चौहान  के पसीने छुड़ा दिए हैं। दानों ही  दलो के स्थानीय कार्यकर्ता चेहरे बदलने की मांग को लेकर दबाब कायम किये हुये थे लेकिन आला स्तर पर नकार दिया गया । इससे भी मांग करने वाले हताश निराश है। भाजपा खेमा इस बार महादेवगढ मंदिर के प्रमुख व हिन्दू राष्ट्र सेना के अशोक पालीवाल से पटरी बैठाने में सफल रहे है। यहां तक हाल के विस चुनााव मे विद्रोही होकर चुनाव लडे कोशल मेहरा लोस चुनाव मे सक्रिय प्रचार बतौर अगुआई कर रहे है। महादेवगढ की सियासत से पटरी बैठाने के हुये कथित आंतरिक सुलह को लेकर एक वर्ग विशेष भाजपा से दूरी बना गया है।

फिलहाल दोनों दिग्गजों (अपनी अपनी पार्टी के रहे प्रदेश मुखिया) की संसदीय क्षेत्र में चुनाव पूर्व की लंबी निष्क्रियता और कार्यकर्ताओं से संवादहीनता का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। दोनों को अपनी निष्क्रियता के लिए लगातार सफाई देनी पड़ रही है। इस सीट का चुनावी नतीजा यादव व चौहान  की राजनैतिक यात्रा की दिशा व दशा भी तय करेगा इसमें राजनीति के जानकारों की दो राय नहीं है।

सुरेंद्रसिंह ठाकुर ने बाकायदा अरुण यादव का विरोध करते हुए पत्नी जयश्री ठाकुर का निर्दलीय की हैसियत से नामांकन दाखिल करा कर यादव की मुश्किलें बढ़ाई लेकिन जल्द ही बैंरग हो गये। शुरुआती डैमेज कंट्रोल होते ही मामला दिल्ली पहुंच गया इसके बाद मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को मौर्चा संभाल और नतीजा सुखद रहा। नामांकन पत्र वापसी के अंतिम दिन जयश्री ठाकुर ने अपना नाम वापस ले लिया।

उधर बुरहानपुर की दिग्गज भाजपा नेत्री अर्चना चिटनीस की लोकसभा क्षेत्र में सक्रियता से नंदकुमारसिंह चौहान  की राह आसान नही मानी जा रही है। विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के लिए चिटनीस समर्थक नंदकुमारसिंह चौहान  गुट को कटघरे में खड़े करते रहे हैं। कांग्रेस ने जिस तरह से सुरेंद्र सिंह ठाकुर को मनाया उस तरह का डैमेज कंट्रोलभाजपा में चिटनीस के मामले में दिखाई नही दिया है। इस मामले में फिलहाल चिटनीस और नंदकुमारसिंह चौहान दोनों गुट खुलकर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं।

प्रदेश अध्यक्ष रहते यादव और चौहान ने खण्डवा संसदीय क्षेत्र को हाई प्रोफाइल बना दिया है। इसके चलते कार्यकर्ताओं की उम्मीदें आसमान छूने लगी मगर हालात स्थानीय स्तर पर खजूर के पेड़  के समान रहे। इस अवधि में अरुण यादव और नंदकुमारसिंह चौहान  ने पट्टावाद की राजनीति की। अपने समर्थको को विभिन्न पदों से नवाजा जरूर लेकिन ये अपनी जमीन नही बना सके ।इसका खामियाजा चुनाव में अरुण यादव व नंदकुमारसिंह चौहान  दोनों के चुनाव प्रदर्शन पर देखा जा रहा है।इस मामले में अरुण यादव को तो खरगोन और कसरावद से बड़ी संख्या में अपने समर्थकों को खण्डवा संसदीय क्षेत्र में तैनात करना पड़ा है।

अरुण के छोटे भाई और प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री सचिन यादव के सीधे नेतृत्व में यह टीम महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रही है। इसके चलते स्थानीय नेता अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहे हैं । ग्रामीण क्षेत्र के कांग्रेस नेता इसके विरोध में मुखर है लेकिन शहरी नेता मौन रह कर वेट एंड वाच की रणनीति पर अमल कर रहे हैं।चुनावी समर में अरुण यादव और नंदकुमारसिंह चौहान  तीसरी बार आमने-सामने हैं। दोनों एक-एक बार चुनाव जीत चुके हैं इस लिहाज से इस बार दोनों के बीच निर्णायक मुकाबला माना जा रहा है।

नंदकुमारसिंह चौहान  सातवी बार चुनावी रण में होने से अरुण यादव से ज्यादा अनुभवी माने जा रहे हैं जबकि अरुण यादव की ताकत उनका मैनेजमेंट बताई जा रही है वैसे वे चैथी बार लोकसभा के चुनावी समर में उतरे हैं।

खरगोन से वे भाजपा के दिग्गज कृष्णमुरारी मोघे को चुनावी शिकस्त देकर सबके चैका चुके हैं। इसी तरह खरगौन से खण्डवा आ कर वे नंदकुमारसिंह चौहान  का विजयी रथ भी रोक चुके हैं ।खण्डवा लोकसभा क्षेत्र में मौसमी पारा 43 डिग्री के आसपास मंडरा रहा है। इसके साथ सियासी पारा रोज नई ऊंचाई तय कर रहा है। क्षेत्र में भीषण गर्मी और विवाह समारोहों के चलते मतदान को लेकर सियासी दलों की मुश्किलें बढ़ गई है।

भीषण गर्मी और विवाहों में मतदाताओं के व्यस्त रहने से चुनावी गणित गड़बड़ाने का खतरा खड़ा हो गया है इससे कांग्रेस व भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई है।

दोनों दल कार्यकर्ताओ को लगातार बूथ लेवल का प्रशिक्षण देकर अपनी नैया पार लगाने की जुगत में लगे हुए हैं। इस सीट पर यह तय माना जा रहा है कि जो जीत वो सिकंदर और जो हारा वह घर। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि खण्डवा संसदीय सीट से कौन होगा सिकंदर और कौन जाएगा घर, फिलहाल मुकाबला कांटे का है और ऊँट की करवट पर सभी की पैनी निगाह लगी हुई है।

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