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नोटबंदी: उत्सव नहीं तो पुण्यतिथि ही मना लेते ?

गत् 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित नोटबंदी के दो वर्ष पूरे हो गए। आशा थी कि अपनी मामूली सी भी उपलब्धि का डंका बजाने में माहिर भारतीय जनता पार्टी अपनी इस तथाकथित ‘महान उपलब्धि’ का जश्र ज़रूर मनाएगी। यह भी उ मीद थी कि सरकार की ओर से प्रधानमंत्री अथवा देश के वित्तमंत्री प्रत्येक वर्ष नोटबंदी के दिन जनता के समक्ष आकर अपनी इस महान उपलब्धि के माध्यम से अब तक देश को होने वाले आर्थिक लाभ तथा इससे संबंधित आर्थिक सुधार व प्रगति का ब्यौरा देते रहेंगे। परंतु नोटबंदी की घोषणा के बाद तो उन सभी नेताओं को गोया सांप सूंघ गया है जो तालियां बजा-बजा कर और छाती पीट-पीट कर नोटबंदी से देश व जनता को होने वाले लाभ का बखान किया करते थे। हद तो यह है कि भाजपा के संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं संघ ने भी कथित रूप से भाजपा के नेताओं को नोटबंदी की चर्चा जनता के मध्य करने से परहेज़ करने की सलाह दी थी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने जब 8 अक्तूबर 2016 को देर रात भारतीय मुद्रा में सबसे अधिक प्रचलित एक हज़ार व पांच सौ रुपये की नोट बंद करने की घोषणा करते हुए लगभग 16.99 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा को चलन से बाहर करने का फरमान जारी किया था उस समय प्रधानमंत्री ने इसके पीछे तीन मु य कारण बताए थे। एक तो यह कि नोटबंदी के इस कदम से काले धन पर रोक लगेगी। दूसरा कारण जाली मुद्रा को प्रचलन से बाहर करना बताया गया था तो तीसरी वजह आतंकवाद व नक्सलवाद पर काबू करना बताई गई थी।

देश को यह भी बखूबी याद होगा कि नोटबंदी की घोषणा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी सरकार द्वारा किस प्रकार नित्य नई गाईडलाईन जारी कर बैंक तथा जनता को रोज़ाना नए निर्देश दिए जाते थे। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि बैंक कर्मचारियों ने किस प्रकार अपनी जान पर खेलकर इस आपात स्थिति से निपटने में अपनी अभूतपूर्व कार्यक्षमता का प्रदर्शन किया। परंतु इन सबके बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों में लगभग 150 लोग नोटबंदी में उठाई जाने वाली परेशानियों के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। कभी प्रधानमंत्री ने जनता से एक महीने का समय मांगा तो कभी स्थिति सामान्य होने में 50 दिन की मोहलत मांगी। कभी स्वयं को चौराहे पर ले जाकर अपमानित करने जैसे घटिया वाक्य भी बोलने के लिए मजबूर हुए जोकि प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुरूप भी नहीं थे। अर्थशास्त्री इस बात को लेकर हैरान हैं कि यदि काला धन रोकने के लिए एक हज़ार व पांच सौ की नोट प्रचलन से बाहर की गई फिर आखिर दो हज़ार रुपये की नई नोट चलाने का उद्देश्य क्या था? नोटबंदी की पूर्ण असफलता का अंदाज़ा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने जिन कारणों को बताकर नोटबंदी घोषित की थी आज सरकार उन कारणों का तो कोई जि़क्र ही नहीं करती। इसके बजाए दूसरी कथित उपलब्धियों को नोटबंदी की सफलता बताने की कोशिश की जाती है। जैसेकि इस बार भी वित्तमंत्री अरूण जेटली ने नोटबंदी की सफलता के पक्ष में यही तर्क दिया कि नोटबंदी से औपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है और टैक्स का दायरा भी बढ़ा है। वित्तमंत्री ने यह भी बताया कि पांच सौ व एक हज़ार रुपये की नोट बंद करने के परिणामस्वरूप अधिक राजस्व प्राप्त हुआ,बुनियादी ढांचा बेहतर हुआ तथा गरीबों के लिए अधिक संसाधन प्राप्त हुए।

वित्तमंत्री द्वारा नोटबंदी की दो वर्ष बाद गिनाई जा रही उपलिब्ध में कोई भी एक उपलब्धि ऐसी नहीं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित नोटबंदी के कारणों से मेल खाती हो। परंतु विपक्ष ने गत् दो वर्षों में नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था,रोज़गार तथा व्यापार को लगे ज़बरदस्त आघात की चर्चा करते हुए इसे देश के लिए अत्यंत घातक कदम बताया है। कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों व जि़ मेदार नेताओं का कहना है कि नोटबंदी स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला है। सरकार नोटबंदी से न तो काला धन निकाल सकी न ही नकली नोट पकड़े गए न ही आतंकवाद या नक्सलवाद पर लगाम लगाई जा सकी। इसके बजाए लाखों लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा तथा देश की अर्थव्यवस्था को लगभग तीन लाख करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा। पूर्व प्रधानमंत्री डा०मनमोहन सिंह ने तो नोटबंदी की घोषणा के तुरंत बाद ही इस फैसले को देश की अर्थव्यवस्था के लिए लिया जाने वाला एक घातक फैसला बता दिया था। नोटबंदी की दूसरी ‘बरसी’ पर डा० मनमोहन सिंह एक बार फिर अपनी उसी बात पर कायम दिखाई दिए। उन्होंने मोदी सरकार के इस फैसले को गलत फैस्ला बताया और कहा कि इस फैसले ने भारतीय अर्थव्यवस्था तथा भारतीय समाज को हिलाकर रख दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के प्रत्येक व्यक्ति पर तथा हर उम्र,जाति तथा प्रत्येक व्यवसायी पर नोटबंदी का दुष्प्रभाव पड़ा है। अब तो भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघु राम राजन ने भी कह दिया की नोटबंदी व जी एस टी से देश की आर्थिक तरक$की को तगड़ा झटका लगा है।

पश्चिम बंगाल की ममता बैनर्जी सरकार ने तो नोटबंदी से प्रभावित व इसके चलते बेरोज़गार होने वाले उद्यमियों की सहायता करने के उद्देश्य से एक समर्थन योजना की शुरुआत भी की है। इस योजना के तहत नोटबंदी से प्रभावित 50 हज़ार लोगों की पहचान कर राज्य सरकार 50-50 हज़ार रुपये से उनकी आर्थिक सहायता कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अनुसार ‘नोटबंदी का कदम मोदी सरकार द्वारा स्वयं पैदा की गई त्रासदी व आत्मघाती हमले जैसा था। इससे उनके मित्रों ने काले धन को सफेद करने का काम किया है । यदि यहां यह मान लिया जाए कि विपक्ष अपनी जि़ मेदारियां निभाते हुए अथवा विपक्ष की नीतियों पर चलते हुए नोटबंदी की अकारण ही आलोचना कर रहा है ऐसे में यह सवाल ज़रूर उठता है कि यदि नोटबंदी सरकार की सफल नीति का एक उदाहरण थी फिर आखिर प्रत्येक वर्ष 8 नवंबर को सरकार अपनी इस घोषणा को जश्र व उत्सव के रूप में क्यों नहीं मनाती? पिछले दिनों तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक सनसनीखेज़ खबर का रहस्य उद्घाटन किया गया। उन्होंने एक समाचार पत्र में प्रकाशित खबर का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय रिज़र्व बैंक की आरक्षित राशि का 3.60 लाख करोड़ रुपया मांग रही है। यह धनराशि बैंक की 9.59 लाख करोड़ रुपये की आरक्षित राशि की एक तिहाई से भी अधिक है। जबकि सरकार की ओर से इस आरोप का खंडन भी किया जा चुका है। सरकार तथा रिज़र्व बैंक की इस खींचातान के मध्य रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा है कि जो सरकारें अपने केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का स मान नहीं करतीं उन्हें देर-सवेर बाज़ारों के आक्रोश का सामना करना पड़ता है।

यदि सरकार वास्तव में रिज़र्व बैंक के बफर स्टॉक में से इतनी बड़ी धनराशी मांग रही है इसका सीधा अर्थ यही है कि देश की अर्थव्यवस्था सामान्य नहीं है। वैसे भी सरकार जिन जन-धन खातों को अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही थी खबरों के अनुसार उनमें से आधे से अधिक जन-धन खाते बंद हो चुके हैं। यह भी खबर है कि नोटबंदी के बाद यही जन-धन खाते बड़े पैमाने पर काला धन को सफेद किए जाने में सहायक हुए। उधर आतंकवाद या नक्सलवाद में से किसी पर भी नियंत्रण हासिल नहीं हुआ। नकली नोटों का चलन भी यथावत् है यहां तक कि दो हज़ार रुपये के नए नोट भी बाज़ार में नकली मुद्रा के रूप में पकड़े जाने लगे हैं। ऐसे में सरकार भले ही नोटबंदी का जश्र मनाने से पीछे क्यों न हटे परंतु विपक्षी दल नोटबंदी की पुण्यतिथि प्रत्येक 8 नवंबर को ज़रूर मनाते रहेंगे तथा देश की जनता को इस घोषणा से होने वाले नुकसान से अवगत कराते रहेंगे। 2019 के चुनाव में भी नोटबंदी विपक्ष के लिए एक बड़ा हथियार साबित होगी।

:-तनवीर जाफरी

Tanveer Jafri ( columnist),
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