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कुबेर बनती राजनीतिक पार्टियाँ

दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि राजनीतिक दलों को मिलने वाला देशी एवं विदेशी चंदे की जांच की जायें। 2014 के इस निर्णय में गृह मंत्रालय को आखिरी मौका दिया गया। गृह मंत्रालय ने कोर्ट से 31 मार्च 2018 तक का समय मांगा। वही यूपीए सरकार ने 2010 में फाॅरेन कंन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट बनाया। न्यायालय का मानना है कि विदेश से प्राप्त चंदा में उसका उल्लंघन होता है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक पार्टियों को आयकर से भी छूट मिली हुई है। चूंकि इन्हें आयकर से छूट प्राप्त है इसलिए भारत की जनता को पूरा-पूरा हक यह जानने का है कि दानदाता कौन-कौन है, कितने है, कहां के है! पारदर्शिता के अभाव में जनमानस के मस्तिष्क में एक बात तो गहरी पेठ कर गया है ये काले धन के अड्डे है! राजनीतिक पार्टियों का एक और कुतर्क कि हम चुनाव आयोग को अपना ब्यौरा देते है। यदि ये सही है तो ये विस्तृत दानदाताओं का विवरण अपनी वेब साईट पर क्यों नहीं डालते?किस बात का डर? क्यों 20 हजार के ऊपर अब 2000 हजार के ऊपर की बात करते हैं आखिर मन में डर, क्यों?

चुनाव आयोग के अनुसार वर्तमान में देश में 6 राष्ट्रीय दल 46 मान्यता प्राप्त एवं 1112 गैर मान्यता प्राप्त दल हैं। सभी मौसेरे भाई चन्दे को छिपाने में निर्विववाद रूप से एक हैं यहां तक शासकीय संसाधनों का उपयोग करने में सभी राजनीतिक पार्टियां एक से बढ़कर एक हैं, लेकिन सूचना का अधिकार के दायरे से भी बचने की पूरी जुगत में है क्यों? यदि इन राजनीतिक दलों को एन.जी.ओ. भी मान लिया जायें वैसे देखा जाए तो है भी अर्थात् इनका गठन, पंजीयन शासकीय नियमों के तहत् जो होता है फिर आर.टी.आई. से बचना न केवल गहरे संदेह को जन्म देता है, बल्कि नियमों से अपने को ऊपर दिखाता है जो संवैधानिक रूप से कही से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। जब इस देश में एक छोटा व्यापारी कर्मचारी भी सरकार को टैक्स देता है। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों का टैक्स से परे होना कही से भी विधि सम्मत नही है। केन्द्र एवं राज्य सरकारों को इस बाबत् पारदर्शितायुक्त कड़े नियम बनाने ही होंगे।

भ्रष्टाचार एवं पारदर्शिता की बात हम तभी कर सकते है जब हमारे क्रियाकलापों में भी पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता हो! अभी हाल ही में सरकार की तरफ से चुनावी बाॅण्ड की बात चल रही है अच्छी बात है लेकिन कौन इसे खरीद रहा है, देश का है विदेश का है पूरा ब्यौरा नाम सहित हो तो ठीक वर्ना यह भी एक चोर दरवाजा ही होगा। यदि नाम उजागर ही नहीं करना है तो नगद लेने में ही बुराई क्या है? एक और चोर दरवाजा ‘‘अज्ञात’’ स्त्रोत से दान। हकीकत में यही ‘‘काला धन’’ है जब हम पारदर्शिता की बात करते है तो पूरी पारदर्शिता आधी-अधूरी दाढ़ी में तिनका ही होगा। एक छोटे अनुमान के अनुसार सभी राजनीतिक पार्टियों में लगभग 65 प्रतिशत दान अज्ञात स्त्रोत से आता है यही चिंता का विषय है। कुछ राजनीतिक पार्टियां तो चुनाव आयोग को पूरा हिसाब न दे आधा अधूरा दे इति श्री कर लेती है। यहां निःसंदेह चुनाव आयोग को भी पारदर्शिता बरत कड़ी कार्यवाही करना होगी हालांकि अभी तक ऐसा कुछ दिखा नहीं है।

केन्द्रीय सूचना आयोग ने 6 बड़े राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार में लाने का फैसला सुनाया तथा कहा कि लोक सूचना अधिकारी की नियुक्ति की जायें, क्योंकि ये सभी सस्ती जमीन सहित अन्य सरकारी सुविधाऐं भी प्राप्त करते है इसलिए ये सार्वजनिक प्राधिकार की श्रेणी में है। ऐसा लगता है कि राजनीतिक पार्टियों के आंख का पानी मर गया है तभी तो अभी तक हम इस निर्णय का पालन नहीं करा सके, बल्कि उससे बचने के सौ तरीके निकालने में जुटै है। यहां यक्ष प्रश्न उठता है कि फिर अन्य भी पालन क्यों करें? अब वक्त आ गया है स्वस्थ मन एवं दिल से कथनी और करनी के अन्तर को मिटा केवल सच को ही सच कहना होगा। तभी हम भारत की जनता को भी संदेश दे सकते है वर्ना चूहे बिल्ली का खेल हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह चलता ही रहेगा?

लेखिका:- डाॅ. शशि तिवारी

लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हैं
मो. 9425677352

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