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दो सीट हार के कुछ छिपे हुए मायने तो नहीं….

मैं टुकड़ों में बातें रखना चाहता हूँ। ये टुकड़े अपने आप में सवाल हैं, जो भाजपा की अंदरखाने की जंग और शासन करने के तौर-तरीके सामने रखते हैं तो राजनैतिक धंधे की फीकी होती दुकानों के अलग-अलग शटर तोड़ कर मजबूरियों वश एक शटर वाली पाटर्नशिप वाली दुकान खोलने की मजबूरियों को भी……….

(1)भाजपा गोरखपुर और फूलपुर की दो सीट तो हार गई है, वह भी आठ-नौ महीने के लिए, लेकिन इस हार को लेकर कुछ गंभीर बिन्दु दिलो-दिमाग में कौंध रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने सपा-बसपा-कांग्रेस के लोगों के लिए 2019 में चिल्लाकर-चिल्लाकर और सीना पीट कर यह मातम मनाने का रास्ता फिलहाल बंद कर दिया है कि EVM गलत है। आज सुबह गोरखपुर के सपा के विजयी प्रत्याशी निषाद पूरे विषाद से EVM को कोस रहे थे और चैनलों पर बैठे सपा के प्रवक्तागण जिस तरह से EVM रूदन कर रहे थे, वो अब 2019 में EVM को भद्दी गालियां देने का हक खो चुके हैं।
(2) केशव प्रसाद मौर्य और योगी के बीच के रिश्ते भी कभी सहज अवस्था में नहीं रहे। यह चर्चा भाजपा कार्यालय से लेकर संघ-संगठन तक खुलकर तो न सही लेकिन दबी जुबान से बदस्तूर जारी रही।
(3) सुनील बंसल और योगी के बीच भी रिश्तों में एक अजीब सी तल्खी बराबर बनी रही।
(4) केशव प्रसाद मौर्य ने चुनाव जीतने के एक साल होने तक (19 मार्च, 2018) कभी भी क्षेत्र के समग्र विकास के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा और न ही प्रयास किए।
(5) योगी की कार्यशैली को लेकर भी भाजपा के आम कार्यकर्ताओं और विधायकों में अंदरखाने तीखी नाराजगी है। क्यों कि कार्यकर्ताओं का यह मानना है कि प्रदेश सरकार उनकी घोर उपेक्षा कर रही है। लिहाजा भाजपा का कार्यकर्ता है न खुद निकला और न अपने परंपरागत वोटों तक पहुँचा। लिहाजा वोटों का प्रतिशत गिरा और भाजपा औंधे मुंह गिरी। विधायकों व कार्यकर्ताओं की यह पीड़ा संघ के शीर्ष नेतृत्व से लेकर मोदी तक पहुंची।
(6) इन दोनों ही उपचुनावों पर मोदी और अमित शाह दोनों ने कोई रुचि नहीं दिखाई, यानी शीर्ष नेतृत्व एक साथ केशव व योगी को सबक सिखाना चाह रहा था। क्योंकि आपको स्मरण होगा कि केशव ने अपने समर्थकों के साथ खुद को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित करवाने का पुरजोर दबाव बनाया था और दूसरी ओर योगी ने। जबकि अंदरखाने के सूत्र बताते हैं कि रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा का नाम लगभग फाइनल हो चुका था और वो बनारस में जैसे ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन करके बाहर निकले…अचानक सीधे दिल्ली बुला लिए गए। यानी अब क्या योगी व केशव पर इसे दबाव बढ़ाने की किसी योजना से जोड़ा जाए?
(7) गोरखपुर व पूर्वांचल में योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस तरह से योगी की हिन्दू युवा वाहिनी भाजपा के कार्यकर्ताओं पर भारी पड़ी, यह भी चर्चा का विषय है।
(8) चार दिन बाद इस सरकार को एक साल हो जाएंगें लेकिन यह उत्तर प्रदेश की इकलौती ऐसी सरकार है जो अपने कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों को निगमों, अकादमियों, संस्थानों व आयोगों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद पर अभी तक तैनात नहीं कर सकी है। जिन लोगों ने रात-दिन पार्टी के लिए एक कर दिया, वो आज भी सड़क पर हैं।
(9) माया-अखिलेश के राजनैतिक धंधे को मंदी से उबारने के लिए जो गठजोड़ बन रहा, वह टिकेगा कितने दिन? मान भी लीजिए कि ये भविष्य में यूपी में सरकार बनाने में सफल भी हो जाए, तो टिकाऊपन की क्या गारंटी है, क्योंकि माया की तुनकमिजाजी और सपा के बड़े नेताओं की लंठैती जूतम-पैजार की नई इबारतें नहीं लिखेगी, इसकी क्या गारंटी है?

फिलहाल! कहने को तो ये दो सीटों का उप चुनाव है लेकिन भविष्य में जिस स्क्रीन प्ले व डाॅयलाॅग का प्लाॅट तैयार हो रहा है, वह बहुत उठापटक और दिलचस्प होने वाला है।
लेख; पवन सिंह [ लेखक, वरिष्ठ पत्रकार] 

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