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जल का निजीकरण निकाय चुनाव में बनेगा बड़ा मुद्दा

elections will be a big issue of water privatizationखंडवा [ TNN ] खंडवा में नर्मदा जल योजना का निजीकरण की अधिसूचना जारी होते ही विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। राज्य शासन द्वारा जारी की गई अधिसूचना को धोखा करार देते हुए नर्मदा जल संघर्ष समिति ने एक बार फिर मोर्चा संभाल लिया है। जल के निजीकरण के विरोध में नर्मदा जल संघर्ष समिति द्वारा शहर की सामाजिक संस्थाओं के साथ केवलराम चौराहे पर धरना दिया और काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया। समिति सदस्यों द्वारा अधिसूचना को शून्य घोषित करने के लिए जल्द ही न्यायालय की शरण ली जाएगी।

खंडवा शहर में नर्मदा जल वितरित करने के लिए पानी के मीटर लगाने और पारंपरिक स्रोतों को बंद करने की कार्रवाई शुरू हो, इससे पहले ही लोगों में जागरूकता लाने के लिए नर्मदा जल संघर्ष समिति ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। समिति सदस्यों व पदाधिकारियों ने एकमत होकर निर्णय लिया है कि हाईकोर्ट में याचिका तथा जिला न्यायालय में सिविल सूट दायर करके अधिसूचना को शून्य घोषित करने की लड़ाई लड़ी जाएगी।आचार संहिता में अधिसूचना लागू किये जाने पर ,नर्मदा जल संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने आश्चर्य जताया कि जबलपुर हाईकोर्ट में नर्मदा जल योजना में विसंगतियों को लेकर दायर याचिका की सुनवाई अभी लंबित है। इसके विचाराधीन रहते और नगर निगम चुनाव सहित आचार संहिता लागू रहते हुए शासन द्वारा अधिसूचना कैसे जारी कर दी गई। अधिवक्ता व समिति सचिव देवेंद्र सिंह यादव ने बताया कि उच्च न्यायालय जबलपुर में समिति की ओर से संयोजक प्रकाशचंद बाहेती तथा नारायण नागर द्वारा पृथक से याचिका दायर की जाएगी। वहीं जिला न्यायालय में सिविल सूट दायर करने के लिए अधिवक्ता व समिति के विकास जैन को अधिकृत किया गया है।

गौरतलब है की नर्मदा जल योजना में विसंगतियों और पानी के निजीकरण के विरोध में नर्मदा जल संघर्ष समिति द्वारा लंबे समय से लड़ाई लड़ी जा रही है। समिति के सदस्यों के सहयोग से ही शहर के अधिकांश परिवारों ने नर्मदा जल योजना के अनुबंध के विरोध में आपत्त्यिां दायर की थीं। समिति को उम्मीद थी कि आपत्तियों को गंभीरता से लेते हुए राज्य शासन द्वारा पानी का निजीकरण नहीं किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं होने पर समिति ने एक बार फिर शहर की जनता को विश्वा के हाथों पंगु होने से बचाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं। शहर में पानी का निजीकरण सीधे-सीधे आमजन के साथ खिलवाड़ माना जा रहा है। योजना में विसंगतियों को लेकर कांग्रेस द्वारा भी समय-समय पर आपत्ति और विरोध प्रदर्शन किए जाते रहे हैं। नगरीय निकाय चुनाव से कुछ दिन पहले ही अधिसूचना जारी होने के खुलासे से कांग्रेस के हाथों , बैठे-बैठाए “मुद्दा” मिल गया और प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव के छोटे भाई सचिन यादव कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ नर्मदा जल संघर्ष समिति द्वारा किये जा विरोध में शामिल हो गए। स्थानीय कांग्रेस नेता नारायण नगर का कहना है कि नर्मदा जल का निजीकरण अफसोसजनक है। कांग्रेस इसी मुद्दे पर नगरीय निकाय चुनाव लड़ेगी।

नगर निगम द्वारा विश्वा कंपनी के माध्यम शहर के 29 वार्डों में नर्मदा जल वितरित किए जाने की बात कही जा रही है, जबकि वास्तविकता कुछ और ही है। शहर में पहले की तरह सुक्ता से 24 लाख गैलन पानी का वितरण प्रतिदिन हो रहा है जबकि नर्मदा जल वितरण शुरू होने से सुक्ता से छोड़े जाने वाले पानी में कमी आनी थी। इसी तरह नागचून जलाशय से भी 9 लाख गैलन पानी का वितरण पूर्व की तरह हो रहा है। इधर विभिन्न वार्डों में 280 ट्यूबवेलों से भी पानी का वितरण किया जा रहा है। ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि नर्मदा जल वितरण के नाम पर किस तरह आमजन के साथ छलावा हो रहा है। चारखेड़ा से विश्वा कंपनी द्वारा महज 10 एमएलडी पानी का वितरण हो रहा है। बावजूद इसके शहर में पानी के मीटर लगाकर उपभोक्ताओं से नर्मदा जल वितरण के नाम पर 200 रुपए प्रतिमाह वसूलने की तैयारी की जा रही है। इधर जल के निजीकरण की अधिसूचना जारी होते ही भाजपा बैकफुट पर आ गई है। भाजपा से महापौर पद की दावेदारी भाजपा नेता सुनील जैन स्तब्ध हैं। वे इसे जनहित की योजना बताते हुए अपनी पार्टी का बचाव कर रहे है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन भी जल के निजीकरण के विरोध में नर्मदा जल संघर्ष समिति का साथ दे रहा है। आंदोलन की सदस्य चित्तरूपा पालित का कहना है , नगर निगम एक्ट की धारा 220 में स्पष्ट उल्लेख है की सरकार का कर्तव्य है की वह आम जनता को निः शुल्क :पानी उपलब्ध करवाये। विश्व में सबसे पहले वर्ष 2000 में देश सिर्फ बोलेविया के कोचामामम्बा शहर में जल का निजीकरण हुआ था , वहां इसी मुद्दे पर इबोमरोलिस ने लड़ाई लड़ी गई , और ना सिर्फ जल का निजीकरण समाप्त किया गया, बल्कि प्राकतिक गैस भी कम्पनियों से लेकर निजी हाथों में सौंपी गई। बोलेविया में जल के निजीकरण के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले इबोमरोलिस को वहां की जनता ने राष्ट्रपति चुना। इससे यह साफ़ होता है की जल का निजीकरण किस भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। खंडवा में जल के निजीकरण के विरोध में देश भर के संगठन को एकत्र कर देश व्यापी विरोध करने चेतावनी चित्तरूपा पालित ने दी।

जल के निजीकरण के विरोध में कड़ी नर्मदा जल संघर्ष समिति के विरोध का क्या असर होता है , साथ ही अब यह भी देखना होगा कि भाजपा द्वारा गिफ्ट बतौर मिले इस मुद्दे को निकाय चुनाव के प्रचार में कांग्रेस कितना भुना पाती है।

रिपोर्ट :- अनंत माहेश्वरी

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