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गुड़ी पड़वा 2019 : जाने गुड़ी पड़वा मनाने का कारण और शुभ मुहूर्त

उत्तर भारत में हिंदू नववर्ष कई नामों से मनाया जाता है। वासंतिक नवरात्र के साथ गुड़ी पड़वा का उत्साह भी लोगों में अभी से दिखने लगा है।

गुड़ी पड़वा का पर्व मुख्य रूप से महाराष्ट्र के लोग हिन्दू नववर्ष शुरू होने की खुशी में मनाते है। गुड़ी पड़वा का त्योहार महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गोवा सहित कई दक्षिण भारतीय राज्यों में मनाया जाता है।

इस बार नवरात्रि के साथ ही गुड़ी पड़वा का पर्व 6अप्रैल को मनाया जाएगा। बता दें, गुड़ी का मतलब ध्वज यानि झंडा होता है जबकि पड़वा यानी प्रतिपदा तिथि को कहा जाता है।

इस त्योहार को लेकर हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस दिन ब्रह्मा जी ने पूरी सृष्टि की रचना की थी। आइए जानते हैं क्या है गुड़ी पड़वा का शुभ मुहूर्त।

गुड़ी पड़वा का चौघड़िया शुभ मुहूर्त-

दिन का मुहूर्त- 06:19-07:51, काल, काल वेला, 07:51-09:24 शुभ, 09:24-10:57 रोग, 10:57-12:30 उद्वेग, 12:30-14:02 चर, 14:02-15:35 लाभ वार वेला, 15:35-17:08 अमृत, 17:08-18:40 काल काल वेला।

रात्रि का मुहूर्त- 18:40-20:08 लाभ काल रात्रि, 20:08-21:35 उद्वेग, 21:35-23:02 शुभ, 23:02-24:29 अमृत, 24:29-25:56 चर, 25:56-27:23 रोग, 27:23-28:51 काल, 28:51-30:18 लाभ काल रात्रि।

कहा जाता है कि किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए इन चार चौघड़ियाओं (अमृत, शुभ, लाभ और चर) को उत्तम माना जाता है। जबकि बाकी बची हुई 3 चौघड़ियां ( रोग, काल और उद्वेग) शुभ नहीं माने जाते हैं।

गुड़ी पड़वा से जुड़ी ये हैं 4 रोचक बातें

1. गुड़ी पड़वा का पर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र में मनाया जाता है। ‘गुड़ी’ शब्द का अर्थ ‘विजय पताका’ और पड़वा का अर्थ प्रतिपदा होता है। यही कारण है कि इस पर्व के दौरान लोग अपने घर में विजय के प्रतीक स्वरूप गुड़ी सजाते हैं।

2. इस पर्व से जुड़ी एक मान्यता काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि इस दिन शालिवाहन नाम के एक कुम्हार-पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। यही वजह है कि इस दिन से शालिवाहन शक का प्रारंभ भी होता है।

3. गुड़ी पड़वा से जुड़ी एक मान्यता है कि इस दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। मान्यता है कि इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी हुई थी।

4. गुड़ी पड़वा से जुड़ी पौराणिक कथाओं से जुड़ी एक मान्यता है कि इस दिन प्रभु श्रीराम ने बालि का वध करके दक्षिण भारत में रहने वाले लोगों को उसके आतंक से मुक्त करवाया था। इसके बाद यहां की प्रजा ने खुश होकर अपने घरों में विजय पताका फहराई थी। जिसे गुड़ी के नाम से जाना जाता है।

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