मध्यप्रदेश कांग्रेस में उत्साह पर भारी उदासीनता

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बालाघाट : इस वर्ष के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए प्रमुख विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष की बागडोर सीनियर सांसद पूर्व केन्द्रीय मंत्री और अनुभवी राजनेता कमलनाथ के हाथ में जिस विश्वास के साथ सौंपी थी तीन माह बीत जाने के बाद वह अपने आप को भोपाल, छिंदवाड़ा, दिल्ली से बाहर नहीं निकाल पाने के कारण संगठन में जो उर्जा उनके आने से हुई थी वह उदासीनता में परिवर्तित हो रही है। क्योंकि कमलनाथ भोपाल मेें पार्टी बैठक में इस प्रकार से उलझ गये हैं कि उससे वह बाहर नहीं आ पा रहे हैं। नेतृत्व और कार्यकर्ता में जो दूरी पहले थी वह आज भी बनी हुई है जो कांग्रेस के सेहत के लिए हानिकारक हो सकती है। कमलनाथ भले ही अपने तरह से संगठन को सक्रियता प्रदान करने में लगे हुए है पर जिन चीजों की आवश्यकता है उसपर वह भी काम नहीं कर पा रहे हैं। पूर्व से ज्यादा वर्तमान में संगठन सक्रिय हुआ है यही उपलब्धि है पर विरोधियों को चुनौती दे सके इसकी कमी स्पष्ट दिख रही है।

कांग्रेस के लोग अपना पैसा खर्च कर भोपाल इस उम्मीद के साथ प्रदेश अध्यक्ष से मिलने जाते है कि प्रदेश अध्यक्ष उनसे मिलेंगे परंतु कमलनाथ उनको 10 मिनट का समय भी नहीं दे पाते हैं। हां ठीक-ठीक है कहकर आगे निकल जाते हैं। गत दिवस पूर्व सांसद के साथ बैठक हुई जिसमें उन्होंने 30 से 35 मिनट में पूरा कार्यक्रम निपटा दिया और मीटिंग का हवाला देकर वहां से चले गए उनके इस व्यवहार से वहां दूर-दराज से आए जनप्रतिनिधियों में भारी नाराजगी देखी गई वह कहते रहे कि जब हमारी सुनना ही नहीं है तो हमको बुलाया क्यों। हालाकि सार्वजनिक रूप से पूर्व विधायक एवं पूर्व सांसद ने बयानबाजी तो नहीं कि लेकिन व्यक्तिगत चर्चा में उन्होंने खुलकर अपनी नाराजगी व्यक्ति की।

छिंदवाड़ा पैटर्न पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी चलाने का प्रयास कितना सफल होगा यह तो आने वाला समय बता पाएगा लेकिन इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं है कि पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता और अध्यक्ष के मध्य संवाद की स्थिति जितनी मजबूत होना चाहिए वह नहीं है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के अनुसार सोचा कुछ गया था और हो कुछ और रहा है जो पार्टी को बड़ा लाभ नहीं दिला पाएगी यही सत्य है सीटें भले ही बढ़ जाए पर सरकार बनाना टेढ़ी खीर ही है।

क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद जो जम्बो कार्यकारिणी घोषित की गई उसमें पदाधिकारियों के चयन में किस बात का मापदण्ड बनाकर चयन किया गया यह समझ से परे है। इतना ही नहीं उनके द्वारा अनेक जिलों के जिलाध्यक्ष भी बदले गए इसको लेकर भी अनेक स्थानों पर भारी रोष है। लोगों का मत रहा कि संतुलन बनाने के चक्कर में प्रदेश संगठन असंतुलित हो रहा है। किसको कहां कैसी जिम्मेदारी सांैपी जाए इसको विशेष ध्यान नहीं दिया गया है।

कमलनाथ के प्रभार ग्रहण करने के बाद कांग्रेस के भीतर उम्मीद थी कि वह प्रदेश स्तर पर जिलों का दौरा करके संगठन और कार्यकर्ताओं को चार्ज करेंगे पर ऐसा कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा है। मंदसौर कार्यक्रम को छोड़ दें तो कमलनाथ भोपाल, दिल्ली और छिंदवाड़ा के मध्य सिमट गये। कांग्रेस के भीतर बड़े नेताओं में भले ही एकता और टीमवर्क हो पर जमीनी स्तर पर उस प्रकार का कोई काम होता हुआ नहीं दिख रहा है जो मजबूत संगठन वाली भाजपा को कड़ी टक्कर दे सके। बीजेपी से लड़ाई का रोड़मैप कांग्रेस का कमजोर है जबकि भाजपा द्वारा अनेकों मुद्दे उसको घेरने के कांगे्रस के पास उपलब्ध है परंतु सोशल मीडिया पर बयानबाजी और पोस्ट तक ही ये सीमित है।

कमलनाथ के आने के बाद भी कांगे्रस के जमीनी वर्कर की भावनाओं को आज भी नहीं समझा जा रहा है। बूथ लेवल की बातें कागजों में समयमान है। कांग्रेस पार्टी में पॉलिटिकल टीम स्प्रिट की कमी बनी हुई है जिसमें सुधार नहीं किया गया तो नतीजे उत्साहवर्धक नहीं मिलेंगे। कांग्रेस को व्हाट्सअप, ट्वीटर, फेसबुक से बाहर निकलकर जमीन से जुड़े बिना बड़ा लाभ नहीं होगा क्योंकि उसका मुकाबला उस दल से है जिसके पास कांग्रेस से ज्यादा मजबूत संगठन और केन्द्र और राज्य सरकार की सत्ता की ताकत है। कांग्रेस में बड़े नेता और कार्यकर्ता में जो सामंजस्य की मजबूत कड़ी होना चाहिए वह दिखाई नहीं पड़ती। कांग्रेस के बड़े नेताओं को कांग्रेस पार्टी के हित में कार्यकर्ताओं द्वारा दिए जाने वाले सकारात्मक सुझावों को ग्रहण करना उन्हें अपना अपमान लगता है। जो लोग जीवन में एक चुनाव भी नहीं जीत पाए ऐसे लोगों के हाथ में प्रदेश के विभिन्न प्रकोष्ठों की बागडोर सौंपने से बड़ा लाभ नहीं मिलेगा। प्रदेश में अनेक जिलों में कांग्रेस के पुरूष-महिला जिला पंचायत सदस्य, जिलाध्यक्ष, जनपद अध्यक्ष पद पर रहकर कार्य कर रहे। ऐसे लोगों को भी प्रदेश संगठन में जगह देने से जमीनी राजनीति की सच्चाई सामने आती पर संगठन में ऐसे लोगों को जिम्मेदारी दी जा रही है जो अपने वार्ड में ही कांग्रेस को जिता नहीं पाते वह प्रदेश संगठन में जाकर कांगे्रस का कितना भला कर पाएंगे यह बात कांग्रेस हाईकमान के लिए मंथन का विषय है।
@रहीम खान