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शंकराचार्य को शंकराचार्य ही रहने दें !

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जैसे गांधीजी को लोग राष्ट्रपिता कहते हैं, तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज मानते हैं और अशोक-चक्र को राष्ट्रीय चिन्ह मानते हैं, वैसे ही अब मांग हो रही है कि आदि शंकराचार्य को ‘राष्ट्रीय दार्शनिक’ घोषित किया जाए। जहां तक भारतीय दर्शन का प्रश्न है, उसके व्याख्याकारों में आचार्य शंकर का योगदान बेजोड़ है। 8वीं सदी में शंकर का आगमन हुआ।

उसके पहले तक भारत में आत्मा, परमात्मा और प्रकृति के बारे में तरह-तरह के विचार फैले हुए थे। चारों वेदों, छहों दर्शनों, उपनिषदों और भगवत गीता की व्याख्याएं विद्वानों और दार्शनिकों ने अपने-अपने ढंग से कर रखी थीं। बौद्ध, जैन और चार्वाक लोग ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं मानते थे।

तब सांख्य-दर्शन सिर्फ प्रकृति और पुरुष की बात करता था। मोक्ष-प्राप्ति के भी अलग-अलग तरीके थे, क्योंकि मोक्ष की कल्पना भी एक-जैसी नहीं थी। एक तरह से वह विश्व-गुरु भारत तब बौद्धिक स्वच्छंदता के दौर से गुजर रहा था। दुनिया के कई देश बौद्ध हुए जा रहे थे। ऐसे में शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के दर्शन का प्रतिपादन किया। उन्होंने प्रस्थान-त्रयी याने ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और गीता के भाष्य किए। सार रुप में उनका सूत्र था- ‘अहं ब्रह्मास्मि, जगन्मिथ्या’।

अर्थात ‘मैं ही ब्रह्म हूं, जगत मिथ्या है।’ यह ही भारत की मुख्य-धारा का दर्शन बन गया, हालांकि इसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं। यह विवादास्पद भी है। शंकर के अद्वैतवाद से भिन्न, द्वेताद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद तथा महर्षि दयानंद का त्रैतवाद आदि कई दार्शनिक धाराएं भी आईं। शंकर को ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ भी कहा गया।

शंकराचार्य का सबसे बड़ा योगदान यह था कि केरल के कालड़ी नामक गांव में जन्म लेकर उन्होंने चारों धामों की स्थापना की। भारत को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की। 32 साल की अल्पायु में किस अन्य संत ने इतना बड़ा काम किया है?

लेकिन यदि हम उन्हें ‘राष्ट्रीय दार्शनिक’ या ‘राष्ट्र गुरु’ की उपाधि से मंडित करेंगे तो देश में इतने विवाद उठ खड़े होंगे, जितने कि उनके अपने जीवन-काल में नहीं हुए थे। निरीश्वरवादी बौद्ध और जैन तो उन पर टूट ही पड़ेंगे। आंबेडकरवादी उन पर सीधा हमला बोल देंगे। त्रैतवादी आर्यसमाजी वर्तमान शंकराचार्यों को शास्त्रार्थ की चुनौती दे देंगे। वे महर्षि दयानंद को ‘राष्ट्र पितामह’ (गांधी राष्ट्रपिता) घोषित करने की मांग करेंगे? सिख, राधास्वामी तथा कई संप्रदाय शिकायत की मुद्रा धारण कर लेंगे।

ईसाई, मुसलमान और हमारे कम्युनिस्ट भी कहेंगे कि यह क्या है? क्या यह हिंदुत्ववादी एजेंडा आप देश पर थोप नहीं रहे हैं? भारत तो विविध दर्शनों का इंद्रधनुष है। आप उसे वेदान्त की सीधी—सपाट तलवार क्यों बनाना चाहते हैं? इसके अलावा देश में आजकल कई शंकराचार्च हैं। उनमें गद्दी की लड़ाई चल रही है। गद्दी ही ब्रह्म है, ज्ञान मिथ्या है। बेहतर तो यह होगा कि हम आदि शंकराचार्य को शंकराचार्य ही रहने दें। उन्हें कोई राजनीतिक उपाधि देकर उनका महत्व क्यों घटाएं? वे भारत राष्ट्र की ही नहीं, विश्व की धरोहर हैं। वे जगद्गुरु हैं।

लेखक:- वेद प्रताप वैदिक

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