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हिंदू-मुस्लिम मित्रता का प्रतीक विश्व का सबसे ऊंचा रावण

 

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हरियाणा के अंबाला जि़ले के बराड़ा कस्बे में प्रत्येक वर्ष बनाया जाने वाला विश्व का सबसे ऊंचा रावण का पुतला इस समय विश्व के सबसे वि यात एवं सबसे विशाल पुतलों के रूप में अपनी पहचान बना चुका है।

वैसे तो इस परियोजना के निर्देशक एवं सूत्रधार श्री रामलीला क्लब बराड़ा के संस्थापक अध्यक्ष राणा तेजिंद्र सिंह चौहान हैं। परंतु इस विशाल रावण के पुतले को शोहरत की बुलंदियों पर ले जाने हेतु तथा

गत् चार वर्षों से इस विशाल पुतले की पृष्ठभूमि में पांच दिवसीय बराड़ा महोत्सव का आयोजन किए जाने में तेजिंद्र चौहान के परम सहयोगी के रूप में उनके घनिष्ठ मित्र एवं श्री रामलीला क्लब बराड़ा के संयोजक प्रसिद्ध लेखक, स्तंभकार व हरियाणा साहित्य अकादमी शासी परिषद के पूर्व सदस्य तनवीर जा$फरी की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है।

मूलरूप से बिहार के दरभंगा जि़ले से संबंध रखने वाले तनवीर जाफरी की शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद से हुई। उनके पिता श्री सैयद वज़ीर हसन जाफरी उत्तर प्रदेश के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रधानाचार्य होने के साथ-साथ फलसफी बिहारी के नाम से प्रसिद्ध एक मशहूर शायर व लेखक भी थे।

गत् 27 वर्षों से अंबाला में रह रहे जा$फरी राजीव गांधी,विश्वनाथ प्रताप सिंह व अमिताभ बच्चन जैसी देश की विशिष्ट हस्तियों के राजनैतिक सहयोगी के रूप में कार्य कर चुके हैं। तेजिंद्र चौहान से उनकी मित्रता दो दशक पहले उस समय हुई थी जब वे सामान्य ऊंचाई का रावण का पुतला बनाया करते थे।

जब तेजिंद्र चौहान ने अपनी कला-कौशल से अपने सहयोगियों के साथ रावण के पुतले की ऊंचाई सौ फुट तक पहुंचाई उस समय जाफरी ने सामाजिक बुराईयों के प्रतीक इस पुतले की अहमियत को समझते हुए इसे पहले राष्ट्रीय स्तर की शोहरत दिलाए जाने का जि़ मा उठाया।

और आख़िरकार आज 210 फुट की रावण की ऊंचाई होते-होते तेजिंद्र चौहान द्वारा निर्मित की जाने वाली यह विशाल व अजूबी आकृति तनवीर जाफरी के प्रयासों से ही पांच बार लि का बुक ऑफ रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुकी है।

रामलीला क्लब बराड़ा में जा$फरी की सहभागिता के विषय में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि भारतवर्ष चूंकि अनेकता में एकता की अंतर्राष्ट्रीय पहचान रखने वाला विश्व का एक अनूठा देश है इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि सभी धर्मों के लोग सभी धर्मों के प्रत्येक त्यौहार में बढ़चढ़ कर हिस्सा लें तथा उसे इसी प्रकार मिल-जुल कर मनाएं।

भारत में मनाए जाने वाले सभी धर्मों के सभी त्यौहारों के सामाजिक पहलूओं को मद्देनज़र रखते हुए इनमें सभी धर्मों के लोगों की भागीदारी हमारे देश की एकता तथा सांप्रदायिक सौहाद्र्र व परस्पर भाईचारे को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। जाफरी का कहना है कि उन्हें यह शिक्षा बचपन में अपने पिता से ही हासिल हुई है।

वही उन्हें बचपन से सभी धर्मों के त्यौहारों में शिरकत करने की प्रेरणा देते थे तथा स्वयं उन्हें साथ लेकर दशहरा,जन्माष्टमी व शिवरात्रि जैसे धार्मिक समागमों को दिखाने ले जाया करते थे। इधर संयोगवश तेजिंद्र चौहान के पिता स्वर्गीय अमीसिंह भी बराड़ा कस्बे के एक ज़मींदार होने के साथ-साथ एक अध्यापक भी थे।

उन्हें भी उर्दू शेरो-शायरी का बहुत शौक था। उन्होंने भी अपने दोनों पुत्रों राणा तेजवीर सिंह तथा तेजिंद्र चौहान को सर्वधर्म संभाव तथा सांप्रदायिक सौहार्द्र के मार्ग पर चलने की सीख दी। स्वर्गीय अमीसिंह ने अपने छोटे पुत्र तेजिंद्र चौहान को जीवन में कुछ नया व अनूठा करने की प्रेरणा दी।

जिस समय तेजिंद्र चौहान ने सर्वप्रथम 1987 में मात्र 20 फुट ऊंचा रावण का पुतला बनाकर विजयदशमी के अवसर पर उसका दहन किया उस से पूर्व बराड़ा में रावण दहन का कोई कार्यक्रम नहीं होता था। तेजिंद्र चौहान स्वयं एक मंझे हुए मूर्तिकार,कलाकार तथा गीत-संगीत के बेहद शौकीन व्यक्ति हैं। नुसरत फतेह अली खां व मेंहदी हसन जैसे महान गायकों को वे सुरों का बेताज बादशाह मानते हैं तथा इन गायकों का ज़बरदस्त संग्रह चौहान के पास मौजूद है।

पांच दिवसीय बराड़ा महोत्सव की शुरुआत कैसे हुई इस विषय पर जाफरी ने बताया कि सौ फुट की ऊंचाई पार करने के बाद तेजिंद्र चौहान द्वारा निर्मित यह कलाकृति अंबाला व आसपास के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने लगी। परंतु 2011 में जब 175 फुट के रावण के पुतले को पहली बार लि का रिकॉर्ड प्राप्त हुआ उस समय इसे राज्यस्तरीय शोहरत मिली और दूर-दराज़ के लोगों ने भी इसके दर्शन के लिए बराड़ा पहुंचना शुरु कर दिया।

उस समय तक यह विशाल पुतला विजयदशमी से एक दिन पूर्व अथवा विजयदशमी के ही दिन खड़ा किया जाता था और चंद ही घंटों के बाद पुतला दहन हो जाता था। इस विशालकाय पुतले के निर्माण में लगभग 6 महीने का समय लगता था और 6 महीने की मेहनत से तैयार किए गए पुतले को चंद ही घंटों तक खड़ा रखने के बाद जलाया जाना यह इस आयोजन का एक नकारात्मक पहलू था।

इत्तेफाक से 2012 में जब रामलीला क्लब ने जिसकी स्थापना तेजिंद्र चौहान ने 1987 में की थी अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे किए उस समय क्लब की सिल्वर जुबली मनाने के साथ ही पांच दिवसीय बराड़ा महोत्सव की शुरुआत इसी आशय से की गई कि बराड़ा महोतसव के आयोजन के बहाने देश के दूर-दराज़ के क्षेत्रों से आने वाले लोग इस पुतले का कम से कम पांच दिनों तक दर्शन कर सकेंगे। और चूंकि 2012 से यह पुतला विजयदशमी से 6-7 दिन पहले खड़ा किया जाने लगा इसलिए इसकी पृष्ठभुूमि में कई प्रकार के सांस्कृतिक,गीत-संगीत तथा मनोरंजन के कार्यक्रम सायंकाल आयोजित किए जाने लगे।

तेजिंद्र चौहान बताते हैं कि उन्हें अपने घनिष्ठ मित्र तनवीर जा$फरी की क्लब के प्रति की जा रही सेवाओं पर गर्व है। चौहान बताते हैं कि आज बराड़ा महोत्सव के कार्यक्रमों का राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। आज इस आयोजन का विभिन्न टीवी चैनल ओबी वैन के द्वारा सीधा प्रसारण करते हैं। राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर बराड़ा का नाम इस आयोजन के चलते रौशन हो चुका है।

आज बराड़ा महोत्सव को हरियाणा साहित्य अकामदमी,पंचकुला तथा उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र एनजेंडसीसी के अतिरिक्त कई निजी संस्थाओं द्वारा अपना सहयोग दिया जा रहा है। इन सबमें हमारे मित्र तनवीर जाफरी की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है तथा क्लब उनके योगदान के लिए उनका आभारी है। वहीं जाफरी का इस विषय पर यह कहना है कि वे श्रीरामलीला क्लब बराड़ा के एक साधारण सदस्य के नाते क्लब को तथा इसके अंतर्गत् होने वाले सभी आयोजनों को अपनी सामथ्र्य के अनुसार अपना सहयोग देने में गर्व महसूस करते हैं।

जाफरी का कहना है कि क्लब के सदस्यों व बराड़ा के लोगों ने जो प्यार व अपनत्व की भावना उनके प्रति दर्शाई है उसे लेकर वे बेहद अभिभूत हैं। जाफरी प्रत्येक वर्ष मोहर्रम के अवसर पर अपने घर जाकर मोहर्रम के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया करते थे परंतु इस वर्ष दशहरा व मोहर्रम लगभग एक साथ पडऩे पर उन्होंने मोहर्रम में अपने गांव जाने के बजाए बराड़ा महोत्सव में अपनी शिरकत को अधिक ज़रूरी समझा। जाफरी कहते हैं कि रामलीला क्लब बराड़ा की सेवा करना उनका सौभाग्य है तथा वे ऐसा कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

जाफरी दो टूक शब्दों में यह भी कहते हैं कि किसी भी धर्म का कोई भी महापुरुष किसी एक धर्म या समुदाय की निजी विरासत हरगिज़ नहीं है। प्रत्येक धर्म के अनुयाईयों द्वारा आराध्य समझे जाने वाले प्रत्येक महापुरूष ने पूरे समाज को सद्मार्ग दिखाया है। और सद्मार्ग पर चलना मानव जाति के लिए हितकारी है न कि किसी धर्म अथवा समुदाय विशेष मात्र के लिए।

भगवान राम ने रावण रूपी बुुराईयों एवं अहंकार के प्रतीक का वध कर पूरे विश्व को यह संदेश दिया था कि अहंकार एवं बुराईयों का सर्वनाश किया जाना चाहिए। अब चाहे वह रावण हो अथवा यज़ीद। सभी धर्मों में राक्षस व दैत्य प्रवृति के लोग हमेशा से रहे हैं। और सभी धर्मों के महापुरुषों व अवतारों ने इनका किसी न किसी रूप में मुकाबला किया है।

भगवान राम ने रावण का वध कर बुराई पर विजय हासिल की तो हज़रत इमाम हुसैन ने करबला में यज़ीद जैसे दुश्चरित्र मुस्लिम शासक के हाथों अपनी व अपने परिवार के लोगों की कुर्बानी देकर करबला के मैदान में अपने पवित्र उद्देश्यों की जीत दर्ज कराई। भगवान राम हों या हज़रत हुसैन ऐसे सभी महापुरुषों की कारगुज़ारियां मानव जाति को सच्चाई की राह पर चलने वसच्चाई के रास्ते पर चलते हुए बुराई का किसी भी प्रकार से अंत करने की सीख देती हैं।

देश के वर्तमान वातावरण में राणा तेजिंद्र सिंह चौहान व तनवीर जाफरी जैसे लोगों की मित्रता एक मिसाल पेश कर रही है। निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति व संस्कार के मूल में धर्मनिरपेक्षता तथा सर्वधर्म संभाव की भावना का ही वास है।

संत कबीर,अब्दुल रहीम खानखाना,मलिक मोह मद जायसी जैसे हिन्दू देवी-देवताओं की शान में रचनाएं रखने वाले कवि निश्चित रूप से हमारी इसी मिली-जुली भारतीय स यता के प्राचीन ध्वजावाहक थे। और आज श्री रामलीला क्लब बराड़ा व बराड़ा महोत्सव के आयोजन में भी उसी परंपरा को आगे बढ़ते हुए देखा जा सकता है।

लेखक:- निर्मल रानी

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