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कारसेवकों को मिले स्‍वतंत्रता सेनानियों जैसा दर्जा- हिंदू संत

अयोध्या में जल्द ही राममंदिर निर्माण की मांग करते हुए कई हिंदू संतों ने कहा है कि सरकार को उन सभी को स्वतंत्रता सेनानियों के बराबर मानना चाहिए जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान अपने जीवन का ‘‘बलिदान’’ किया या उस समय जेल में रहे।

महाराष्ट्र के ठाणे में हिंदू धार्मिक संतों की एक सभा में पारित एक प्रस्ताव में कहा गया, ‘‘यह नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे उन लोगों को रामसेवकों का दर्जा दें और उनसे स्वतंत्रता सेनानी जैसा व्यवहार करें जिन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान अपने जीवन का बलिदान किया या जेल में रहे।’’

यह प्रस्ताव पूरे देश के 50 महामंडलेश्वरों के चार दिवसीय सम्मेलन ‘‘वैचारिक महाकुंभ’’ में पारित किया गया जिसका आयोजन मुम्बई के पास भायंदर में गत 29 दिसंबर से एक जनवरी तक हुआ। यहां पारित एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया कि उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक राममंदिर का निर्माण जल्द होना चाहिए क्योंकि यह 125 करोड़ हिंदुओं की ‘‘आस्था का मामला’’ है।

इस सम्मेलन का आयोजन अनंतश्री विभूषित महामंडलेश्वर स्वामी चिदंबरानंद सरस्वती महाराज ने किया था और इसमें पारित एक अन्य प्रस्ताव में गाय को राष्ट्रीय पशु और भगवत गीता को राष्ट्रीय साहित्य घोषित करने की मांग की गई है।

बता दें कि राम जन्मभूमि का मुद्दा आजाद भारत के सबसे जटिल मसलों में से एक है। 1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर विवादित स्थल के पास शिलान्यास किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विहिप को विवादित स्थल के करीब भूमि पूजन की अनुमति दी थी।

1990 में इसी मुद्दे को लेकर बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से रथयात्रा की शुरुआत की। वह अयोध्या की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन बिहार के समस्तीपुर में लालू प्रसाद की सरकार ने उन्हें रोका और गिरफ्तार कर लिया। 1991 में रथयात्रा की लहर से भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता मिली।

मंदिर निर्माण के लिए देश भर से ईंटें भेजी गईं। 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या पहुंचकर हजारों की संख्या में कार सेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया। इसके बाद देश भर में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए, जिसमें दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए। इस दौरान कई कार सेवक भी मारे गये और कुछ को जेल भेजा गया।

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