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नवरात्री: जानें- किस दिन होगी देवी के किस स्वरुप की पूजा

Durga_Pujaशारदीय नवरात्र का पहला दिन आज से शुरू हुआ, आज मां जगदम्बा के पहले स्वरुप शैलपुत्री की पूजा की जाती है। देशभर के मंदिरों में माता रानी के दर्शन के लिए भक्तों की कतारें लगी हैं। लोग माता के दर्शन करके सुख,शांति,समृधि बनी रहे इसकी कामना कर रहे हैं। मान्यताओं के मुताबिक देवी दुर्गा किसी ना किसी सवारी पर सवार होके आती हैं। वैसे नवरात्र 9 दिन का होता है लेकिन इस बार नवरात्र पर विशेष संयोग बन रहा है। ऐसा संयोग कई वर्षों के बाद बन रहा है। इस लिए इस बार नवरात्र दस दिनों का होगा।

जानें- किस दिन होगी देवी के किस स्वरुप की पूजा
अक्टूबर शनिवार – प्रतिपदा ( शैलपुत्री)
अक्टूबर रविवार – प्रतिपदा ( शैलपुत्री)
अक्टूबर सोमवार – द्वितीया (ब्रह्मचारिणी)
अक्टूबर मंगलवार – तृतीया (चन्द्रघंटा)
अक्टूबर बुधवार – चतुर्थी (कूष्मांडा)
अक्टूबर बृहस्पतिवार – पंचमी ( स्कंदमाता)
अक्टूबर शुक्रवार – षष्ठी ( कात्यायनी)
अक्टूबर शनिवार – सप्तमी ( कालरात्रि)
अक्टूबर रविवार – अष्टमी (महागौरी)
अक्टूबर सोमवार – नवमी ( सिद्धदात्री)
अक्टूबर मंगलवार – विजयदशमी, दशहरा

आईये जानते हैं मां के इन नौ रूपों के बारे में विस्तार से…
शैलपुत्री- मां दुर्गा अपने प्रथम स्वरूप में शैलपुत्री के रूप में जानी जाती हैं। पर्वतराजहिमालय के यहां जन्म लेने से भगवती को शैलपुत्री कहा गया। भगवती का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। शैलपुत्री के पूजन से मूलाधार चक्र जागृत होता है, जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं।

ब्रह्मचारिणी- मां दुर्गा अपने द्वितीय स्वरूप में ब्रह्मचारिणी के रूप में जानी जाती हैं। ब्रह्म का अर्थ है,तपस्या, तप का आचरण करने वाली भगवती, जिस कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है, इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बायें हाथ में कमण्डल रहता है।

मां चंद्रघंटा- नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। मां का यह रूप बेहद ही सुंदर, मोहक और अलौकिक है। चंद्र के समान सुंदर मां के इस रूप से दिव्य सुगंधियों और दिव्य ध्वनियों का आभासहोता है। माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है इसलिए इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है

मां कूष्माण्डा- वैसे तो मां दुर्गा का हर रूप बहुत सरस होता है। लेकिन मां का कूष्माण्डा रूप बहुत मोहक और मधुर है। नवरात्र के चौथे दिन मां के इस रूप की पूजा होती है। कहते हैं नवरात्र के चौथे दिन साधक का मन ‘अदाहत’ चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा करनी चाहिए। मां के इस रूप के बारे में पुराणों में जिक्र है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी।

स्कंदमाता- नवरात्र का पांचवा दिन मां स्कंदमाता के नाम होता है। मां के हर रूप की तरह यह रूप भी बेहद सरस और मोहक है। स्कंदमाता अपने भक्त को मोक्ष प्रदान करती है। चाहे जितनाभी बड़ा पापी क्यों ना हो अगर वह मां के शरण में पहुंचता है तो मां उसे भी अपने प्रेम के आंचल से ढ़क लेती है। मां अपने भक्त के सारे दोष और पाप को दूर कर देती है। मां स्कंदमाता की पूजा नीचे लिखे मंत्र से आरंभ करनी चाहिए।

कात्यायनी- नवरात्र केे छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है। कहते हैं कि कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। जिसके बाद से मां का नाम कात्यायनी पड़ा।

कालरात्रि- नवरात्र केे सातवें दिन मां काली की पूजा की जाती है। मां का यह रूप काफी विकराल और भयानक है लेकिन बहुत फलदायी है। आज के दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में प्रवेश कर जाता है। मां काली को ‘शुभंकारी’ भी कहते है। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं।

महाअष्टमी- महाअष्टमी के दिन मां गौरी की पूजा होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मां ने पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए बड़ी कठोर तपस्या की थी। इस कठोर तपस्या के कारण इनका शरीर एकदम काला पड़ गया। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विद्युत प्रभा के समान अत्यंत कांतिमान-गौर हो उठा। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा।

मांं सिद्धिदात्री- महानवमी के दिन मां के सिद्धिरूप की पूजा होती है। मां दुर्गे के इसी रूप को शतावरी और नारायणी भी कहते हैं। दुर्गा के सभी प्रकारों की सिद्धियों को देने वाली मां की पूजा का आरंभ निम्न श्लोक से करना चाहिए। नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं।




 

नवरात्री  जानें- किस दिन होगी देवी के किस स्वरुप की पूजा

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