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योग का सरल किंतु प्रभावी रूप है सूर्य नमस्कार

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नवग्रहों में विशेष ग्रह है पृथ्वी, और पृथ्वी पर जीवन का आधार है सूर्य। सभी प्राणियों तथा वनस्पतियों को ऊर्जा सूर्य से ही प्राप्त होती है। हम मनुष्यों के जीवन की धुरी भी यह सूर्य ही है। हिन्दू संस्कृति में सूर्य को विशेष स्थान प्राप्त है। विभिन्न वेदों तथा अन्य ग्रंथों में सूर्योपासना की महिमा वर्णित है। विशेष रूप से ऋग्वेद में तो सूर्योपासना के अनेक मंत्र हैं। कहा जाता है कि भगवान राम की रावण पर विजय का कारण भी यही सूर्योपासना ही थी।

आयुर्वेद में भी सूर्य तथा सूर्योदय से पहले (उषाकाल में) सूर्य की लाली में घूमने व उसे देखने के लाभों का उल्लेख मिलता है। वैसे तो सूर्य को बल, बुद्धि, स्मृति, आयु, आरोग्य, सौभाग्य तथा विजय का दाता माना जाता है परंतु इसके चिकित्सकीय गुण भी कम नहीं हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी सूर्य के इन लाभों को स्वीकारता है।
सूर्य नमस्कार, जिसकी धार्मिक महत्ता से आप सभी परिचित होंगे, को समस्त योगशास्त्र ने भी महत्वपूर्ण माना है। सूर्य नमस्कार या सूर्यभेदी व्यायाम के पन्द्रह अंग हैं, जिससे सम्पूर्ण शरीर का व्यायाम हो जाता है। योगासनों को प्रारंभ करने से पहले सूर्य नमस्कार करना तथा योगासनों की की समाप्ति शवासन पर करना स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी है। यों भी जिस व्यक्ति को सूर्य नमस्कार का अच्छा अभ्यास हो वह अन्य योगासनों को भी आराम से कर सकता है।

सूर्य नमस्कार का पहला आसन है नमस्कार आसन इसके लिए सूर्य की ओर चेहरा करके बिल्कुल सीधे खड़े हो जाएं। गर्दन सीधी वे दृष्टि सूर्य की रखें। ध्यान रखें कि आपके पंजे एड़ी व घुटने मिले रहें। इसी स्थिति में छाती के सामने दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करें।

उध्र्वनमस्कार आसान सूर्य भेदी व्यायाम का दूसरा आसन है। इसे करने के लिए दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में ही सिर के ऊपर ले जाएं जितना हो सके कमर तथा हाथों को पीछे झुकाएं तथा आसमान की ओर दृष्टि रखते हुए गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं।

सूर्यभेदी व्यायाम के तीसरे अंग हस्तपादासन को करने के लिए उसी सीधी खड़ी अवस्था में पेट को अन्दर दबाते हुए आगे की ओर झुकें और दोनों हाथों की हथेलियां को पैरों के निकट जमीन पर रखें और सिर को घुटनों के पास लाने का प्रयास करें।

एक पाद प्रसारणासन सूर्य नमस्कार का चैथा अंग है। इसके लिए तीसरे अंग हस्तपादासन की स्थिति में ही हाथों और एक पैर को उसी स्थिति में रखते हुए दूसरे पैर को जहां तक हो सके पीछे की ओर ले जाएं, ध्यान रखे कि आपका घुटना न मुड़े, दूसरे पैर की जांघ व घुटने के बीच 90 डिग्री को कोण रखते हुए धड को पैर की जांघ से सटाएं। चेहरे को सूर्य की ओर ही रखें।

अगले चरण में द्विपाद प्रसारणासन में दूसरे पैर को भी-पहले पैर की तरह पीछे की ओर फैला लें परन्तु धड़ उसी स्थिति में रखें। ध्यान रखें कि हाथ या घुटने मोड़े नहीं इस स्थिति में आप हथेलियों और पैरों की अगुलियों पर जमीन से उठे रहेंगे।

छठे चरण भूधरासन को करने के लिए पैर को जितना संभव हो पीछे की ओर खींचे और हथेलियों और पैरों के तलवों को जमीन से लगाकर स्वयं (कूल्हों व कमर) को ऊपर उठाएं। हाथ-पैर बिल्कुल सीधे रहें और पेट अन्दर की ओर खिंचा रहे, ठोड़ी को कंठकूप में लगाएं।

अगले अंग अष्टांग प्रणिपातासन के लिए दण्ड लगाने की स्थिति में आएं और दोनों पैरों की अगुलियों व अगूंठे सहित तलवों का अगला भाग, दोनों हथेलियों, छाती और मस्तक को जमीन से लगाएं। ऐसे में पेट, अंदर की ओर खिंचा रहे। नाक, कोहनी या कंधा जमीन का स्पर्श न करें।

आठवें आसन सर्पासन के लिए अष्टांगप्रणिपातासन की स्थिति में रहते हुए घुटने, छाती तथा मस्तक को ऊपर उठाएं तथा सिर तथा कमर को जितना सभंव हो पीछे की ओर खीचें। दोनों हाथ कंधे से कलाई तक सीधे रहें। इस स्थिति में हथेलियों, पैरों की अंगुलियां तथा अग्रिम तलवों के अलावा कोई अंग जमीन से स्पर्श न करें।
इसके बाद नये अंग के रूप में भूधरासन, दसवें अंग के रूप में द्विपाद प्रसारणासन की पुनरावृत्ति करें। इसी प्रकार ग्यारहवें तथा बारहवें अंग के रूप में क्रमशः एकपाद प्रसरणासन तथा हस्तपादासन को दोहराएं।

तेहरवें अंग उपवेशासन करने के लिए हस्तपादासन की स्थिति में रहते हुए घुटने मोड़ कर बैठ जाएं, हाथों तथा पैरों की यथास्थिति में रखें। चैदहवें तथा पन्द्रहवें अंग के रूप में क्रमशः नमस्कारासन तथा उध्र्वनमस्कारासन को दोहराते हुए सूर्य भेदी व्यायाम की समाप्ति करें। सूर्य नमस्कार सूर्योदय से लगभग एक-डेढ़ घंटा पूर्व उठकर शौच, स्नान तथा सैर आदि से निपटकर, सूर्योदय के समय ठीक सूर्य के सामने खड़े होकर करना चाहिए।

सूर्य नमस्कार से शरीर मजबूत तथा लचीला बनता है। एक बार सूर्य-नमस्कार से अभ्यस्त हो जाने पर आप कठिन-से कठिन योगासन को बड़ी आसानी से कर पाएंगे। इससे पूरे शरीर का संतुलित व्यायाम होता है। श्वसन तंत्र तथा पाचनतंत्र संबंधी बीमारियों को दूर करने में सूर्य नमस्कार विशेष रूप से लाभकारी है। इससे शारीरिक तेज में वृद्धि होने के साथ-साथ सम्पूर्ण शरीर में एक ऊर्जा तथा स्पूहृर्ति का संचरण होता है जिससे आप पूरे दिन अधिक सक्रिय बने रहे सकते हैं।

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