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चाबहार: जबानी जमा-खर्च तो नहीं?

narendra modiजैसी छोटी-सी चाबी बड़े से बड़े ताले को खोल देती है, वैसे ही चाबहार के बंदरगाह से पूरे दक्षिण एशिया के बंद द्वार खुल सकते हैं। ईरान के इस बंदरगाह के निर्माण के लिए भारत 50 करोड़ डॉलर लगाएगा। इसके अलावा ईरान के अंदर और ईरान से अफगानिस्तान तक सड़क बनाने का संकल्प भी भारत ने किया है। तेल और गैस निकालने, रासायनिक उर्वरक के कारखाने बनाने तथा कई अन्य प्रायोजनाओं में भारत लगभग 20 बिलियन डॉलर याने एक लाख 35 हजार करोड़ रु. की पूंजी लगा सकता है।

भारत ने इतनी बड़ी पूंजी किसी भी देश में न तो लगाई है और न ही उसका इरादा है। चाबहार पर पहले भी 2003 और 2013 में त्रिपक्षीय समझौते हुए हैं। आशा है, यह समझौता भी उनकी तरह कागजी बनकर न रह जाएगा। म्यांमार, अमेरिका, चीन, जापान और संयुक्त अरब अमारात के साथ भी हम लंबी—चौड़ी घोषणाएं कर चुके हैं लेकिन अभी तक सब हवा में ही है। कोरे जबानी जमा—खर्च से काम नहीं चलेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस ऐतिहासिक पहल का श्रेय मिल रहा है, हालांकि इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने की थी। अटलजी ने अफगान-ईरान सीमांत पर जरंज-दिलाराम सड़क बनवाई थी ताकि इस सड़क के जरिए हम अफगानिस्तान को समुद्र से जोड़ दें। ज़मीन से घिरे अफगानिस्तान को ईरान से होकर समुद्र तक आने-जाने का रास्ता मिल जाए तो पाकिस्तान पर उसकी निर्भरता खत्म हो जाएगी। अभी तक अफगानिस्तान को यातायात के लिए कराची के बंदरगाह पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत-अफगान व्यापार भी तभी तक चल पाता है, जब तक कि पाकिस्तान दोनों देशों को अपना थल-मार्ग इस्तेमाल करने देता है।

चाबहार बंदरगाह अफगानिस्तान की भू-राजनीतिक आजादी का शंखनाद है। भारत, ईरान और अफगानिस्तान ने जो त्रिपक्षीय समझौता किया है, वह 21 वीं सदी को एशिया की सदी बनाने की क्षमता रखता है। अब यदि भारत ने चाबहार-जाहिदान-हाजीगाक रेल बनवा दी तो अकेला अफगानिस्तान सारे दक्षिण एशिया के लोहे की आपूर्ति कर देगा। यदि ईरान और अफगानिस्तान में भारत रेल और सड़कें बनवा दें तो मध्य एशिया के पांचों राष्ट्रों, तुर्की और यूरोप तक जाने का रास्ता बहुत सरल और छोटा हो जाएगा। परिवहन-खर्च लगभग आधा रह जाएगा। मुंबई में चाबहार तक समुद्री रास्ता और उसके बाद थल मार्ग!

चाबहार के खुलने से पाकिस्तान और चीन को तकलीफ जरुर होगी। वे दोनों चाबहार से 70 मील दूर ग्वादर का बंदरगाह बना रहे हैं लेकिन मध्य एशिया और यूरोप के लिए ग्वादर से ज्यादा उपयोगी चाबहार होगा। इसके अलावा बलूचिस्तान में बन रहे ग्वादर पर स्थानीय बलूचों की टेढ़ी नजर है। जो भी हो, चाबहार के खुल जाने से सारे दक्षिण और मध्य एशियाई राष्ट्रों का एक साझा बाजार खड़ा करना आसान होगा। पाकिस्तान सहयोग करेगा तो बहुत अच्छा और नही करेगा तो उसके बिना भी अब काम रुकेगा नहीं। बस जरुरी यही है कि अब काम शुरु हो।

लेखक: वेद प्रताप वैदिक

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