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महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक हल्दीघाटी को भूली सरकार

Maharana pratap Rajasthanखमनोर- राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने 26 दिसंबर की दोपहर हल्दीघाटी के शहीद स्थल रक्त तलाई पहुँच कर प्रथम अमर स्वतंत्रता सैनानी महाराणा प्रताप की समर स्थली को नमन किया। हल्दीघाटी संग्राम में उनके सहयोगी रहे झाला मन्ना, ग्वालियर नरेश रामशाह तंवर, हकीम खान सहित आदिवासी सहयोगियों को याद कर उनकी शहादत स्थली पर पहुँच कर राष्ट्र प्रेम का अनुकरणीय उदाहारण प्रस्तुत किया है।

हल्दीघाटी दर्रे में पहुँचने से पूर्व बलीचा स्थित महाराणा प्रताप संग्रहालय के नाम से चल रहे निजी प्रदर्शन केंद्र पर राजसमन्द पुलिस के जवानों द्वारा गार्ड ऑफ़ ऑनर के साथ स्वागत किया गया।जिला कलक्टर कैलाश चंद वर्मा द्वारा स्वागत सत्कार किया गया। यहाँ हल्दीघाटी के भौगोलिक नक़्शे में 5 किलोमीटर फैले रणक्षेत्र की जानकारी दी गई । इस दौरान वहाँ संचालित डॉक्यूमेंट्री द्वारा व फाइबर के मोडल द्वारा प्रताप से जुड़े इतिहास की जानकारी दी गई।

हल्दीघाटी यात्रा में महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक का अवलोकन शामिल नहीं होने से सीधे चेतक समाधी पर चिर निद्रा में लीन स्वामिभक्त अश्व चेतक को नमन कर मूल हल्दीघाटी दर्रे पहुंचे। हल्दीघाटी दर्रे में खमनोर थानाप्रभारी जोगेन्द्र राठौड़ ने राज्यपाल को हल्दीघाटी की पावन रज भेंट की । पहाड़ी में मूल दर्रे की जानकारी दे हल्दीघाटी पर्यटन समिति के कमल मानव ने हल्दीघाटी की रक्तवर्णी माटी से उनका तिलक कर स्वागत किया।हल्दीघाटी युद्ध के मुख्य रण क्षेत्र रक्त तलाई खमनोर में राज्यपाल का स्वागत कर युद्ध से जुडी जानकारियां देते हुए हल्दीघाटी के विकास से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारी दी गई।

पर्यटन समिति द्वारा प्रेस के सहयोग से प्रतिवर्ष युद्धतिथि पर किये जा रहे दीपयज्ञ की जानकारी देकर उपेक्षित स्थलों व राष्ट्रीय स्मारक के संचालन में बरती जा रही उदासीनता से अवगत कराया। इस विषय पर राज्यपाल ने विधायक कल्याण सिंह चौहान व जिला कलेक्टर कैलाश चंद वर्मा से विस्तृत जानकारी लेकर केंद्रीय पर्यटन मंत्री से बात कर निस्तारण का आश्वासन दिया।

यहाँ उल्लेखनीय है कि सांसद हरिओम सिंह राठौड़ ने वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की कर्म भूमि और विश्व विख्यात हल्दीघाटी के विकास का मुद्दा पिछले दिनों लोकसभा में उठाया था। उन्होंने यहां के विकास के मुद्दे पर बताया कि राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में स्थित हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और मुगल शासक अकबर के बीच लड़ा गया युद्ध राष्ट्र का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए लड़ा गया युद्ध माना जाता है।

जिसमें अकबर की विशाल सेना होते हुए भी महाराणा प्रताप ने विदेशी ताकतों की प्रभुसत्ता को अस्वीकार कर दिया था। अपनी विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सीमित साधनों के दम पर आतताइयों को लोहे के चने चबवा दिए। मातृ भूमि की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया। सांसद ने ऐसे राष्ट्र गौरव और देशभक्त महाराणा प्रताप की कर्म भूमि हल्दीघाटी के समुचित विकास की बात कही थी ।

हल्दीघाटी स्वतंत्रता संग्राम भी हमारे देश के लिए गौरव का विषय है। सांसद ने केंद्र सरकार से युद्ध क्षेत्र के विकास की मांग करते हुए कहा था कि हल्दी घाटी युद्ध क्षेत्र की विस्तृत रूपरेखा तैयार कर विकास किया जाए तो पूरे राष्ट्र की आने वाली पीढियों के लिए देशभक्ति का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत होगा। यही नहीं विकास के नए आयाम से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। देशी-विदेशी सैलानियों की संख्या में बढ़ोतरी होने से क्षेत्र में बेरोजगारी की समस्या से भी छुटकारा मिलेगा।

हल्दीघाटी के समुचित विकास की मांग दोहरा कर सांसद हरीओम सिहं राठौड ने वर्तमान तक हुए विकास कार्याे के परिणाम सामने ला रख दिये है। 1997 में आरम्भ स्मारक व हल्दीघाटी के विकास कार्य 2009 में स्थानीय पर्यटन माफिया के लगातार हस्तक्षेप के चलते आज भी आधे-अधूरे है।

अपनी भौतिक लालसा के चलते स्थानीय पर्यटन माफिया ने विकास व संस्कृति का हवाला देकर राष्ट्रीय स्मारक के विकास में दी जाने वाली 76 बीघा आरक्षित भूमि में से पूर्व सरकार से 5 बीघा आंवटित करा ली फिर भी मन नहीं भरा तो 10 बीघा के आवंटन की फाईल 2012 से और लगा रखी है व आवंटन हेतु राज्यपाल की यात्रा वर्तमान यात्रा में मांग रखी गई है।

राज्यपाल द्वारा 5 लाख की घोषणा को लेकर असमंजस्य व चर्चा का माहौल है कि यह राशि निजी प्रदर्शनी को दी गई है या हल्दीघाटी के विकास कार्य हेतु की गई। भ्रष्टाचार इस कदर हावी है कि रक्त तलाई से लेकर चेतक समाधी तक पर्यटक भटकते रहते है लेकिन विभाग द्वारा किसी प्रकार की कोई जानकारी देने वाला नहीं है। चेतक समाधी के बाहर वर्दीधारी लपके पर्यटकों को कथित संग्रहालय की ओर भेजने में लगे रहते है।

राष्ट्रीय स्मारक के संचालन का जिम्मा भी माफिया द्वारा तिकडम बैठा कर महाराणा प्रताप स्मृति संस्थान के तहत करवाते हुए स्वयं संस्थापक सदस्य होने का बेजा लाभ उठाया गया है। सरकारी संग्रहालय बनता उससे पूर्व ही 2003 में राज्यपाल द्वारा अपनी निजी दुकानदारी में सरकारी नकल का शुभारम्भ कराने के बाद से पर्यटन विकास के नाम पर हल्दीघाटी के अन्य कार्याे में व्यावधान पैदा होना पूंजीवादी ताकतों को बढ़ावा है।

एक वर्ष पूर्व पर्यटन विभाग जयपुर को उप निदेशक सुमिचा सरोच ने मेवाड़ कॉम्पलेक्स योजनान्तर्गत कराये जाने वाले विकास कार्याे के संबंध में हल्दीघाटी, गोगुन्दा, दिवेर, छापली व चावण्ड के अधूरे कार्याे के लिये 7 करोड़ 93 लाख रुपयों के प्रस्ताव भेजे गये जिन पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना सरकार की हल्दीघाटी के ग्रामीण पर्यटन विकास को लेकर चलाई जा रही नीतियों का ही परिणाम नजर आ रहा है।

हल्दीघाटी के अभी तक हुए विकास कार्यों के बाद पर्यटन विभाग द्वारा पुनः 3 करोड़ 72 लाख के प्रस्ताव से यह जग जाहिर हो चुका है कि करोड़ों खर्च के बाद भी स्मारक को अधूरे रहते ही आरम्भ किया गया था। ज्ञात रहे कि हल्दीघाटी दर्रे के पदमार्ग को दुरस्त कराने व रक्त तलाई के फव्वारे आरम्भ कराने सहित समूचे विकास हेतु समय समय पर हल्दीघाटी पर्यटन समिति द्वारा समय समय पर मांग की गई थी जिस पर वर्तमान में हल्दीघाटी के एतिहासिक दर्रे के हालात जिला परिषद व वन विभाग के सहयोग से दुरस्त कराये जा रहे है।

रिपोर्ट:- कमल पालीवाल

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