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नागपुर में जन्मी ‘हार्लेक्विन बेबी’,48 घंटे रही जिंदा

herlequeenनागपुर : नागपुर में जन्मी ‘हार्लेक्विन बेबी’ की 48 घंटे बाद ही मौत हो गई। देश में इस तरह का यह पहला मामला माना गया था। इस बीमारी में बच्चे की आउटर स्किन डेवलप नहीं हो पाती। बॉडी के इंटरनल ऑर्गन्स साफ-साफ नजर आते हैं। स्किन सफेद प्लेटों में बंट जाती है। इसमें कई गहरी दरारें होती हैं। सोमवार रात तक डॉक्टर्स की लगातार कोशिशों के बावजूद बच्ची को बचाया नहीं जा सका। दुनिया में इस डिसऑर्डर से जूझने वाला यह तीसरा बच्चा था।

नागपुर के लता मंगेशकर हॉस्पिटल की डीन डॉ. काजल मित्रा ने बताया कि बच्ची को सुबह से ही सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। उसे वेंटीलेटर पर रखा गया था। शनिवार शाम को महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में अमरावती की रहने वाली 23 साल महिला ने इस बच्ची को जन्म दिया था। 1.8 किलो का ये बच्चा रेयर बॉर्न डिसीज ‘हार्लेक्विन एचथियोसिस’ से जूझ रहा था।

दुनिया में 1750 से अब तक ऐसे 12 मामले सामने चुके हैं। ऐसा पहला बच्चा अमेरिका के साउथ कैरोलीना में अप्रैल 1750 में जन्मा था। हाल ही में जर्मनी और पाकिस्तान में भी ऐसे बच्चे जन्मे थे। देश में यह पहला मामला माना गया था।

पाकिस्तान में भी हुआ था हार्लेक्विन बेबी
ऐसा रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस 1984 में पाकिस्तान में भी हुआ था। जानकारों के मुताबिक, उस बच्चे के जिंदा होने के प्रमाण 2008 तक मिले थे।

 नहीं कराई सोनोग्राफी
डॉक्टरों ने बताया कि महिला ने गर्भधारण के बाद एक भी बार सोनोग्राफी नहीं कराई थी। अगर महिला ने एक बार भी सोनोग्राफी कराई होती तो इसके बारे में पहले ही पता चल जाता। इसके बाद गर्भ के पानी का टेस्ट करके बच्चे की बीमारी का पता लगाया जा सकता था।डॉक्टरों का कहना था कि यह मामला अपने आप में अलग था। ऐसे केस में स्किन पर हमेशा वैसलीन आदि लगाने की सलाह दी है। इलाज के बाद भी स्किन पूरी तरह ठीक नहीं हो सकती।

डॉक्टर बता रहे थे जेनेटिक डिसआर्डर
सीमा कुमरे (परिवर्तित नाम) को लेबर पेन होने पर शुक्रवार की रात हिंगना स्थित लता मंगेशकर अस्पताल लाया गया था। यहां रात करीब 12:45 बजे महिला ने बच्ची को जन्म दिया। पर, यह नॉर्मल सामान्य नहीं थी। इसे देख डॉक्टर भी चौंक गए थे। यह हार्लेक्विन बेबी का केस था।- डॉ. यश बनैत ने बताया कि एबीसीए12 जीन में बदलाव होने के कारण ऐसा होता है। हार्लेक्विन बेबी की स्किन जन्म के साथ ही कड़क होती है।डॉ. बनैत ने कहा कि जीन्स में म्यूटेशन की वजह से बच्चों में ये पैदाइशी बीमारी हो सकती है। शरीर की चमड़ी एक ‘कवच’ का रूप ले लेती है। यहां तक की आंख, कान, प्राइवेट पार्ट और बाहरी हिस्से भी सिकुड़ जाते हैं।

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