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पटना- बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार किसकी दाल गलेगी। इसका पता तो मतगणना के बाद ही चलेगा, लेकिन इतना पता चल रहा है कि दाल के सहारे महंगाई ने तमाम मुद्दों को पीछे धकेल दिया है।

एक बार फिर महंगाई बिहार चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है। जाति, आरक्षण, गोमांस एवं विकास के मुकाबले महंगाई राजनीतिक दलों के लिए पुराना हथियार है। 1952 से लेकर आज तक यही एक ऐसा मुद्दा रहा है, जिसने हर चुनाव में सत्ता को परेशान किया है।

यही वजह है कि विरोधी और सहयोगी के साथ-साथ अपने भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार पर सवाल उठाने लगे हैं। महागठबंधन ने तो ‘दाल पर चर्चा’ कार्यक्रम तक बना लिया है। माना जा रहा है कि तीसरे चरण का चुनाव इसी मुद्दे पर केंद्रित होगा। यही कारण है कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के दो मंत्रियों ने संयुक्त रूप से मोर्चा संभाला है।

दोनों ने बिहार सरकार को महंगाई नहीं रोक पाने के लिए जिम्मेदार बताया है। केंद्र के ये मंत्री महंगाई के मुद्दे को राजनीति करार दे रहे हैं। पासवान का कहना है कि दाल पर बिहार सरकार केवल राजनीति कर रही है।

नीतीश कुमार जमाखोरों के साथ मिलकर लोगों की परेशानी बढ़ा रहे हैं और ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ रहे हैं। बिहार सरकार जान बूझकर केंद्र सरकार को बदनाम कर रही है। पासवान ने कहा, ‘मेरे मंत्रालय से चार पत्र गए, लेकिन बिहार सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया।

राधामोहन सिंह ने भी कुछ ऐसा ही आरोप नीतीश कुमार पर लगाया। उन्होंने कहा कि कृषि मंत्रालय एवं खाद्य आपूर्ति विभाग राज्य सरकार को छह पत्र लिख चुका है, लेकिन बिहार की सरकार ने कोई जवाब नहीं ‌दिया। बिहार में जो दाल की कीमत बढ़ी है, उसके लिए नीतीश कुमार जिम्मेदार है।

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