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महंगाई की हाहाकार-तो क्या करे मोदी सरकार?

inflation outcry If to Modi Governmentप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र की सत्ता संभाले हुए 7 महीने हो चुके हैं। सत्ता संभालने के शुरआती दिनों में जब देश की जनता प्रधानमंत्री से सुशासन अथवा गुड गवर्नेंस की बात करती थी उस समय मोदी समर्थक सरकार का हनीमून काल बताकर जनता की परेशानियों को हवा में उड़ा दिया करते थे। परंतु अब तो सरकार को बने सात महीने भी बीत चुके हैं तथा सरकार नववर्ष में भी प्रवेश कर चुकी है। क्या अ ाी तक सरकार सत्ता के जश्र में डूबी हुई है या फिर जनता की ज़रूरी समस्याओं से जूझने का उसमें साहस नहीं है अथवा इतनी क्षमता नहीं है? क्या यही वजह है कि इन दिनों देश के अखबारों व मीडिया के दूसरे माध्यमों में अब ऐसे मुद्दे ज़ोर-शोर से दिखाए व सुनाए जा रहे हैं जिनकी भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के पहलेउम्मीद ही नहीं की जा रही थी? देश के प्रत्येक धर्म-जाति व क्षेत्र का व्यक्ति यह भलीभांति जानता है कि उसकी सबसे बड़ी समस्या मंहगाई है। दूसरी प्रमुख समस्याओं में बेरोज़गारी,स्वास्थय,बिजली,पानी व सडक़ तथा $कानून व्यवस्था जैसी समस्याएं शामिल हैं। और निश्चित रूप से उपरोक्त समस्याओं को ही अपना मु य मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में घूम-घूम कर अपनी विशेष शैली में पिछली यूपीए सरकार को नाकाम ठहराने की कोशिश की थी। कई जगह तो वे यह कहते भी सुनाई दिए थे कि देश को सरकार नाम की किसी चीज़ का एहसास ही नहीं हो पा रहा है। वे बड़ी चतुराई के साथ जनता से भी हाथ उठवाकर पिछली सरकार की आलोचना करने तथा अपने समर्थन में मतदान करने का प्रदर्शन करवाते थे।

मोदी द्वारा जनता को सब्ज़ बाग दिखाए जाने वाले नारों में एक यह नारा भी था कि बहुत हुई मंहगाई की मार, अब की बार मोदी सरकार। परंतु गत् 7 महीनों में मंहगाई नियंत्रित होने का नाम ही नहीं ले रही। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की $कीमत घटने के परिणामस्वरूप भारत में भी पैट्रोल व डीज़ल की कीमत कभी एक रुपये प्रति लीटर तो कभी दो रुपये प्रति लीटर की दर से घटाई गई है जबकि पाकिस्तान जैसे अािर्थक रूप से कमज़ोर व संकटग्रस्त देश में वहां की सरकार ने कच्चे तेल की कीमत घटते ही एक ही बार में दस रुपये प्रति लीटर तेल सस्ता कर दिया था। मज़े की बात तो यह है कि भाजपा सरकार के समर्थक डीज़ल व पैट्रोल की घट रही कीमत का श्रेय नरेंद्र मोदी की सरकार को देने पर आमादा हैं। जबकि साग-सब्ज़ी,अन्न,दालें तथा तेल व रिफाईड,साबुन तथा टुथपेस्ट जैसी रोज़मर्रा की ज़रूरतों वाले सामान अभी भी दिन-प्रतिदिन मंहगे होते जा रहे हैं। सर्दी के दिनों में साग-सब्जि़यां तो प्रत्येक वर्ष सस्ती हो जाया करती थीं।

परंतु मोदी सरकार के पहले शाीतकालीन दौर में भी सब्जि़यों के दाम आसमान छू रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है इन सब्जि़यों के बढ़ते हुए दामों का लाभ सब्ज़ी उगाने वाले किसानों को भी नहीं मिल रहा है। केवल बिचौलिए ही सब्जि़यों की कीमत को चार गुणा से लेकर आठ गुणा तक की कीमत पर बेच रहे हैं। सर्दियों में पांच रुपये मिलने वाली गाजर जो कि दो दिन पहले 20 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही थी अचानक उसके दाम 40 रुपये प्रति किलो हो गए। इसी प्रकार मटर 50 रुपये किलो,टमाटर 50 रुपये किलो और आलू 20रुपये प्रति किलो बिक रहा है। दुकानदारों के अनुसार इन दिनों में इन सब चीज़ों के दाम 10 रुपये प्रति किलो या इससे भी कम होने चाहिए। गोभी जैसी साधारण सब्ज़ी जोकि इन दिनों में पांच रुपये किलो की $कीमत पर मिल जाया करती थी अब 40 रुपये प्रति किलो बिक रही है। शलजम व लौकी जैसी सस्ती सब्जि़यां 40 और 50 रुपये प्रति किलो की दर से बिकती दे ाी जा रही हैं। परंतु न तो प्रधानमंत्री जी से इस मंहगाई पर नियंत्रण पाया जा रहा है न ही अब उनके प्रतिनिधि अथवा समर्थक इस विषय पर अपना मुंह खोल पा रहे हैं?

अब तो दिल्ली में यूपीए की तरह अपंग अथवा गठबंधन सरकार भी नहीं है। गुड गवर्नेंस,सुशासन तथा रामराज्य का दंभ भरने वालों के हाथों में देश की सत्ता है। मोदी समर्थकों के कथनानुसार न केवल देश बल्कि दुनिया को ाी नज़र आ रहा है कि भारतवर्ष में एक मज़बूत प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चलने वाली एक दलीय मज़बूत सरकार है। इन्हीं के समर्थकों के अनुसार अमेरिका व चीन जैसे देश मोदी सरकार के भयवश थरथरा रहे हैं। बड़े-बड़े देश हिलने व कांपने लगे हैं।

परंतु दुनिया को हिलाने की व कंपकंपाने की कथित रूप से क्षमता रखने वाली मोदी सरकार ने देश के जिन मतदाताओं से ‘अच्छे दिन’ लाने का वादा किया था आखिर उन वादों का क्या हुआ? न तो रुकी मंहगाई की मार। न ही कम हुआ नारी पर वार। और न ही रुका भ्रष्टाचार फिर यह कैसी मोदी सरकार? और तो और प्रधानमंत्रीने पूरे देश में घूम-घूम कर विदेशों में जमा काला धन वापस लाने का जो वादा किया था वह भी परवान चढ़ता नज़र नहीं आ रहा। जबकि इस विषय पर उन्होंने दो मु य बातें कहकर जनता को प्रलोभन देकर गुमराह किया। एक तो उन्होंने सत्ता में आने के मात्र 100 दिनों में काला धन वापस लाने की गारंटी दी थी और दूसरी बात यह कही थी कि काला धन वापसी के बाद देश के प्रत्येक व्यक्ति के खाते में 15-15 लाख रुपये पड़ सकते हैं। परंतु 15 लाख रुपये देश की जनता को मिलना तो दूर अभी तक यही नहीं सुनिश्चित हो पा रहा है कि भारतीयों का विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस भी आ सकेगा या नहीं?

इसी प्रकार ओबामा द्वारा अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में नरेंद्र मोदी का भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में किया गया ऐतिहासिक स्वागत तो मोदी समर्थक बड़े गर्व के साथ बयान करते हैं परंतु इस बात का जवाब नहीं देते कि ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा आ$िखर किन परिस्थितियों में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नहीं मिलीं? इसी प्रकार पाकिस्तान जोकि भारत के लिए हमेशा सिरदर्द बना रहता है उसके साथ इन्होंने सत्ता में आते ही शाल व साड़ी की डिप्लोमेसी के द्वारा पड़ोस से अच्छे रिश्ते बनाने का संदेश देने की कोशिश की। परंतु वही पाकिस्तान है जो कि भारत में वर्तमान सरकार के सत्ता के आने के बाद अब तक सैकड़ों बार युद्ध विराम का उल्लंघन कर चुका है। तथा सीमा पर स्थिति को तनावपूर्ण बनाए हुए है। देश आर्थिक तंगी के दौर से गुज़र रहा है। जनता मंहगाई व बेरोज़गारी की मार झेल रही है। उधर प्रधानमंत्री जी नेपाल जैसे देशों की आर्थिक सहायता करने में जुटे हुए हैं। भारत में भी उनका व उनके संगठन के लोगों का पूरा ध्यान देश के विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने में लगा हुआ है।

निकट भविष्य में किन राज्यों में चुनाव होने हैं अथवा झारखंड तथा ज मु-कश्मीर जैसे राज्यों में जहां चुनाव अभी संपन्न हुए हैं ऐसे राज्यों में हज़ारों करोड़ रुपये भारतीय जनता पार्टी ने अपने विज्ञापनों पर खर्च कर दिए और करती जा रही है। देश के प्रमुख टी वी चैनल्स पर तो इन्होंने अपना नियंत्रण कर ही लिया है। बड़े आश्चर्य की बात है कि नरेंद्र मोदी व उनके सलाहकारों को तथा इनके संगठन के लोगों को यह तो मालूम है कि पूरे देश में व उन देशों में जहां नरेंद्र मोदी का दौरा होता है वहां किस प्रकार मोदी-मोदी चिल्लाकर मोदी के पक्ष में माहौल तैयार करना है। उन्हें राज्यों में किस प्रकार का वातावरण बनाकर किस प्रकार सद्भावना अथवा दुर्भावना फैलाकर चुनाव जीतने हैं? यह तो भलीभांति मालूम है। कश्मीर में क्या रुख पार्टी को अख्तियार करना है और झारखंड में क्या। इस रणनीति का तो उन्हें ज्ञान है। बंगाल व बिहार में कौन सी रणनीति अख्तियार करनी है यह मालूम है। परंतु मंहगाई पर नियंत्रण कर जनता को किस प्रकार राहत पहुंचाई जाए इसका कोई ज्ञान नहीं? फिर आखिर इन्हें पिछली सरकार को कोसने का ही क्या अधिकार था जब यह स्वयं मंहगाई को काबू नहीं कर पा रहे हैं?

देश की जनता का पेट देश के हिंदू राष्ट्र बनने से भरने वाला नहीं। न ही पड़ोसी देश नेपाल के पुन: हिंदू राष्ट्र बन जाने से भारतवासियों की भूख व बेरोज़गारी समाप्त होने वाली है। न ही धर्म परावर्तन या घर वापसी जैसे भावनात्मक ढोंगपूर्ण माहौल बनाने से देशवासियों का ेकोई राहत मिलने वाली है। देश की आम जनता मंंहगाई से त्रस्त होकर हाहाकार कर रही है और गंूगी व बहरी बनी बैठी मोदी सरकार धरातलीय जनसमस्याओं का समाधान करने के बजाए देश की जनता को भावनात्मक विषयों में उलझाने की कोशिश कर रही है। ऐसी स्थिति सर्वथा अनुचित व चिंतनीय है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि मंहगाई दूर करने सहित जिन मुद्दों को उछालकर वे सत्ता में आए थे उन पर यथाशीघ्र अमल हो अन्यथा जिस प्रकार सात महीने बीत चुके हैं उसी प्रकार पांच वर्ष का समय बीतते भी अधिक देर नहीं लगने वाली?

:-निर्मल रानी

nirmalaनिर्मल रानी
1618, महावीर नगर
अबाला शहर,हरियाणा।

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