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जल सत्याग्रह : अब पानी में नहीं सड़कों पर होगी लड़ाई

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खंडवा – मध्यप्रदेश के खंडवा जिले के घोघलगांव में पिछले 32 दिनों से जारी जल सत्याग्रह आज स्थगित कर दिया गया। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय सिंह ने आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा भेजी गई अपील सत्याग्रहियों को सुनाई और सब ने एक मत होकर इस आंदोलन को प्रदेश व देशव्यापी बनाने का संकल्प लेकर जल सत्याग्रह स्थगित कर दिया।
 
 पिछले 32 दिनों से नर्मदा बचाओं आंदोलन कार्यकर्ताओं और ग्रामीण विस्थापन के विरोध में जल सत्याग्रह कर रहे थे। ओंकारेश्वर बांध का वाटर लेबल 191 मीटर भरने पर पानी ग्रामीणों के खेत तक पहुंच गया था। आंदोलनकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को विस्थापन की नीतियों के विरूद्ध कार्य किए जिसकी वजह से सैकड़ों ग्रामीण प्रभावित हुए। सत्याग्रह स्थगित कराने गए आप नेता संजय सिंह ने कहा कि सरकार ने 32 दिन में कोई भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया अब इसे प्रदेश व देशव्यापी आंदोलन बनाकर भोपाल-दिल्ली में प्रदर्शन किया जायेगा।
 
पिछले 32 दिनों से ग्रामीणों के साथ पानी में रहकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले आलोक अग्रवाल ने सरकार के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली। उन्होंने कहा कि किसान विरोधी इस सरकार से किसी तरह की न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती अब सड़क पर आकर सरकार को आईना दिखाना होगा।
गौरतलब है कि 2012 में भी इसी तरह का जल सत्याग्रह हुआ जिसमें 17 वें दिन सरकार ने मांगे मानकर जल सत्याग्रह समाप्त कराया था लेकिन इस मर्तबा सरकार ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और आखिरकार सत्याग्रहियों को आंदोलन स्थगित करना पड़ा। 

जल सत्याग्रहियों ने तीसरी बार भूमि लेने से किया इन्कार
खण्डवा। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण भोपाल से प्राप्त जानकारी अनुसार ओंकारेश्वर सिंचाई परियोजना जलाशय के पानी में विगत कई दिनों से खड़े होकर भूमि के बदले भूमि की मांग करने वालों ने राज्य सरकार द्वारा तीसरी बार प्रस्तावित भूमि भी अस्वीकार कर दी। भूमि के बदले भूमि की मांग करने वाले पांच प्रतिनिधियों को नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, एनएचडीसी, औद्योगिक केन्द्र विकास निगम तथा जिला प्रशासन होशंगाबाद के अधिकारियों ने होशंगाबाद जिले में भूमि का अवलोकन कराया।

होशंगाबाद जिले के ग्राम पीलीकरार में उपजाऊ भूमि का अवलोकन कराकर अधिकारियों ने इसे स्वीकार करने का आग्रह किया। डूब प्रभावित प्रतिनिधियों ने इस भूमि को भी लेने से इन्कार कर दिया। उल्लेखनीय है कि बाबई क्षेत्र की भूमि उपजाऊ भूमि के रूप में सर्वज्ञात है।

जलाशय के पानी में खड़े होकर आन्दोलन करने वाले डूब प्रभावितों ने पूर्व में मुआवजे और विशेष पुनर्वास अनुदान की राशि शासन को लौटाकर जमीन के बदले जमीन ही लेने की मांग की थी। इस मांग पर शासन द्वारा लेण्ड बैंक से प्रत्येक पात्र को 2 हेक्टेयर भूमि आवंटित कर दी गई थी। इस भूमि को विभिन्न कारण बताकर अस्वीकार कर दिया गया था। बाद में वर्ष 2013 में राज्य शासन द्वारा डूब प्रभावित कृषकों के लिये स्वीकृत 225 करोड रूपये के विशेष पैकेज के अंतर्गत देय राशि लेने से भी 213 डूब प्रभावितों ने इन्कार करते हुये भूमि के बदले भूमि की मांग जारी रखी।
 
प्रभावितों के प्रतिनिधियों से आरम्भ में राज्य के मुख्य सचिव तथा बाद में नर्मदा घाटी विकास विभाग के राज्यमंत्री तथा विभाग के प्रमुख सचिव ने चर्चा की। उन्हे आश्वस्त किया गया कि सरकार डूब भूमि के बदले अन्य उपजाऊ भूमि लेने के विकल्प प्रदान करेगी। इसी के तहत राज्य सरकार ने उन्हे 6 मई को नरसिंहपुर जिले की कृषि योग्य उपजाऊ भूमि का स्थल अवलोकन कराकर भूमि लेने का आग्रह किया। अवास्तविक तर्कों को आधार बनाकर नरसिंहपुर जिले की भूमि लेना स्वीकार नहीं किया। तीसरे विकल्प के रूप में 12 मई को डूब प्रभावितों के प्रतिनिधियों को होशंगाबाद जिले की बाबई तहसील में कृषि भूमि का अवलोकन कराया। इस भूमि को भी लेने से इन्कार कर देने पर अधिकारियों का दल वापस लौट आया है।
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