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ज्योतिष विज्ञान : नाड़ी दोष का महत्व

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ज्योतिष विज्ञान में आमतौर पर अवकहड़ा चक्र का उपयोग नामाक्षर राशि वर्ण, वैध्य योनी महावैर त्रण नाड़ी मुख्य इसका के लिए किया जाना है। इसका सर्वाधिक महत्व वर-वधु की वुंहृडली के मिलान के लिए होता है। इसकी सहायता से प्राथमिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है, साथ ही नवजात शिशु के लिए नामाक्षर ज्ञात किया जा सकता है।

नवग्रहों को सत्ताइस नक्षत्रों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है, प्रत्येक राशि तीस अंश के होने के कारण बारह भाव का कुल योग 360 अंश होता है। जिसमें प्रत्येक नक्षत्र 13 अंश, 20 अंश का है, इसलिए प्रत्येक भाव में सवा दो नक्षत्र विद्यमान हैं।

उदाहरणस्वरूप मेष राशि में अश्वनि, भरणी तथा कृतिका के प्रथम चरण तक का आधिपत्य है, इसी प्रकार से वृष राशि में कृतिका नक्षत्र के शेष तीन चरण रोहणी तथा मृगशिरा नक्षत्र के दो चरण हैं। प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होने से प्रत्येक चरण नामाक्षर के चरणाक्षर को दर्शाता है। नक्षत्र के अनुसार ही जो कि प्रायः प्रतिदिन परिवर्तित होते हैं, राशि, वर्ण, वैश्य, योनि, महावैर, गण, नाड़ी, युज्जा, हंसका का संकेत मिलता है।

इसमें विवाह के समय प्रमुख रूप से नाड़ी दोष का महत्व है जो वर-वधु की जन्मकुंडली में ब्लड गु्रप को संकेत करते हैं। गण तीन प्रकार के होते हैं एवं गण का मिलान ही विवाह के समय अत्यंत महत्वपूर्ण रहता है चूंकि इसके अलावा भी वर्ण, वैश्य योनि इन सभी का महत्व है इसलिए इन सबका युति द्वारा ही छत्तीसगुणों का निर्माण होता है।

अब इन छत्तीस गुणों में यदि भृकुट दोष न हो और कम से कम बीस गुण मिलने पर वर-वधु की कुंडली मध्यम श्रेणी के अंतर्गत आती है। जब पच्चीस गुणों से अधिक गुणों का मिलान होता है तब श्रेष्ठता की श्रेणी में कुंडली मिलान को इंगित करते हैं, किंतु यह भी आवश्यक है कि समस्त छत्तीस गुण भी न मिलें।

अवकहड़ा चुक्र ही एकमात्र विस्तार से किसी भी जन्मकुंडली के लिए नक्षत्रों के आधार पर समस्त जानकारी का ज्योतिष स्तंभ है। जिससे हमें संपूर्ण जानकारी मिलती है।

यह नवजात शिशु के नामाक्षर से लेकर नव विवाहितों के जन्मकुंडली के मिलान में सहयोग प्रदान करती है,यही कारण है अवकहड़ा चक्र की पूर्ण जानकारी ज्योतिष विज्ञान के लिए एक आवश्यक अंग है।

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