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द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन से पापों से मुक्ति ,स्वर्ग की प्राप्ति

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द्वादश ज्योतिर्लिंग में सोमनाथ प्रथम ज्योतिर्लिंग है। यह ज्योतिर्लिंग गुजराज में है। इस ज्योतिर्लिंग की प्रतिष्ठा कर चंद्रमा ने भगवान शंकर की तपस्या की थी।

फलस्वरूप भगवान ने चंद्रमा को वरदान दिया। इसीलिए चंद्रमा यानी सोम के नाम से यह ज्योतिर्लिंग विख्यात हुआ। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन से ही मनुष्य के समस्त पापों से मुक्ति मिलती है एवं मनोवांछित फल पाकर मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

सोमनाथ के प्रचीन मंदिर को विदेशी आततायियों ने कई बार नष्ट किया। अब उसी स्थान पर नया मंदिर बना है। जिसका निर्माण भागर के पहले गृहमंत्री बल्लभभाई पटेल की प्रेरणा से भारत सरकार ने कराया था। इस मंदिर के निर्माण में प्राचीन सोमनाथ मंदिर के अवशेषों का फी पर्याप्त प्रयोग किया गया है।

यह मंदिर सागर तट पर स्थित है। इसके निकट इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्माण करवाया गया अति प्राचीन शिव मंदिर भी है।

यहां पाटन नामक एक दुर्ग था। जिसका भग्नावेश अभी तक विद्यमान है। इसी दुर्ग में यहां की बस्ती और सोमनाथ का मंदिर है। इसका पौराणिक नाम प्रभास क्षेत्र है। अतः इसे प्रभास पाटन भी कहते हैं।

शैवों और वैष्णवों, दोनों का यह तीर्थ स्थान है। यहीं जरा नामक शिकारी के बाण से श्रीकृष्ण ने अपना शरीर त्याग दिया था। सोमनाथ मंदिर पहुंचने के लिए पश्चिम रेलवे के राजकोट-गोंडल-जूनागढ़ -वेरावल रेलमार्ग पर जूनागढ़ से 83 किलोमीटर दूर वेरावल स्टेशन है। यहां से आठ किलोमीटर दूरी पर सोमनाथ मंदिर है।

 

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