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सियासत का अखाड़ा बना खंडवा जिला सहकारी बैंक

प्रदेश की कमलनाथ सरकार स्थानीय निकाय चुनाव और निगम मंडलों की नियुक्ति से पहले सहकारी बैंकों में प्रशासकों की नियुक्ति कर अपने बिखरे और लुप लाईन में पड़े नेताओं को एडजस्ट करने में लगी हुई है। खंडवा जिला मुख्यालय स्थित जिला सहकारी केंन्द्रीय बैंक में और बुरहानपुर के नवलसिंह सहकारी कारखाने में प्रशासक की नियुक्ति को लेकर गहमागहमी है। अब देखना होगा कि खंडवा संसदीय क्षेत्र के किन नेताओं के भाग्य में यह पद जाते हैं, फिलहाल लगभग एक दर्जन से अधिक नामों की चर्चा राजनैतिक गलियारों में चल रही है।

खंडवा [ शेख शकील ] प्रदेश सरकार ने अपेक्स बैंक के बाद जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों में प्रशासक के तौर पर अपने भरोसेमंद लोगों की नियुक्ति का सिलसिला शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ के क्षेत्र छिंदवाड़ा के जिला सहकारी बैंक में प्रशासक बनाया गया है। सहकारिता विभाग ने किसी भी विवाद से बचने के लिए सभी बैंकों से लिखित में लिया है कि जिन्हें प्रशासक नियुक्त किया जा रहा है वे पात्रता पूरी करते हैं।

छिंदवाड़ा हुई नियुक्ति के बाद से खंडवा जिले के कांग्रेस नेताओं ने भोपाल की दौड़ शुरू कर दी है। खंडवा लोकसभा के प्रमुख जिले खंडवा-बुरहानपुर से एक दर्जन से अधिक नाम सामने आए हैं। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि किस गुट के नेता को जिला सहकारी बैंक का प्रशासक नियुक्त किया जाता है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री कमलनाथ सभी नेताओं की सहमति बनाकर यह नियुक्ति करना चाहते हैं जिससे आगामी स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी के अंदर विरोध न पनपे।

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरूण यादव, प्रभारी मंत्री तुलसीराम सिलावट ने अपने-अपने करीबियों के नाम आगे बढ़ाए हैं। फिलहाल प्रदेश सरकार इस नियुक्ति को लेकर ऐसे चेहरों की तलाश में हैं जिनका सहकारिता से संबंध रहा हो या पूर्व में डायरेक्टर या अन्य पदों पर रहे हों। प्रदेश सरकार की तय गाईडलाईन के हिसाब से प्रशासक पद की लालसा में लगे लोगों से बकायदा बायोडाटा भी लिया गया है। नीचे देखे प्रमुख दावेदार की सूची

अरूण यादव टीम – सुनील सकरगाये,अजय रघुवंशी
सूत्रों के अनुसार अरूण यादव के करीबी माने जाने वाले दो नाम इस दौड़ में प्रमुख रूप से शामिल है। बताया जा रहा है कि अरूण यादव की तरफ से दो नाम दिए गए हैं जिसमें पूर्व सांसद कालीचरण सकरगाये पुत्र सुनील सकरगाये और बुरहानपुर के कांग्रेस अध्यक्ष अजय रघुवंशी हैं। दोनों ही अरूण यादव के करीबी हैं और खंडवा-बुरहानपुर जिले की राजनीति में सक्रिय है। सुनील सकरगाये के पिता स्व. कालीचरण सकरगाये लंबे समय जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद पर रहें। वहीं अजय रघुवंशी लंबे समय से बुरहानपुर जिले की राजनीति में सक्रिय है। यह माना जा रहा है कि अपेक्स बैंक का अध्यक्ष अरूण यादव के न बनने पर जिला सहकारी बैंक में उनकी ही चलेगी जिससे सुनील सकरगाये और अजय रघुवंशी की स्थिति मजबूत दिख रही है।

दिग्विजयसिंह खेमा
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह की तरफ से अवधेशसिंह सिसोदिया और अशोक पटेल के नाम दिए गए हैं। दोनों ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। अवधेशसिंह सिसोदिया सहकारिता से जुड़े होने के साथ दिग्विजयसिंह के करीबी माने जाते हैं। दूसरी तरफ अशोक पटेल पूर्व में राज्य सहकारिता बैंक के संचालक भी रह चुके हैं। इन्हें एक लंबा अनुभव है और इसी अनुभव के आधार पर दिग्विजयसिंह गुट से यह दोनों नाम मजबूत बताए जा रहे हैं।

तुलसीराम सिलावट के करीबी
प्रदेश स्वास्थ्य और जिले प्रभारी मंत्री तुलसीराम सिलावट ने अपने जो दो नाम दिए हैं उनमें प्रमुख रूप से बुरहानपुर के निर्दलीय विधायक सुरेन्द्रसिंह शेरा के परिवार से चंदा भैया का नाम आगे बढ़ाया है। बताया जाता है कि पूर्व सांसद स्व. ठा. शिवकुमारसिंह के परिवार की सहकारिता में अच्छी पकड़ है इस वजह से चंदा भैया का नाम आगे बढ़ाया है। जानकारों की माने तो प्रभारी मंत्री ने ठाकुर परिवार से नाम आगे बढ़ाकर निर्दलीय विधायक और ठाकुर समर्थकों को एडजस्ट करने का प्रयास किया हैं। दूसरा नाम है खंडवा से परमजीतसिंह नारंग का, पाटू भैया पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी माने जाते हैं।

श्रीमती हर्ष देवड़ा,पूनम पटेल और कुंदन मालवीय
सूत्रों के अनुसार राजनैतिक आकाओं के अलावा अपने पूर्व अनुभव और प्रदेश सरकार की गाइडलाईन में फिट बैठ रहे अन्य नाम भी सामने आ रहे हैं जिसमें पूर्व अध्यक्ष श्रीमती हर्ष देवड़ा और पूनम पटेल के नामों की चर्चा भी जोरो पर है। मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी माने जाने वाले कांग्रेस नेता कुंदन मालवीय जिले में काफी सक्रिय है। विधानसभा चुनाव में कांगे्रेस को मिली असफलता के बाद भी कुंदन मालवीय ने जिले में अपनी एक अलग पहचना बनाई है। मुख्यमंत्री के करीबी होने का फायदा उन्हें मिल सकता है।

2003 में भंग की गई समितियों के सदस्यों को अधिक उम्मीदें
वर्ष 2003 में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्रदेश की प्राथमिक समितियों से लेकर जिला, राज्य सहकारिता समितियों को भंग कर दिया गया था। जब समितियां भंग की गई तब उनका कार्यकाल लगभग ढाई साल ही हुआ था। ऐसे में उस समय के सदस्य अब सरकार से यह उम्मीद लगाए बैठे है कि उन्हें प्राथमिकता दी जाए। अगर ऐसा होता है तो अशोक पटेल, हर्ष देवड़ा, अवधेशसिंह सिसोदिया को मौका मिल सकता है।

वर्ष 2000 में आमने-सामने थे दिग्विजयसिंह और सुभाष यादव
राजनैतिक जानकारों के अनुसार वर्ष 2000 में जब सहकारिता बैंक अध्यक्ष का चुनाव होना था उस समय दिग्विजयसिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और स्व. सुभाष यादव उपमुख्यमंत्री। दिग्विजयसिंह की तरफ से स्व. तनवंतसिंह कीर, अवधेशसिंह सिसोदया और अशोक पटेल के नाम थे और स्व. सुभाष यादव की तरफ से हर्षराज देवड़ा और पूनम पटेल के नाम थे।

जानकारों के अनुसार दोनों ही प्रदेश के नेताओं ने अपनी ताकत लगा दी थी। दिग्विजयसिंह की रणनीति काम आई और उन्होंने पूनम पटेल को अपना समर्थन देकर अध्यक्ष बनवा दिया था। जिले में इस चुनाव के बाद कई बार कांग्रेसी गुटबाजी खुलकर सामने देखने को मिली। हालांकि पूनम पटेल अध्यक्ष बनने के बाद पुन: सुभाष यादव गुट में शामिल हो गए थे और उन्हें जिला कांग्रेस अध्यक्ष भी बनाया गया था।

सहकारिता के जानकारों के अनुसार प्रदेश की कांग्रेस सरकार पूरे प्रदेश की समितियों व बैंकों पर अपना एकाधिकार रखना चाहती है। फिलहाल प्रदेश सरकार द्वारा प्रशासक पद की जो नियुक्ति की जानी है उसका कार्यकाल लगभग एक वर्ष का होगा। इस एक वर्ष में कांग्रेस आगामी सहकारिता चुनाव की जमीन तैयार करेगी जिससे अधिक से अधिक जिला सहकारी बैंकों व समितियों पर कांग्रेसी नेताओं को मौका दिया जा सके।

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