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कोरकू आदिवासियों ने अपनी भाषा को सहेजने के लिए उठाई आवाज़

खंडवा : भारत में विभिन्न जाति धर्मों के लोग रहते हैं। सभी की अपनी बोली और अपनी ही भाषा हैं।

गुरुवार के दिन विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर जहां देश भर में हिंदी भाषा को लेकर आयोजन किए गए वहीं खंडवा में आदिवासीयो की भाषा और उनकी संस्कृति को बचाने के लिए एक सेमिनार का आयोजन किया गया।

इस सेमिनार में आदिवासी परम्परा से जुड़े गहने , बर्तन के साथ ही जड़ीबूटियों कि प्रदर्शनी भी लगाई गई। इस प्रदर्शनी में सबसे खास था कोदा कुटकी।

कोदा कुटकी एक तरह का अनाज होता है जो कोरकू जाति के आदिवासी ही उगाते हैं। इसे खाने से कभी भी आप को शुगर जैसी गंभीर बीमारी नहीं होंगी।

खंडवा में आदिवासियो के लिए काम करने वाली एक संस्था स्पंदन समाज सेवा समिति ने गुरुवार को एक सेमिनार आयोजित कर आदिवासी परंपरा खानपान और कोरकू भाषा के संरक्षण पर बात की गई।

आयोजन में खंडवा बुरहानपुर और बैतूल जिले के कोरकू आदिवासीयों के प्रमुख ने हिस्सा लेकर कोरकू भाषा और परंपरा को बढ़ाने का बीड़ा उठाया।

सेमिनार में कोरकू जाति की परंपरागत चीजों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। इन वस्तुओं में लड़की से बने सामान के साथ ही चांदी से बने परंपरागत जेवर और वन्य वन औषधियों को रखा गया था। आदिवासी समाज अब अपनी परम्परा और भाषा को संरक्षित करने के मांग कर रहा हैं।

वहीं प्रदर्शनी में कोरकू जाति के लोगों द्वारा उगाया जाने वाला खास किस्म का अनाज कोदा कुटकी भी प्रदर्शन के लिए रखा गया था।

कोदा कुटकी की खासियत ये हैं की इस अनाज को खाने से जहां पाचन तंत्र सही रहता है वहीं ये शुगर के मरीजों के लिए राम बांड का काम करता हैं।

स्पंदन समाज सेवा समिति की सिमा प्रकाश बताया की आदिवासी समाज सब से सभ्य समाज हैं जहां किसी किस्म के अपराध को कोई जगह नहीं हैं।

उन्होंने कहा कोरकू समाज के लोग हजारो साल पहले अफ्रीका के लेमुरिया से पलायन करके यहाँ आए थे। ये आदिवासी उन्नत कौशल के धनी हैं इन्होंने बहुत पहले ही लकड़ी के बर्तन और रोजमर्रा में काम आने वाली चीजें ईजाद कर ली थी।

सामाजिक कार्यकर्त्ता सिमा प्रकाश ने कहा कि दुनियां आज हर्बल के इस्तेमाल की बात कर रही हैं लेकिन हर्बल का इस्तेमाल हजारों साल पहले कोरकू आदिवसियों ने शुरू कर दिया था।

उन्होंने आदिवासियों के द्वारा उगाए जाने वाले अनाज कोडा कुटकी को लेकर कहा कि यह अनाज सिर्फ कोरकू प्रजाति के लोग ही उगते हैं।

आज शुगर के मरीजों की संख्या बढ़ते जा रही हैं वहीं अब डॉक्टर कोदा कुटकी जैसे अनाज खाने की सलाह दे रहे हैं। ये अनाज सिर्फ कोरकू ही उगाते हैं इस लिए इसका उन्हें कोई मोल नहीं मिल पता जबकि इंटरनेशनल मार्किट में कोदा कुटकी अनाज की कीमत तीन सौ से चार सौ रूपये प्रति किलों हैं।

अगर सरकार इस अनाज का समर्थन मूल्य तैयार कर दे तो आदिवासियों को आर्थिक फायदा मिल सकता हैं। जिससे उनका लाइफ स्टाइल और सुधर जायगा।

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