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राजनीति का विकास फिल्मी तर्ज पर

भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् विज्ञान के साथ-साथ राजनीति ने भी आशातीत सफलता अर्जित की है एक और जहां विज्ञान चन्द्रमा मंगल पर पहुंचा वहीं देश की राजनीति पाताल लोक पहुंच गई। जहां एक समय राजनीति समाज सेवा का मिशन हुआ करती थी आज धंधा बन एक कार्पोरेट की तरह व्यवहार कर रही है यूं तो धन्धे के भी अपने-अपने असूल होते हैं पहले प्रोडक्ट की गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं होता था लेकिन राजनीति में गुणवत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण अब मार्केटिंग हो गया है काम कुछ भी कैसा भी हो या न हो चलेगा।

यही कारण है कि आज राजनीति में अपनी और पार्टी की ब्रांडिंग के लिए बकायदा बड़ी-बड़ी कम्पनियां एवं आई.टी.सेक्टर अपनी सेवाएं सशुल्क प्रदान कर रहे हैं। चूंकि आज कलयुग में हम जी रहे है और तुलसी बाबा कह गये कलयुग में जो जितने गाल बजायेगा उतनी ही प्रसिद्ध पायेगा।

उनके द्वारा वर्णित कलयुग के सभी संकेत अक्षरशः सच साबित हो रहे हैं। कंपनी में तो कर्मचारी जी तोड़ मेहनत अपने मालिक के लिए करता हैं। लेकिन, राजनीति में पार्टी से ज्यादा निहितार्थ के लिए दिन रात काम करता है अपने विचित्र तर्कों के माध्यम से को पार्टी का कार्यकर्ता कम अच्छा वकील होने में लगा हुआ है।

निःसन्देह आज राजनीति किसी भी धन्धे से ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है। रसूक और धन-दौलत बिना टेक्स की चिंता के मिलती सो अलग! आज राजनीति एक रंगमंच के पात्रों की तरह व्यवहार कर रही है जिस पर दर्शक जितनी तालियां लुटा दे उतना ही हिट जिस तरह नाट्य एवं फिल्म में एक विलेन की जरूरत होती है जो फिल्म केा आगे चलाने के लिए दर्शकों में रोमांच एवं सस्पेंस को बनाता है वैसे ही राजनीति में भी ऐसे कलाकारों का महत्व और भी बढ़ जाता है।

बात राजनीति एवं संवाद की चल रही है अचानक एक यक्ष प्रकट हो कुछ प्रश्न पूछने लगता है चुनाव के मौसम में ही क्यों जाति, धर्म, लिंग, चरित्र एवं गढ़े मुद्दों को जिलाया जाता हैं। क्यों विकास, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, समाज में व्याप्त कुरूतियों, बुराईयों को दफन कर दिया जाता है? क्यों ये मूल मुद्दे चुनाव में टिक नहीं पाते?

क्यों बार-बार जनता छली जाती है? क्यों अपराधी बेखौफ घूमते हैं? क्यों दागी महिमा पंडित हो रहे हैं? क्यों शुचिता का मुलब्बा चढ़ाया जाता है? क्यों किसी की निजिता में झांका जाता हैं? क्या सब जनता की मूलभूत समस्याओं पर भारी है? क्यों उल जुलुल की बातों का वातावरण तैयार कर जनता को भय दिखाया जाता है? क्यों चुनाव के बाद फिर इन बातों पर चर्चा नहीं होती? कहीं ये जनता के साथ धोखा तो नहीं? वेताल भी बीच में कूद पड़ता है और पूंछता है बता चुनाव लोकतंत्र का पर्व है या युद्व? यदि पर्व है तो मन, वचन, कर्म, में शुद्धता परम आवश्यक है।

यदि युद्ध है तो फिर जंग में हर तरह की चालबाजी जायज है फिर बात चाहे अस्त्र शस्त्र की हो या धोखा देने की। आज अस्त्र-शस्त्र के रूप में इलेक्ट्रानिक एवं प्रिन्ट मीडिया भी अपने-अपने शबाब पर है निःसंदेह चुनाव समर में सभी पार्टी योैद्धा अपने-अपने तरह के शब्द बाणों से प्रहार कर रहे है फिर चाहे देश की इज्जत छलनी हो या समाज की, वैसे भी कोई यह नहीं पूछता कि युद्ध कैसे जीता, जो जीता वही सिकंदर, चुनाव जीतने एवं फर्श से अर्श तक पहुंचने की फिलहाल सफल कला मानी जा रही है। दर्शक अर्थात् जनता को भी मजा आ रहा है। अब देखना ये है कि किसकी फिल्म हिट होती है और किसकी चुनाव बैलेट बाॅक्स पर पिटती हैं।

डाॅ.शशि तिवारी
शशि फीचर.ओ.आर.जी.
लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हैं
मो. 9425677352

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