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मंदी से टूट रहा है मोदी सरकार की तरक्की का तिलिस्म

केंद्र की मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी की शुरुआत में ही दो धमाकेदार कदम उठाए। पहला मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की कुप्रथा से छुटकारा दिलाने वाला कानून बनाया और दूसरा जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को एक ही झटके में निष्प्रभावी कर राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाया ।

मोदी सरकार के इन दोनों साहसिक फैसलों का देश भर में स्वागत किया गया ,लेकिन इसके बाद ही देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती को जो खबरें तेजी से आने लगी ,उसने सरकार के उत्साह और उल्लास दोनों पर पानी फेर दिया। देश के अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने लगभग एकमत में यह व्यक्त करने से परहेज नहीं किया कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती धीरे-धीरे मंदी का रूप ले सकती है।

सरकार विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा इसके लिए सरकार की आलोचना को तो विरोध के लिए विरोध की राजनीति कह कर खारिज कर सकती है ,परंतु जब सरकार के ही पूर्व आर्थिक सलाहकार और सत्ता पक्ष के कुछ नेता ही अर्थव्यवस्था की निरंतर धीमी पड़ती रफ्तार के लिए सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े करने लगे तो सरकार के लिए यह स्थिति चिंता का कारण बनना स्वभाविक है।

मोदी सरकार की दूसरी पारी के पहले आम बजट में देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह शेर पढ़कर बहुत तालियां बटोरी थी कि “यकीन हो तो जरूर कोई रास्ता निकलता है, हवा की ओट लेकर भी चिराग जलता है। परंतु जिस तरह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अर्थव्यवस्था में सुस्ती दूर करने हेतु नई घोषणाएं कर रही है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि उनको भी स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लग चुका है। उनके द्वारा की गई बड़ी-बड़ी घोषणाओं से वे यह संदेश देने में सफल हुई है कि वे स्थिति की गंभीरता पर पैनी नजर रखे हुए हैं और उनके द्वारा की जा रही घोषणाएं उनके सजग वित्त मंत्री होने का सबूत देती है।

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परंतु देश के नामचीन अर्थशास्त्री इन उपायों को अपर्याप्त बताते हुए कह रहे हैं कि यह केवल फौरी राहत प्रदान कर सकते हैं। इससे अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन मजबूती मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। निसंदेह ऐसे बयानों से वित्त मंत्री का यकीन भी डगमगाने लग सकता है। निर्मला सीतारमण को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि केंद्र में पहली बार वित्त मंत्री का पद संभालते ही उन्हें इस कठिन इम्तिहान से गुजरना पड़ेगा ।

खैर इसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा क्योंकि यह स्थिति अचानक निर्मित नहीं हुई है। भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती के लिए अंतरराष्ट्रीय कारकों को भी एकदम नहीं नकारा जा सकता। कारण कुछ भी हो ,परंतु ऐसी स्थिति से निपटना तो सरकार की ही जिम्मेदारी है और अपनी इस जिम्मेदारी से सरकार पूरी तरह वाकिफ है। इसका आभास वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा की जा रही घोषणाओं से होता है।

अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती रफ्तार ने विपक्षी कांग्रेस पार्टी को मुखर होने का मौका दे दिया है, जो लोकसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा के बाद से ही हताशा के दौर से गुजर रही है। पार्टी का कहना है कि देश में भय का माहौल है और मोदी सरकार के पास ऐसा कोई विजन नहीं है ,जिससे वह लड़खड़ा रही अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर ला सकें। उधर भाजपा के राज्यसभा सांसद एवं अर्थशास्त्री डॉ सुब्रमण्यम स्वामी कह रहे हैं कि पांच लाख करोड डालर की अर्थव्यवस्था का सपना केवल साहस एवं ज्ञान से साकार नहीं हो सकता।

पूर्व प्रधानमंत्री एवं अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह अर्थव्यवस्था में आई इस भयावह सुस्ती के लिए नोटबंदी एवं जीएसटी के कुप्रबंधन को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि जीडीपी का 5 फ़ीसदी पर पहुंचना इस बात का संकेत है कि हम मंदी के भंवर में फंस चुके हैं और यह स्थिति मानवीय भूलों का ही नतीजा है।

आश्चर्य की बात यह है कि कांग्रेस पार्टी इसके लिए सड़कों पर विरोध जताने की तैयारी तो कर चुकी है, परंतु प्रधानमंत्री एवं अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह यह बताने के लिए तैयार नहीं है कि आखिर किन प्रभावी कदमों से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। इधर यह भी सही है कि अब सरकार को अर्थशास्त्रियों से सलाह मशवरा करने में संकोच नहीं करना। चाहिए ।सरकार को उनके द्वारा सुझाए जाने वाले उपायों पर गंभीरता से गौर करना होगा।

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि सरकार को नए आर्थिक सुधारों के साथ आगे आना चाहिए, जिससे कि निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे आए। प्रसिद्ध उद्योगपति एवं ब्रिटानिया ग्रुप के एमडी को तो स्थिति यहां तक निराशाजनक लग रही है कि उन्होंने यह बयान दिया कि आर्थिक मंदी ने लोगों को 5 के बिस्कुट खरीदने से पहले दो बार सोचने के लिए विवश कर दिया है। ऐसे बयान अतिरंजित भी हो सकते हैं, परंतु इनसे स्थिति की भयावहता का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है।

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में ऑटोमोबाइल क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान होता है, परंतु इस समय यह क्षेत्र भी आर्थिक सुस्ती का शिकार हो गया है। वित्त मंत्री ने इस क्षेत्र को संकट से उबारने के लिए कई घोषणाएं की है, परंतु ऑटो सेक्टर उससे संतुष्ट नजर नहीं आ रहा है और वह और राहत पैकेज की मांग कर रहा है।

अशोक लीलैंड कंपनी ने पिछले दिनों अपने निर्माण कारखानों में उत्पादन की प्रक्रिया को 16 दिन के लिए बंद करने की घोषणा की थी। उसके बाद महिंद्रा एंड महिंद्रा ने भी बिक्री और उत्पादन में समायोजन स्थापित करने के लिए वर्तमान तिमाही में 8 से 17 तक उत्पादन बंद रखने का फैसला किया। कंपनी का कहना है कि कारखानों एवं शोरूम में वाहनों का पर्याप्त स्टाक होने के कारण इस फैसले का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ऑटो सेक्टर में पिछले साल की तुलना में इस साल मांग में 40% गिरावट आने से ऑटोमोबाइल कंपनियां चिंता में पड़ गई है। हालांकि सरकार लोगों को वाहनों की खरीदी के लिए प्रोत्साहित करने हेतु नई-नई लुभावनी घोषणाएं लेकर आ रही है। सरकारी विभागों के द्वारा वाहन खरीदी पर लगाया गया प्रतिबंध भी हटा लिया गया है, परंतु नए वाहनों की मांग में इजाफा नहीं हो रहा है।

वैसे इसके दूसरे कारण भी है, जिनमें प्रमुख यह है कि सरकार ने अप्रैल 2020 से प्रदूषण रोकने के लिए बीएस6 मानक वाले इंजन के इस्तेमाल की अनुमति देने का फैसला किया है। इस कारण शायद लोगों ने यह तय किया है कि वह अगले साल इस मानक वाले इंजनों से युक्त वाहन ही खरीदेंगे। इसलिए बीएस-4 मानक वाले वाहनों की बिक्री में कमी आ गई। ऑटो उद्योग क्षेत्र में निश्चित रूप से बेरोजगारी भी बढ़ रही है। ऑटोमोबाइल कंपनियों का कहना है कि निजी और वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में कमी का एक कारण यह है कि बैंकिंग एवं गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां वाहन ऋण देने में रुचि नहीं दिखा रही है। बैंकों का एनपीए बढ़ना भी इसका एक कारण है।

कारण जो भी हो लेकिन ऑटो सेक्टर को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को और आकर्षक योजनाएं लेकर आना होगा। जो लोग बीएस-4 मानक वाली गाड़ियां खरीदने में रुचि नही ले रहे थे ,उनके लिए सरकार की यह घोषणा राहत की खबर हो सकती है कि मार्च 2020 तक बिकने वाली गाड़ियों को पंजीयन अवधि तक चलाने की अनुमति दी जाएगी। रजिस्ट्रेशन फीस में वृद्धि को जून 2020 तक स्थगित रखने से भी लोग नए वाहन खरीदने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं। इसलिए यह संभावना हो सकती है कि अगले त्योहारी मौसम में वाहनों की बिक्री में इजाफा दिखाई देने लगे।

आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दिनों हाउसिंग सेक्टर के लिए 10,000 करोड़ का फंड बनाया है, जिससे उन प्रोजेक्ट के लिए मदद दी जाएगी ,जिनका 60% काम पूरा हो चुका है। वित्त मंत्री ने यह भी घोषणा की थी कि सरकारी कर्मचारियों को भवन निर्माण के लिए दी जाने वाली धनराशि पर पहले से कम ब्याज लिया जाएगा। इससे लोगों को घर खरीदने में मदद मिलेगी। सरकार एलआईसी और निजी क्षेत्र से दस हजार करोड रुपए जुटाने की योजना बना रही है।

छोटे करदाताओं को परेशान नहीं किया जाएगा और 25 लाख से कम डिफाल्टरो पर मंजूरी के बाद ही मुकदमा चलाया जा सकेगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण विगत दिनों यह घोषणा भी कर चुकी है कि निर्यात बढ़ाने की मंशा से सरकार विदेशी बाजारों में भेजे जाने वाले उत्पादों पर कर और शुल्क का बोझ कम करने के लिए एक योजना प्रारंभ करने जा रही है। जिस पर पचास हजार करोड़ रुपए लागत आने की संभावना है। वित्त मंत्री ने निर्यातकों की सुविधा के लिए कई लुभावनी घोषणाएं भी की है। सरकार लोगों को त्योहारों के अवसर पर अधिक से अधिक खरीदी के लिए प्रोत्साहित करने हेतु देश के चार प्रमुख शहरों में मेगा फेस्टिवल शो भी आयोजित करेगी, जिसमें आभूषणों के अलावा टेक्सटाइल एवं लेदर की उत्पादों को शामिल किया जाएगा।

अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती को दूर करने के लिए कृषि क्षेत्र पर भी सरकार को विशेष ध्यान देना होगा। किसी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत रखने के लिए एवं जीडीपी की दर को संतोषजनक स्तर तक कायम रखने के लिए कृषि क्षेत्र के योगदान को नकारा नहीं जा सकता, परंतु किसानों के हितों के प्रति सरकारों की सजगता के बावजूद कृषि की विकास दर में गिरावट आ रही है। कृषि क्षेत्र की विकास दर जो पिछले साल की पहली तिमाही में 5.1 प्रतिशत थी, वह इस साल घटकर 2% पर आ गई है। इस साल अच्छी बारिश से पहले किसानों की चेहरे खिले हुए थे, परंतु बाढ़ के कारण कुछ राज्यों में फसलों की तबाही की जो खबरें आ रही है, वह सरकार के लिए चिंता का विषय हो सकती है। कृषि के क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में गिरावट का असर भी अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। सरकार ने किसानों की आय को अगले तीन वर्षों में दोगुना करने का जो लक्ष्य तय किया है , उसे अर्जित करने में अर्थव्यवस्था की सुस्ती बाधक बन सकती है।

अर्थव्यवस्था में सुस्ती को आर्थिक मंदी में बदलने से रोकने के लिए सरकार जिस तरह से नए नए उपायों की खोज में जुटी है ,उससे यह अंदाजा तो लगाया जा सकता है कि सरकार को भी इस सुस्ती ने घबराहट में डाल दिया है। सरकार की घबराहट का पहला सबूत तब मिला जब रिजर्व बैंक के सेंट्रल बोर्ड ने गत अगस्त माह के आखिरी में 1.76 लाख करोड़ रुपए की भारी भरकम रकम सरकार को ट्रांसफर करने का फैसला किया। इसके पक्ष में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल नहीं थे, इसलिए सरकार को यह रकम तब मिल पाई जब वह अपने पद पर नहीं थे। रिजर्व बैंक के 84 साल के इतिहास में यह पहला मौका था, जब सरकार ने रिजर्व बैंक से पैसा लिया। इसमें से 70 हजार करोड़ की राशि सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को दी है। बैंकों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए 10 बड़े बैंकों का विलय कर चार बैंक बनाए गए है।

सरकार का मानना है कि इससे एनपीए की समस्या से जूझ रहे बैंकों को आर्थिक मजबूती मिलेगी और वे अधिक से अधिक ऋण देने में सक्षम हो सकेंगे , जिसका सकारात्मक असर अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलेगा। आर्थिक क्षेत्र के विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार रिजर्व बैंक से हासिल की गई रकम का उपयोग पूंजीगत खर्च से निपटने के लिए करेगी तो इस कदम का फायदा अर्थव्यवस्था की रफ्तार को और धीमी पड़ने से रोकने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

आर्थिक सुस्ती को मंदी में बदलने से रोकने के लिए वित्त मंत्री ने नित नई घोषणाएं कर रही है। आगे भी यह संभावना भी व्यक्त की जा रही है कि सरकार अगले कुछ दिनों में और कई बड़े फैसले कर सकती हैं । जीएसटी को और अधिक सरलीकृत बनाने के लिए गंभीरता से विचार किया जा रहा है। देखना यह है कि इसका लाभ किन किन क्षेत्रों को मिलता है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का मानना है कि अर्थव्यवस्था में जारी सुस्ती का दौर देखकर इस तरह की आशंका व्यक्त करना गलत है कि देश 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य अर्जित करने में सफल नहीं हो पाएगा। उन्होंने ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन की बैठक में मुख्य अतिथि की आसंदी से उद्योग जगत को भरोसा दिलाया कि सारी विषम परिस्थितियों के बावजूद देश 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनकर रहेगा।

गृह मंत्री ने कहा कि 5 साल पहले और जीडीपी की औसत दर 6% के आसपास थी ,जबकि पिछले 5 सालों में यह 7% के ऊपर ही रही है। वित्त मंत्री एवं गृह मंत्री का आत्मविश्वास यह संकेत देता है कि सरकार के प्रभावी कदमों से देश की अर्थव्यवस्था एक बार फिर रफ्तार पकड़ने की दिशा में अग्रसर हो सकती। सरकार ने स्थिति की गंभीरता को भापकर समय रहते जो बड़े फैसले किए हैं वह शुभ संकेत दे सकते हैं।

कृष्णमोहन झा

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