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न्याय के मंदिर में एक भूचाल, न्याय को न्याय की दरकार

28 जनवरी 1950 भारतीय संविधान के भाग 5 अध्याय-4 के तहत् उच्चतम न्यायालय की स्थापना हुई। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद यह पहला मौका 12 जनवरी 2018 को आया कि न्याय के मंदिर न्यायालय के माननीय जजों में पनपते असंतोष के कारण न्याय के मंदिर में एक भूचाल सा आ गया। न्याय के देवता कब एवं कैसे शांत होंगे यह भविष्य के गर्त में है। जे.चेलमेश्वर, रंजन गोेगोई, मदन वीलोकुर, कुरियन जोसेफ ये चारों माननीय वरिष्ठ जज अपने निर्णयों, निष्ठा एवं कत्र्तव्य के लिए ही जाने जाते है।

ऐसे में यहां यक्ष प्रश्न उठता है कि ऐसी क्या स्थिति, परिस्थिति रही कि चारों माननीय जजों को मुख्य न्यायाधीश के विरूद्व कोर्ट से बाहर प्रेस वार्ता आयोजित कर जनता की अदालत में आ सच को उजागर करने को मजबूर हुए। आखिर ये कहना पड़ा कि मुख्य न्यायाधीश को समझाने की कोशिशें नाकाम रही। हम लोकतंत्र बचाने को आगे आए है, नहीं चाहते कोई 20 वर्ष बाद कहे कि हमने आत्मा बेच दी, सच्चाई बताकर हम देश का कर्ज उतार रहे है। मीडिया में आकर अधिकार से बाहर नहीं जा रहे माननीय जजों की ये पीड़ा कोई साधारण घटना नहीं है।

निःसंदेह में कई प्रश्नों को जन्म देते है क्या वाकई में लोकतंत्र खतरे में है? क्या सर्वोच्च न्यायलय में वास्तव में स्वतंत्रता का संकट है? सबको पारदर्शिता का पाठ पढ़ाने वाले पर्दे में क्यों हैं? क्यों नही हम पारदर्शिता बरतना चाहते है। इस तरह की बातों का जनमानस पर क्या प्रभाव पडेगा ये तो भविष्य के गर्त में है अब जब माननीय जजों को असंतोष सतह पर आ ही गया है तो अब यह भी सुनिश्चित् हो ही जाना चाहिये कि इस मंथन से निकला जहर और अमृत को कौन पियेगा।

चूंकि यहां पर मामला न्याालय की प्रशासनिक कार्य पद्धति का है इसलिए सभी को धैर्य एवं संयम बरतने की महति आवश्यकता है। निःसंदेह सुप्रीम कोर्ट ने कई दफे अपने ही फैसलांे को पलटा है। एक निर्णय में निजता का अधिकार को मौलिक अधिकार माना कालांतर में 1954 में 8 जजों की बैंच ने इसी फैसले को पलटते हुए निजता का अधिकार नहीं माना!

केन्द्र सरकार भी ऐसा ही कुछ कहती है निःसंदेह परम्पराएं नियम नहीं हो सकती। ये सभी जानते है कि कोर्ट में रोस्टर के माध्यम से जजों को प्रकरण सौंपने का जिम्मा एवं बैंच नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश के विवेक पर है कि वह उसे किसे सौंपे। इसकी सूचना रजिस्ट्रार सूचना जारी करता है। यूं तो एक बैच को एक से अधिक विषय भी दिये जा सकते हैं या मुख्य न्यायाधीश स्वयं अपने पास भी रख सकता है।

यहां एक पेंच आता है जैसा कि चारों जजों ने उठाया कई बार महत्वपूर्ण केसों को जूनियर जजों को दे दिये जाते है। चूंकि ये सारा मामला मुख्य न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर करता है बस यही प्रशासनिक कार्यवाही पर संदेह करता है। इसी को ठीक अर्थात् एक रोटेशन या कोई पारदर्शी प्रक्रिया के तहत् किया जावें तो किसी को भी किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाईश नहीं रह जायेगी।

अब वक्त आ गया है वर्तमान मुख्य न्यायाधीश एवं भविष्य में बनने वाले मुख्य न्यायाधीश एक पारदर्शी परम्पराओं को अपनाएं। ताकि भविष्य में किसी भी जज को इस तरह मीडिया में आने की ही जरूरत न पडे एवं न्याय के मंदिर की पवित्रता भी बनी रहे।

डाॅ. शशि तिवारी (शशि फीचर.ओ.आर.जी.)

लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हैं
मो. 9425677352

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