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ताज को ताज ही रहने दो, कोई नाम न दो…..

देश इस वक्त बड़े ही अजीबो-गरीब वक्त से गुजर रहा है। भुखमरी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, लूट, हत्या, बालात्कार, जैसी समस्याएं गौंड़ हो जाति धर्म आधारित समस्याएँ, उलूल जुलूल बयान कहीं न कहीं मूल मुद्दे एवं समस्या से हटाने का एक सफल प्रयास है। कभी हिन्दू मुस्लिम तो कभी मस्जिद के भोंपू तो कभी गाय, तो कभी ताज। ताज भी सोचता होगा कि अभी तक जो कलाकृति के बेजोड़ नमूने के साथ दुनिया के सात अजूबों में शुमार है को आज नाम के विवाद में भी पड़ना होगा।

यूं कहने को तो ताज पर्यटन के क्षेत्र में एक अच्छी खासी विदेशी मुद्रा की दुधारू गाय है अभी 2016 में ही लगभग 155-656 डेढ़ लाख करोड़ विदेशी मुद्रा की आय हुई। ताज के अतीत में झांके तो इसका निर्माण 1632 में शुरू होकर 1653 में खत्म हुआ जिसमें लगभग 22 वर्ष लगे एवं लगभग 22 हजार मजदूर की मेहनत का नतीजा है।

सात अजूबे में ताज का नाम 2007 में ही जुड़ा, कहते हैं 2000-2007 के बीच स्विजरलैंड की नए सात आश्चर्य के लिए लगभग 200 इमारतों का सर्वे कराया गया इसमें लगभग 10 करोड़ लोग सम्मिलित हुए। ये नए सात अजूबें चीन की दीवार, जाॅर्डन का पेट्रा, क्राइस्ट द रीडियर, रोम का कालोजियम चिचेन इट्जा के पिरामिड, दक्षिणी अमेरीकी माचू पिच्चू एवं ताजमहल शामिल है।

ताज पर विवाद पुरूषोत्तम नागेस ओ के द्वारा लिखित पुस्तक 1989 में दावा किया कि ताज एक प्राचाीन शिव मंदिर ताजोमहल था जिसे बाद में मुस्लिम मकबरे में बदल दिया गया। ओके ने आगे कहा मुस्लिम इतिहासकारों का मानना है कि मुगलकाल में तेजोमहालय को रोजा ए मुनावर कहा जाता है। कुछ कहते है कि राजा मानसिंह के बेटे जयसिंह ने मुमताज को दफनाने के लिए शाहजहां को ताजमहल दे दिया जिसका पहले नाम तेजोमहल था।

हकीकत में ताज ज्यादा विवादों में हाल ही में उत्तरप्रदेश के पर्यटन विभाग द्वारा जारी सूची में से ताज को हटा दिया गया था से आया। भाजपा विधायक संगीत सोम द्वारा ताज को भारत पर कलंक कहना एवं इसी स्वर में स्वर मिलाते भाजपा सांसद हुकुम सिंह द्वारा मुसलमानों को बलात्कारी बताना ने राजनीति के ग्राफ को ‘‘अचानक बढ़ा एक नए विवाद को जन्म दे दिया।

’ वही कुछ जानकारों का कहना है कि अधिकांश मस्जिदों का मुंह काबा की ओर रहता है लेकिन ताज में ऐसा नहीं। कुछ कहते है इस्लाम में किसी भी ठोस, रूपाकार वस्तु को मजहबी आदर देने की मना ही हैं। इस सिद्धांत के अनुसार ताज इस दायरे में नहीं आता। ये भी कहा जाता है कि ‘‘पैगम्बर साहब’’ का भी कोई मकबरा नहीं है।

बहरहाल जो भी हो शाहजहां मुमताज के प्रेम की अनूठी निशानी बतौर ताज, ताज है। वैसे भी देखा जायें तो अभी तक जो भी प्रमाणिक इतिहास जिसे हम मानते हैं, या मानते आए है वो ब्रिटिश या राजाओं द्वारा नियुक्त कारिंदों ने ही लिखे है। उनकी सोच, नजरिया, निःसंदेह अलग एवं स्वामी भक्ति से ओत-प्रोत रहा होगा, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। सवाल अंग्रेजों का तो हम शुरू से ही उन्हे अपने से श्रेष्ठ मानते आ रहे हैं। ये भी कहीं न कहीं गुलामी का ही असर है।

अब वक्त आ गया है कि भारत को भारत की संस्कृति की दृष्टि के संदर्भ में इतिहास का पुर्नावलोकन लेकर लेखन किया जायें। गढ़ी गई भ्रांतियों को मिटाया जायें। इतिहास लेखन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होना चाहिए न कि भावनाओं पर, फिर चाहे वह अच्छा बुरा हो। निःसंदेह सत्य कड़वा होता है। सत्य, सत्य ही रहे इसमें किसी भी प्रकार के विजातीय गुणों का समावेश नहीं होना चाहिए। प्रमाणिकता के अभाव में अभी ताज को ताज ही रहने दे कोई नाम दें।

 डाॅ.शशि तिवारी
लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हैं

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