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नई पीढ़ी रिश्ते नहीं, संबंध निभाएं

dulhan

मैं शादी के पहले जिस तरह रहती थी या जैसी जिंदगी जीती थी, शादी के बाद वह नसीब नहीं हुई। वैसे हर लड़की की जिंदगी ही शादी के बाद पूरी तरह बदल जाती है। मैं पढ़ी-लिखी थी और मेरी शादी भी एक बहुत पढ़े-लिखे युवक से हुई थी। इसलिए वहां बहू जैसा बंधन नहीं होगा, यह मैंने सोचा था। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। पारिवारिक दायित्वों से लेकर सामाजिक मर्यादाएं और तथाकथित सामाजिक परंपराएं मेरे सामने इस तरह प्रस्तुत हुई कि उन्हें निभाना मुझे अपना कर्तव्य लगने लगा। मेरा जीवन अपने लिए न होकर घर और परिवार के लिए हो गया। जब तीन बच्चियों की मां बनी तो परिवार और बच्चों में खुद को खोजने लगी। बेटा नहीं था, लोग ताने देते थे। सोचा बेटियों को इतना ऊंचा उठाऊंगी कि यही लोग इन पर गर्व करेंगे और ऐसा हुआ भी। 

भूल गई खुद को…
मैं अपने-आपको क्यों भूल गई? किसी के दबाव में नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के चलते। शादी के पच्चाीस साल तक कुछ नहीं बदला। परिवार में ससुर-देवर साथ रहते थे। उनकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी। वो भी घूंघट के साथ। सास थी नहीं, जिठानी ने कभी कुछ कहा नहीं। देवरानी आई तो उसे समझाया कि हमें आपस में मिलकर रहना है। क्योंकि हम तीनों ही दूसरे घर से आई हैं। मेरा यही मानना था कि हमारी जरूरतें और इज्ञ्छाएं लगभग समान हैं, उन्हें किसी केजरिए नहीं पाया जा सकता। उनका हल हम तीनों को ही मिल-जुलकर खोजना होगा। और सच कहूं तो यही कुछ बातें थीं जिन्होंने हमारे संबंधों में खटास नहीं आने दी। मैंने तीन पीढि़यों को देखा है। एक पीढ़ी वो जो हमारे सास-ससुर की थी, दूसरी पीढ़ी मेरी उम्र केबुजुगोध् की है और तीसरी पीढ़ी आज केनौजवानों की। मेरे सास-ससुर वाली पीढ़ी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। लेकिन उनकी बहू पढ़ी-लिखी है, तो वह उसे कमतर नहीं आंकते थे। उसका मान भी करते थे, उसे कृतज्ञता से लेते थे। हां, इमोशनल ब्लैकमेलिंग तब भी थी और आज भी है।

अफसोस! ऐसा होता नहीं है…
सास-बहू, देवरानी-जेठानी, ससुर-बहू आदि रिश्तों से लगभग दुनिया की सभी लड़कियां दो-चार होती हैं। लेकिन ये रिश्ते कभी नहीं बदलते। पुराने जमाने में भी ऐसे ही थे और आज भी वैसे ही हैं। हां परिस्थितियां जरूर बदल गई हैं। खासकर शहरों में जहां लड़कियां हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। वो आज हर उस जगह पहुंचना चाहती हैं, जहां जाने पर पहले पाबंदी थी। यह जज्बा उनमें एक जिद की तरह भी है और गतिशीलता की तरह भी। उनमें क्षमता और कार्यकुशलता भी है।

सुबह जाकर शाम को घर-वापस आ जाने वाली नौकरियां ही अब उनकी प्राथमिकता नहीं हंै। कॉल सेंटर, मीडिया, नसिध्ग, डाक्टरी ऐसे तमाम क्षेत्र हैं, जहां नाइट ड्यूटी करनी पड़ती है। नौकरी के साथ-साथ उन्हें घर की जिम्मेदारियों को भी निभाना है। बच्चे भी पालने हैं और भागदा़ैड भी करनी है। यही वजह है कि आज-युवा पीढ़ी एकल परिवार की तरफ नहीं देख रही है। संयुक्त परिवार उनकी जरूरत भी है और मजबूरी भी। यह पीढ़ी भली-भांति जानती है कि घर के बुजुर्ग किस तरह उनके और उनके बच्चों के लिए शॉक एब्जॉर्वर का काम करते हैं। मगर यह जरूरत रिश्तों में ईष्र्या, रोक-टोक और अहम केचलते जंजाल बनकर रह जाती है। खासकर सास-बहू के रिश्ते, जहां एक-दूसरे से अपेक्षाएं कुछ ज्यादा ही होती हैं।

एक औरत जो अपने लिए चाहती है, वही सामने वाले को देती है। लेकिन यह सब पाने केलिए सास को मां बनकर नहीं एक साथी बनकर रहना होगा। अगर बहू देर से घर आती है, तो बजाए उसे घूरने केआप एक कप चाय उसे पिला दें। देखिए कैसे उस एक कप चाय की मिठास जिंदगी में घुलकर सामने आती है। उस समय रिश्ते, रिश्ते न रहकर दोस्ती में बदल जाएंगे। अफसोस! ऐसा होता नहीं है।

युवाओं की अपनी जरूरते हैं…
कभी-कभी बुजुगोध् की सोच को देखकर निराशा होती है। उनकी सोच और समाज एकतरफा हो जाता है। यह समाज पढ़ा-लिखा है, डाक्टर है, इंजीनियर है, लेकिन विचारों से घाघ है। उनकी बहुएं नौकरी करें, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन टाइमिंग वही जो उन्हें ठीक लगे। उस पर भी कामकाजी बेटे और बहू से अलग-अलग अपेक्षाएं। आज कितनी गलाकाट प्रतिस्पर्धा है, वो जानकर भी नहीं जानना चाहते। नौकरी मिलना कितना मुश्किल है, युवाओं से पूछें। दरअसल वह बच्चों का संघर्ष नहीं देखते। अपनी बातें, अपनी शर्त उन पर थोपते हैं। मैं तो कहूंगी दुनिया की हमदर्दी लूटना ही उनका मकसद है। बदलते समय के साथ अगर अपनी सोच में वह भी कुछ बदलाव लाएं, तो उनकी अपनी जिंदगी भी कहीं अधिक आसान हो जाएगी। बेटे-बहू के लिए अनेकों गिले-शिकवे खुद ही दूर हो जाएंगे। खासतौर पर तब, जब घर के बुजुर्ग, भागदा़ैड और गलाकाट प्रतियोगिता में संघर्ष कर रहे युवाओं की जरूरत बन गए हैं।
मैं नहीं मानती कि नई पीढ़ी खासकर लड़कियों में सहनशीलता कम है। जिसके कारण रिश्ते टूट रहे हैं। पर कभी एक लड़की की नजर से सोच कर देखा है? वह नौकरी भी करे और घर भी संभाले। बच्चे, पति और तमाम रिश्तों को भी संभालें। क्या आप बदले में जरा-सी जिम्मेदारियां नहीं बांट सकते?
मन-मुटाव की वजह एकतरफा नहीं होती। अतः सिर्पहृ नई पीढ़ी की बहू को हर बात पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि आप प्यार देंगे तो बदले में प्यार मिलेगा भी। जरूरत है नई पीढ़ी की परेशानियों को समझने की। सिर्पहृ बेटे की नहीं बहू की जिम्मेदारियों को भी बांटना होगा। वो भी अहसान जताकर नहीं, बल्कि प्यार और अपनेपन से।
रिश्ते अलग हैं, संबंध अलग
मैं खुद एक बहु की सास नहीं हूं, लेकिन जेठानी की बहुएं हैं। उनकेसाथ मेरे संबंध मधुर हैं। सास की तरह नहीं, बल्कि साथी की तरह हमारा व्यवहार होता है। शायद इसी वजह से हमारे रिश्ते बेस्वाद कभी नहीं हुए। मेरी नजर में रिश्ते-नाते और संबंध दो अलग चीजें हैं। इसलिए रिश्तों को छा़ेड, संबंधों को निभाया जाए। बजाय इसके कि मेरी बेटी है या बहू हैं, उसकेसाथ एक इंसान केजैसा व्यवहार किया जाए। ये हमारे घर आई है, इसका ख्याल रखना हमारी जिम्मेदारी, ऐसा मानकर चलें। उसकी दिक्कतों को समझें, जानें कि हमारे रहते ये दिक्कतें कैसे आई? अहम, स्वार्थ और कू्ररता ये तीनों संबंधों में जहर का बीज बोते हैं। इन्हीं चीजों केचलते आपस में वो हमदर्दी खत्म हो जाती है, जो एक इंसान के नाते होनी चाहिए। अगर बराबरी के स्तर पर परिवार के हर सदस्य को देखें तो रिश्ते नाते भले न रहें, लेकिन संबंध जरूर बने रहेंगे। वैसे भी खुशहाल जिंदगी के लिए जरूरत रिश्तों की नहीं, बल्कि संबंधों की है।

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