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अस्वच्छ माहौल में होती है हैपेटाइटिस ए की बीमारी

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पीलिया जिसे विज्ञान की जुबान में हैपेटाइटिस ए कहा जाता है, जिगर के संक्रमण के कारण उत्पन्न होता है ऐसा प्रायः गर्मियों तथा बरसात के मौसम में होता है। हैपेटाइटिस ए नामक विषाणु इस रोग का प्रमुख कारण होता है। अन्य वायरस जैसे हैपेटाइटिस- बी, हैपेटाइटिस- सी, हैपेटाइटिस- डी, नॉन ए हैपेटाइटिस, नॉन ए, बी हैपेटाइटिस भी यह रोग उत्पन्न करते हैं।

ये विभिन्न वायरस अलग-अलग तरीको से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुंचते हैं। हैपेटाइटिस- बी विषाणु खून तथा उसके विभिन्न अंगों द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुंचते हंै। इंजेक्शन की दूषित सुइयों के द्वारा भी इस रोग का संक्रमण हो सकता है। हैपेटाइटिस नॉन ए, नॉन बी वायरस का एक भाग खाद्य पदार्थों के किसी रोगी के मल द्वारा दूषित हो जाने पर फैलता है। पीलिया के लिए आमतौर पर हैपेटाइटिस- ए को ही जिम्मेदार माना जाता है।

जिगर के संक्रमण से उत्पन्न होने वाला यह रोग विशेष रूप से वहां पाया जाता है जहां पीने के पानी के वितरण की उचित व्यवस्था तथा सेनीटेशन का ठीक प्रबंध नहीं होता। होता यह है कि संक्रमित व्यक्ति के मल द्वारा विषाणु शरीर से बाहर आते हैं, बाद में जल या खाद्य-पदार्थों के इस मल द्वारा दूषित हो जाने पर यह रोग स्वस्थ व्यक्ति में भी पहुंच जाता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पहुंचकर ये विषाणु जिगर का संक्रमण करता है और वहीं पनपता है। उन्नत देशों में तो यह रोग न के बराबर ही रह गया है क्योंकि वहां जल वितरण और मल-निष्कासन की अच्छी व्यवस्था होती है।

ज्यादा व्यक्ति यदि एक ही स्थान पर इकट्ठे रहते हों तो वहां भी इस रोग के फैलने की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि वहां प्रायः सेनीटेशन को नजर अंदाज कर दिया जाता है। पीडि़त व्यक्ति के सीधे सम्पर्क में आने से अथवा रोगी के तौलिए, बिस्तर या अन्य वस्तुओं का प्रयोग करने से भी यह रोग हो सकता है। यदि रोगी के रक्त में विषाणुओं की मात्रा बहुत अधिक हो तो उसके रक्त के द्वारा भी इस रोग का प्रसार हो सकता है। ऐसे में असुरक्षित तरीके से रक्तदान या ज्यादा बार इस्तेमाल की गई इंजेक्शन की सुई के द्वारा यह रोग फैलता है। 

पीलिया के विषाणु अत्यधिक विषम परिस्थितियों में भी जीवित यह सकते हैं। ये काफी समय तक गर्मी और रासायनिक पदार्थों के प्रकोप को झेल सकते हैं। वितरण से पूर्व आमतौर पर जल को साफ करने के लिए क्लोरीन का प्रयोग किया जाता है परन्तु प्रायः यह देखा गया है कि क्लोरीन की जो मात्रा प्रयोग में लाई जाती है उसमें भी यह विषाणु बच जाते हैं। हैपेटाइटिस ए विषाणुओं से छुटकारा पाने के लिए पानी को कम से कम पांच मिनट के लिए उबालना जरूरी होता है। 

हालांकि किसी भी आयु वर्ग का व्यक्ति हैपेटाइटिस ए का शिकार हो सकता है परंतु बच्चों में यह रोग ज्यादा पाया जाता है। वृद्धों में यह रोग अधिक उग्र होता है। अनेक लक्षण ऐसे हैं जिनकी मदद से हैपेटाइटिस ए को आसानी से पहचाना जा सकता है। इस रोग में रोगी को हल्का बुखार आता है साथ ही उसे ठंड, सिरदर्द और थकान की भी शिकायत होती है। ऐसे में निरंतर कमजोरी सी महसूस होती है, रोगी का जी मिचलाता है, उल्टी होती है तथा उसकी भूख भी खत्म हो जाती है। आंखें तथा त्वचा पीली पड़ जाती है, पेशाब भी पीला हो जाता है। कुछ रोगियों को खारिश की शिकायत भी हो सकती है। रोगी की ऐसी स्थिति कुछ ही हफ्तों तक रहती है जो बाद में अपने आप ठीक हो जाती है। इस रोग में जिगर के काम करना बंद करने के कारण, मरने वालों की संख्या बहुत कम होती है। 

पीलिया के रोगी की पूरी तरह आराम करना चाहिए। ऐसे में घी, चिकनाई युक्त तथा तले पदार्थों का सेवन पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। साफ सुथरे ढंग से बनी मीठी चीजों का सेवन लाभदायक होता है।
यदि कुछ छोटी-मोटी सावधानियां बरतीं जाएं तो पीलिया से पूरी तरह बचा जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण है कि दूषित पानी को उबालकर ठंडा करके ही प्रयोग करें। हमेशा उबले हुए दूध का ही प्रयोग करें। बाजार में बिकने वाली बर्पहृ का प्रयोग न करें क्योंकि उसको जमाने के लिए कैसे पानी का प्रयोग किया गया है यह पता लगाना मुश्किल होता है। फल और सब्जियों को कच्चा खाने के लिए उन्हें पहले ही धोकर रोगाणु मुक्त कर लें।

रोगी के सम्पर्क में आने के बाद या कुछ भी खाने से पहले अपने हाथ अच्छी तरह साबुन से धोना बहुत जरूरी है। रोगी व्यक्ति के मलमूत्र का निपटान सुरक्षित ढंग से करना चाहिए जिससे इसे फैलने से रोका जा सके। इसके लिए उसमें कोई ऐंटीसेप्टिक दवा डालकर डिसइन्फेक्ट करने के बाद जला देना चाहिए। कहीं भी इंजेक्शन लगवाने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि सीरिंज पहले इस्तेमाल न की गई हो। 

हैपेटाइटिस ए के विषाणुओं से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त करने के लिए ह्यूमन इक्युनोग्लोबुलिन ए का इंजेक्शन लगाया जा सकता है। इस प्रकार की प्रतिरोधक क्षमता की पैसिव इक्युनिटी कहते हैं। परंतु ये इंजेक्शन उन्हीं लोगों को लगवाने चाहिएं- जो ऐसे स्थान पर रहते हों जहां हैपेटाइटिस ए पीलिया फैला हो। दूसरे इस इंजेक्शन के प्रयोग से पहले चिकित्सक की सलाह जरूर लेनी चाहिए। हैपेटाइटिस ए पीलिया को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है जरूरत केवल जागरूकता की है।

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