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‘कलंकी माननीयों’ से मुक्ति का शुभ अवसर है चुनाव

कलंकी माननीयों’ से मुक्ति का शुभ अवसर है चुनाव

भारतीय लोकतंत्र के महापर्व अर्थात् लोकसभा चुनाव 2019 का शंखनाद हो चुका है। चुनाव संपन्न होने तक देश के सीधे-सादे व शरी$फ मतदाताओं को बहलाने,बहकाने,फुसलाने तथा वरगलाने का राष्ट्रव्यापी दौर चलता दिखाई देगा। पांच वर्ष में केवल यही एक अवसर ऐसा आता है जब देश का बड़े से बड़ा नेता जनता के दरबार में हाथ जोडक़र हाजि़री देता व लच्छेदार बातें करता दिखाई देता है। मतदातओं से तरह-तरह के झूठे वादे किए जाते हैं,तरह-तरह के आश्वासन दिए जाते हैं,उन्हें सब्ज़ बाग दिखाए जाते हैं।

मतदाताओं को तरह-तरह की लालच दी जाती है,उन्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया जाता है। और अंत में इन्हीं नेताओं द्वारा जनसमस्याओं से जुड़े वादों को पूरा न कर पाने की स्थिति में उन्हें मंदिर-मस्जिद,धर्म-जाति,ऊंच-नीच,शमशान- कब्रिस्तान,ईद-दीवाली तथा गाय व गंगा जैसे भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर वोट ठग लिए जाते हैं। और भावनाओं के इस प्रवाह में बहते हुए देश का मतदाता यह भी भूल बैठता है कि वह भावनाओं का शिकार होकर अपने जिस प्रतिनिधि को निर्वाचित करने हेतु मतदान कर रहा है उसका चरित्र कैसा है,उसकी सामाजिक छवि कैसी है,उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड है या नहीं, उसने राजनीति में रहकर किस कद्र संपत्तियां बनाई हैं, वह व्यक्ति कितना भ्रष्ट है,कितना शिक्षित व कितना योग्य है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश के हरदोई में दिया गया वह चुनावी भाषण याद कीजिए जिसमें आप फरमाते हैं-‘16 मई के बाद जब चुनाव का नतीजा आएगा और नई सरकार बनेगी तो सभी के गुनाहों व अपराधों का लेखा-जोखा निकालूंगा। उसमें भाजपा वालों को भी नहीं छोड़ूगा। एनडीए वालों को भी नहीं छोड़ूगा और सुप्रीम कोर्ट से कहूंगा इनपर तत्काल केस चलाओ और जो सच्चे गुनहगार हैं उन्हें जेलों में डालो। पार्टियों को सा$फ करो पहले’। उन्होंन कहा था कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता राजनीति से अपराधियों को दूर करने की होगी तथा एक कमेटी गठित की जाएगी जो सभी सांसदों के अपराधी सांसदों की जांच करेगी।


अब पांच वर्षों के बाद देश के मतदाताओं को इस बात का पूरा अधिकार है कि वे प्रधानमंत्री से इन 2019 के चुनावों के दौरान यह ज़रूर पूछें कि उन्होंने अपने वादों के मुताबि$क किन-किन पार्टियों के कौन-कौन से अपराधियों को सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से जांच कराकर जेल भिजवाया? ज़ाहिर है मोदी का इस प्रकार का भाषण जनता से तालियां पिटवाने का एक शिगूफा मात्र था। क्योंकि रिकॉर्ड के अनुसार 2014 में सबसे अधिक अपराधी व विभिन्न गंभीर अपराधों के आरोपी सांसद भारतीय जनता पार्टी से ही चुनकर आए थे।

अफसोस की बात तो यह है कि इनमें हत्या,हत्या के प्रयास,फिरौती के अतिरिक्त महिलाओं का यैन उत्पीडऩ व महिलाओं पर अत्याचार ढहाने वाले ‘कलंकी माननीय’ भी हैं। अर्थात् वर्तमान सोलहवीं लोकसभा में 186 सांसद अपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले थे। भारतीय लोकसभा चुनावों में अब तक अपराधियों को चुनी जाने वाली यह सबसे बड़ी संख्या है। 2009 में ऐसे सांसदों की संख्या 158 थी।

सवाल यह है कि लोकतंत्र का पवित्र मंदिर समझी जाने वाली संसद तथा देश की समस्त विधानसभाओं में आखर भारतीय मतदाता कब तक और क्योंकर इस प्रकार के असामाजिक तत्वों तथा अपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले प्रत्याशियों को निर्वाचित करते रहेंगे? वर्तमान संसद में दुर्भाग्यवश भारतीय जनता पार्टी के 107,शिवसेना के 18,कांग्रेस के 15,एआईएडीएमके के 10 तथा तृणमूल कांग्रेस के 8 सांसद लोकतंत्र के मंदिर को कलंकित कर रहे हैं। इनमें कई तो संगठन व मंत्रिमंडल जैसी महत्वूपर्ण संवैधानिक व संगठनात्मक जि़म्मेदारियां भी निभा रहे हैं।

इस स्थिति में भारतीय मतदाता प्रधानमंत्री से उनके भाषण पर अमल किए जाने की उम्मीद भी आखिर कैसे कर सकते हैं? इसलिए स्वयं मतदाताओं का ही यह दायित्व है कि वे नेताओं के वादों,उनके राजनीति को अपराध मुक्त कराने जैसे लोकलुभावन भाषणों को बार-बार सुनने व उसके झांसे में आने के बजाए स्वयं अपने कीमती मत का सद्उपयोग करें। मतदाताओं को यह देखने की ज़रूरत नहीं है कि अपराधी छवि रखने वाला, कोई दबंग या बाहुली किस पार्टी की ओर से प्रत्याशी बनाया गया है। मतदाताओं को भलीभांति अपने प्रत्याशी के बारे में पूरा ज्ञान होना चाहिए तथा योग्य,सज्जन,सुशील व नेक इंसान को ही अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि निर्वाचित करना चाहिए।

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केवल पुलिस थाने में आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले नेता ही अपराधी प्रवृति के नहीं होते। बल्कि कुछ नेता ऐसे भी होते हैं जो अपने दुष्कर्मों,दुराचार व बुरे आचरण के चलते न केवल अपने चुनाव क्षेत्र बल्कि कभी-कभी पूरे प्रदेश व पूरे संगठन को भी कलंकित कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के एक सांसद द्वारा अपने से अधिक उम्र के एक विधायक की एक उच्चस्तरीय बैठक में उच्चाधिकारियों व वरिष्ठ नेताओं के समक्ष जूते से ज़बरदस्त पिटाई करते हुए पूरे देश ने देखा। इस जूतकांड ने भारतीय जनता पार्टी संगठन को भी हिला कर रख दिया।

जूता बरसाने का कारण क्या था इस बहस में जाने के बजाए यह समझना ज़रूरी है कि क्या जनता अपने माननीयों का चुनाव इसी उम्मीद से करती है कि वह शक्तिशाली होने के बाद अपने ही क्षेत्र के विधायक पर केवल राजनैतिक दुराग्रह के चलते जूते बरसाने लगे? जिस समय यह जूताकांड हुआ उसे कई दिनों तक सोशल मीडिया ,टेलीविज़न तथा समाचार पत्रों में सुर्खियों सहित प्रचारित व प्रसारित किया गया। ऐसे ही कलंकी नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र व मतदाताओं के लिए बदनामी का कारण बनते हैं।

सूचना के आदान-प्रदान के वर्तमन युग में इस प्रकार की घटनाएं चंद सेकेंड में पूरे विश्व में फैल जाती हैं और ऐसे ‘कलंकी माननीयों’ के काले कारनामों से देश की संसद व देश की राजनैतिक व्यवस्था तक बदनाम होती है।
देश का सर्वोच्च न्यायालय यह स्पष्ट कर चुका है कि वर्तमान कानून के अनुसार वह राजनीति में अपराधियों के प्रवेश पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता क्योंकि कानून की नज़र में केवल सज़ायाफ्ता व्यक्ति ही अपराधी माना जा सकता है।

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ऐसे में केवल देश का मतदाता ही अपने मतदान की ताकत से यह अधिकार रखता है कि वह किसी अपराधी व्यक्ति की सज़ा की प्रतीक्षा करने के बजाए स्वयं अपने मतदान की शक्ति से यह निर्णय ले कि कोई अपराधी व्यक्ति चुनाव जीतने योग्य है अथवा नहीं। मतदाताओं को ही यह तय करना होगा कि उनके क्षेत्र से चुनकर देश की लोकसभा को सुशोभित करने वाला ‘माननीय’ चरित्रवान है या चरित्रहीन।

मतदान की शक्ति ऐसी सबसे मज़बूत ताकत होती है जो बड़े से बड़े बाहुबली,दबंग,अपराधी, माफिया तथा भ्रष्ट व्यक्ति को आईना दिखाने का काम करती है। आज देश में राजनैतिक स्तर में जिस प्रकार की गिरावट आ रही है, जिस प्रकार से जनसमस्याओं से जुड़े वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका कर लोगों को भावनाओं का शिकार बनाने का प्रयास किया जा रहा है यह सब ऐसे ही अपराधी व शातिर दिमाग राजनेताओं के दिमाग की उपज है।

याद रखें अपनी मत शक्ति के प्रयोग के इस शुभ अवसर को हाथों से जाने न दें क्योंकि अब दोबारा यह मौ$का फिर शायद पांच सालों बाद ही मिल सकेगा। इसलिए देश की एकता,अखंडता,सद्भाव,भाईचारा तथा स्वच्छ व साफ-सुथरी राजनीति के पक्ष में मतदान करने के लिए देश की राजनीति को ‘कलंकी माननीयों’ से मुक्त कराने का प्रयास करें।
निर्मल रानी

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