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कानूनी व्याख्या : समाज से अलग नहीं है कानून

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हाल-फिलहाल दहेज और पत्नी के वैवाहिक घर की व्याख्या को लेकर दो मामलों में अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों पर कई प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। किसी को ये स्त्री विरोधी फैसले लगे तो कोई इनके पक्ष में खड़ा नजर आता है। कानून समाज से अलग नहीं है, इसी पहलू पर लिख रही हैं सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन। 

जनवरी 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘दहेज’ शब्द को सामाजिक अर्थो में परिभाषित किया है। यह फैसला दहेज के कानूनी दायरे के बाहर बात करता है, जिसकी जरूरत भारतीय अदालतों को ज्यादा है। क्योंकि अब तक अदालतों के फैसले दहेज को संकीर्ण अर्थ में देखते रहे हैं।
दहेज शब्द में क्या नहीं आता
भारतीय समाज में विवाह संबंध दो युवा लड़के-लड़कियों का ही नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच का संबंध भी होता है। ज्यादातर शादियां माता-पिता द्वारा तय की जाती हैं। दोनों पक्ष नवविवाहित दंपती की गृहस्थी को व्यवस्थित करने के लिए भरसक प्रयास करते हैं। ऐसे उदाहरण भी हैं जहां लड़के के परिवार ने लड़की के घरवालों की आर्थिक, सामाजिक या नैतिक मदद की है। भारत में कृषक परिवारों में धन की कमी नई बात नहीं है। शादी-ब्याह, बीमारी, जन्म-मृत्यु जैसे अवसरों पर थोड़ा-बहुत लेनदेन अनिवार्य हो जाता है। इसे दहेज के बतौर देखने-समझने की परंपरा भी नहीं है।
अप्पा साहेब-भीमाबाई का मुकदमा
महाराष्ट्र के अप्पा साहेब एवं भीमाबाई का मुकदमा एक निर्धन परिवार का मुकदमा था। उनका विवाह मार्च 1989 में हुआ था। विवाह में 5000 रुपये एवं कुछ गहने दिए गए थे। ससुराल आकर भीमाबाई को जीवन अभावग्रस्त लगने लगा, खाने-पीने से लेकर पहनने तक उनके पास कुछ नहीं होता। अप्पा साहेब की खेती भी रामभरोसे चल रही थी। खाद खरीदने के पैसे भी नहीं होते थे। पत्नी ने जब अभाव की शिकायत की तो पति ने कहा- हजार-बारह सौ रुपये मायके से मांग लो तो खाद खरीद लें। पत्नी ऐसा नहीं कर पाई क्योंकि मायके में भी गरीबी थी। इसी अभाव ने गृहस्थी में कटुता ला दी, छोटी-छोटी चीजों के लिए खटपट चलती रहती। लेकिन दहेज या पैसों के लिए प्रताड़ना दी गई हो, ऐसा भीमा की मां ने बयान में नहीं कहा। 15 सितंबर 1991 को भीमा मृत पाई गई। मामला दर्ज हुआ ‘दहेज हत्या’ का। भीमा को मारने-पीटने के निशान नहीं थे। ‘विसरा’ में खेतों में डाला जाने वाला कीटनाशक मिला। भीमा ने आत्महत्या की या उसे मारा गया, इसका साक्ष्य न था। मायके वालों ने कहा कि घरेलू झंझटों से ऊब कर बेटी ने आत्महत्या कर ली।
कानूनी व्याख्या
सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि दहेज वह है, जिसमें कोई कीमती संपत्ति या सुरक्षा राशि विवाह के सिलसिले में दी या ली जाए। भारत में दहेज जानी-पहचानी सामाजिक क्रिया है। जब कोई कानून किसी विषय के संबंध में बनाया जाता है तो उसमें व्यवहृत शब्दों का अर्थ वही होता है जो इस बारे में समाज में प्रचलित होता है। किसी आर्थिक संकट या घरेलू कारणों से आकस्मिक खर्च या खाद खरीदने के लिए कुछ पैसों की मांग को समाज में दहेज के नाम से नहीं जाना जाता तो फिर कानून ही क्यों ऐसी आकस्मिक जरूरतों के लिए पैसों की मांग को दहेज की संज्ञा दे।
-2007 (1) स्केल-50- पत्नी का वैवाहिक घर
हाल ही में घरेलू हिंसा कानून के प्रावधान को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा कि पत्नी में रहने को एक स्थान पा सकती है। यहां घर शब्द की पुनः व्याख्या की जरूरत है। पत्नी सिर्फ पति के हिस्से के मकान में ही रहने का अधिकार पा सकती है, न कि पति के हर रिश्तेदार के घर में, जहांरिश्तेदारी, मित्रता या अच्छे रिश्तों के कारण पति-पत्नी रह रहे थे।
किसी भी शब्द की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती जो समूचे सामाजिक ताने-बाने एवं व्यवस्था को तोड़ मरोड़कर रख दे। ये दो फैसले कानून के मानवीय पक्ष को सामने रखते हैं। इनकी अनावश्यक आलोचना कानून को एकतरफा बनाती है, जो ठीक नहीं है।

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