कमलनाथ को तगड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने कहा राज्यपाल का फैसला सही था

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 19 मार्च को मध्य प्रदेश विधानसभा के स्पीकर एनपी प्रजापति को आदेश दिया था कि अगले दिन विधानसभा का सत्र बुलाएं, जिसका एकमात्र एजेंडा तत्कालीन सरकार का फ्लोर टेस्ट कराना था। अपने पिछले फैसले पर ही सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत फैसला सुनाया है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले के अगले दिन ही पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बहुमत साबित करने से पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता कमलनाथ को तगड़ा झटका दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन कमलनाथ सरकार से सदन में बहुमत साबित करने को कहने के गवर्नर लालजी टंडन के फैसले को जायज ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि गवर्नर को फ्लोर टेस्ट का आदेश देने का अधिकार था। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिसाहिक एसआर बोम्मई केस का हवाला दिया है और कांग्रेस के वकीलों की ओर से दी गई दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 19 मार्च को मध्य प्रदेश विधानसभा के स्पीकर एनपी प्रजापति को आदेश दिया था कि अगले दिन विधानसभा का सत्र बुलाएं, जिसका एकमात्र एजेंडा तत्कालीन सरकार का फ्लोर टेस्ट कराना था। अपने पिछले फैसले पर ही सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत फैसला सुनाया है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले के अगले दिन ही पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बहुमत साबित करने से पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

उनकी 15 महीने पुरानी सरकार के गिरने के बाद ही मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी का रास्ता साफ हुआ। सोमवार को जस्टिस वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हेमंत गुप्ता ने अपने विस्तृत फैसले में तत्कालीन कमलनाथ सरकार और कांग्रेस की ओर से दी गई दलीलों को खारिज कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने का पूरा अधिकार है, लेकिन वह सत्र के बीच में फ्लोर टेस्ट का निर्देश नहीं दे सकता।

अदालत ने 1994 के एसआर बोम्मई केस में अपने 9 जजों के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि विश्वास मत हासिल करने के लिए कहना गवर्नर का सही फैसला था। अदालत ने साफ किया कि अगर राज्यपाल को यह लग रहा था कि सरकार ने बहुमत खो दिया है तो मुख्यमंत्री से फ्लोर टेस्ट के लिए कहने में उनके सामने कोई बाधा नहीं था। 19 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि ‘फ्लोर टेस्ट का निर्देश देकर अनिश्चितता की स्थिति को निश्चित तौर पर प्रभावी तरीके से दूर किया जा सकता है।’

उस समय अदालत ने निर्देश दिया था कि विधान सभा के सामने सिंगल एजेंडा यही होना चाहिए कि, क्या कांग्रेस सरकार को सदन का विश्वास अभी भी हासिल है और इसके लिए हाथ उठाकर वोटिंग करवाई जानी चाहिए। उस समय अदालत ने बीजेपी नेता शिवराज सिंह चौहान और मध्य प्रदेश कांग्रेस पार्टी की ओर से दो दिनों तक दलीलें सुनने के बाद कम से कम 8 अंतरिम निर्देश जारी किए थे और विस्तृत फैसला बाद में सुनाने की बात कही थी।

बता दें कि कमलनाथ सरकार के गिरने के बाद भाजपा नेता शिवराज सिंह फिर मुख्यमंत्री बन गए। मध्य प्रदेश में कांग्रेस का सियासी संकट उसके 22 विधायकों के इस्तीफे से शुरू हुआ था। विधानसभा अध्यक्ष ने बागी कांग्रेसी विधायकों में जितने भी मंत्री थे उनका इस्तीफा तो स्वीकार कर लिया था, लेकिन बाकी कांग्रेसी विधायकों पर फैसला लटका कर रख लिया था। जब राज्यपाल लालजी टंडन ने तत्कालीन सीएम कमलनाथ से विधानसभा में बहुमत शामिल करने को कहा तो उन्होंने गवर्नर के निर्देश के पालन करने के अपने संवैधानिक दायित्व को नहीं माना और विश्वास मत हासिल करने से इनकार कर दिया।

पूर्व की कांग्रेस सरकार के इसी रवैए के खिलाफ शिवराज सिंह चौहान ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसने उस समय दो दिन तक सुनवाई के बाद फौरन फ्लोर टेस्ट कराने को कहा था। इसके बाद सदन में अपनी हार निश्चित देखकर कमलनाथ ने फ्लोर टेस्ट की औपचारिकता से पहले ही अपनी हार स्वीकार कर ली और अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।