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योगी के विधायकों की सदस्यता खतरे में, SC ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब

देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को ज़बरदस्त फटकार लगाई है। दरअसल, आपराधिक मामले में दोषियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध के मामले में चुनाव आयोग अपना रुख स्पष्ट ज़ाहिर नहीं कर रहा है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि चुप्पी साधने से कुछ नहीं होगा मामले पर आयोग को अपना रुख स्पष्ट करना ही होगा। आपको बता दें कि वर्तमान के नियमों के हिसाब से किसी सजायाफ्ता व्यक्ति के मात्र छह वर्ष तक ही चुनाव लड़ने पर पाबंदी है।

सु्प्रीम कोर्ट ने कहा कि “अगर चुनाव आयोग स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है तो अपना स्वतंत्र नजरिया क्यों नहीं रख सकता। क्या वह अपना पक्ष रखने के लिए विधायिका के निर्देश पर निर्भर है। अगर कोई नौकरशाह दोषी ठहराया जाता है तो वह आजीवन नौकरी से बर्खास्त हो जाता है, लेकिन राजनेताओं पर छह वर्ष की पाबंदी क्यों? उन पर क्यों नहीं आजीवन प्रतिबंध लगना चाहिए”। मामले में अगली सुनवाई 19 जुलाई को होगी।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के अनुसार, 2017 में पांच राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर) में हुए चुनाव में चुने गए 690 विधायकों में से 192 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। 690 में से 140 के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें पांच साल याह उससे ज्यादा की सजा हो सकती है। बात अकेले उत्तर प्रदेश की करें तो एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के 403 विधायकों में से 143 यानी 36 प्रतिशत विधायकों पर आपराधिक रिकॉर्ड दर्ज है, जिनमें से 107 विधायकों यानी 26 प्रतिशत पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बीजेपी के 27 प्रतिशत दागी विधायक जीते गंभीर प्रवृत्ति के आपराधिक मामलों की बात करें तो इसमें भाजपा अव्वल है।

भाजपा के सर्वाधिक 83 यानी 27 प्रतिशत, सपा के 11 (24 प्रतिशत), बसपा के 4 (21प्रतिशत), कांग्रेस के एक (14 प्रतिशत) और तीन निर्दलीयों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ हत्या समेत कई गंभीर मामले दर्ज हैं। लोकसभा चुनाव के लिए उन्होंने मई 2014 में जो हलफ़नामा चुनाव आयोग में दाख़िल किया था, उसके मुताबिक़ उनके ख़िलाफ़ 11 आपराधिक मामले हैं। इनमें 302 (हत्या), 153 (दंगा भड़काना) और 420 (धोखाधड़ी) जैसे आरोप शामिल थे। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था कि इन आरोपों में उन्हें बाइज्जत बरी किया जा चुका है।

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