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जीवन साथी को यौन संबंध बनाने से रोकना मानसिक क्रूरता

SCनई दिल्ली [ TNN ] सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक जीवन साथी को यौन संबंध बनाने की अनुमति नहीं देना मानसिक क्रूरता है और यह तलाक का आधार हो सकता है।

जस्टिस सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय और प्रफुल्ल चंद्र पंत की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि नि:संदेह जीवन साथी को पर्याप्त कारणों के बगैर ही लंबे समय तक यौन संबंध नहीं बनाने देना मानसिक क्रूरता जैसा है।

अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसने एक व्यक्ति को सिर्फ इसी आधार पर विवाह विच्छेद की अनुमति दे दी गई थी कि उसकी पत्नी ने लंबे समय तक शारीरिक संबंध नहीं बनाने दिए थे।

इस व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी यौन संसर्ग से इनकार करने के साथ ही कई तरीकों से उसके साथ क्रूरता कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी के इस बयान को तवज्जो देने से इनकार कर दिया कि चूंकि वह संतान नहीं चाहती थी, इसलिए उसने शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर दिया था। अदालत ने लंदन में रह रहे पति को निर्देश दिया कि वह अपनी पत्नी को एकमुश्त 40 लाख रुपये बतौर निर्वाह खर्च दे।

हाईकोर्ट ने भी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं करने के बारे में पत्नी के स्पष्टीकरण को अस्वीकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि पति-पत्नी दोनों ही शिक्षित हैं और ऐसे अनेक गर्भनिरोधक उपाय हैं जिनका उपयोग कर यदि वे चाहते तो गर्भधारण से बच सकते थे।

दोनों का विवाह 2005 में हुआ था। वे कई महीन तक लंदन में भी रहे। ट्रायल कोर्ट ने तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। साथ ही हिंदू विवाह अधिनियम की धारा नौ के तहत दापत्य जीवन बहाल करते हुए पति-पत्नी को साथ रहने का आदेश दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया था।

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