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आधुनिक समय के ऋषि थे हैदर रज़ा

मंडला :मशहूर चित्रकार हैदर रज़ा की पहली पुण्य तिथि पर रज़ा फ़ाउण्डेशन ने उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए नर्मदा किनारे चित्रकला कार्यशाला का आयोजन किया है। रज़ा स्मृति समारोह की शुरुआत 18 जुलाई को हुई जिसका समापन हैदर रज़ा की पहली पुण्य तिथि 23 जुलाई को होगा।

कला और कलाकारों से था सरोकार –
बुधवार को आयोजित पत्रकारवार्ता को सम्बोधित करते हुए रज़ा फ़ाउण्डेशन के अखिलेश दा ने बताया कि वर्ष 1976 में वो पहली बार हैदर रज़ा से मिले थे जब वो पेरिस वापस जा रहे थे। हैदर रज़ा ने उनकी पेंटिंग देखी और हॉटल ताज़, मुंबई में उन्हें खाने पर बुलाया। जाते वक़्त हैदर रज़ा ने उन्हें एक लिफाफा दिया और कहा कि इसे घर जाकर खोलना। जब घर पहुंचकर उन्होंने वो लिफाफा खोला तो उसमे कुछ रूपये थे और एक नोट था जिसमे लिखा था कि अगली भारत यात्रा पर मै तुम्हारी एक पेंटिंग ख़रीदना चाहता हूँ, ये रूपये उसका एडवांस समझ कर रख लो। मै इससे काफी प्रभावित हुआ कि इतना बड़ा कलाकार किस तरह नए कलाकारों को प्रोत्साहित करता है। कला और कलाकारों से सरोकार के चलते ही उन्होंने वर्ष 2000 में रज़ा फ़ाउण्डेशन की स्थापना की। इस रज़ा फ़ाउण्डेशन में रज़ा ने अपनी ज़िंदगी की पूरी कमाई लगा दी।

पांच चित्रकला महाविद्यालय के छात्र कर रहे चित्रकारी –
शुरुआत में रज़ा फ़ाउण्डेशन 1 लाख रुपए का पुरस्कार कलाकार और कवियों को देती थी। इसके बाद इसमें डांस, ड्रामा, म्यूजिक सहित विभिन्न कला माध्यमों को जोड़ लिया गया।रज़ा फ़ाउण्डेशन ऐसी दुर्लभ किताबों को भी छापने का काम करती है जो विलुप्त हो चुकी हैं। इस चित्रकला कार्यशाला में पांच चित्रकला महाविद्यालय के अंतिम वर्ष के 30 कलाकारों को आमंत्रित किया गया है यह कलाकार इस कार्यशाला के जरिए काफी कुछ सीख कर अपने लिए नया रास्ता तैयार करेंगे। इस चित्रकला कार्यशाला में ग्वालियर से नरेंद्र जाटव, अरिहंत जैन, सौरभ श्रीवास्तव जबलपुर से मीणा सिंह, अनुप्रिया, आदित्य सिंह इंदौर से आकाश भाटी,लकी जासवाल, रोहित जोशी, धार से मुकेश विश्वकर्मा, प्रणय शर्मा,राजेश हिरवे, भोपाल से लामा त्यागी, शिवांगी गुप्त खैरागढ़ से मेघा सिंह, चंद्रपाल पंजरे, प्रिय सिंह और भोपाल से अरविन्द पाठक,धर्म नेताम व बाली मरियम शामिल है। उन्होंने बताया कि समय-समय पर मंडला में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे मंडला के कलाकारों को प्रोत्साहित कर उन्हें देश-विदेश में मंच उपलब्ध कराया जाएगा।

बन रहा है कलाकारों और हैदर रज़ा का घराना –
रज़ा फ़ाउण्डेशन के एक अन्य सदस्य मनीष पुष्कर ने बताया कि हैदर रजा ककैया, मंडला, दमोह से निकलकर नागपुर, मुंबई होते हुए पेरिस पहुंचे और वहां से उन्होंने अपनी चित्रकारी के जरिए भारत का परचम पूरी दुनिया में फहराया। उन्होंने कहा कि नर्मदा के तट पर आयोजित कार्यशाला को देखते हुए मुझे सन 1930 और 1932 नजर आ रहा है जब हैदर रजा इसी नदी किनारे घूमते होंगे। रज़ा जैसा चित्रकार मिलना बहुत मुश्किल है। वह अक्सर कहा करते थे जमीन और मिट्टी से कलाकार के जीवन का खास जुड़ाव होता है। रज़ा खुले दिल और खुले हाथ के इंसान थे। वे हमेशा कलाकारों की मदद के लिए तैयार रहते। यहां आज हो रही चित्रकला कार्यशाला का नतीजा कुछ सालों बाद देखने को मिलेगा क्योंकि तत्कालिता का अर्थ विलंभता में छिपा होता है। यहां काम करने वाले उनका घराना बना रहे है। अभी तक कला के क्षेत्र में गायन और वादन से जुड़े हुए कलाकारों के ही घराने होते थे अब कलाकारों और हैदर रज़ा का घराना बन रहा है।

अपनी माटी और अपने देश को करते रहते याद –
उन्होंने बताया कि फ्रांस में हैदर रज़ा दो जगह रहते थे एक पेरिस और एक गोर्बियो। गोर्बियो में ही हैदर रज़ा की पत्नी की कब्र है। उनकी इच्छा थी कि यदि फ्रांस में उनकी मृत्यु हो तो उन्हें उनकी पत्नी की कब्र के बगल में दफनाया जाए। इसके लिये उन्होंने जगह आरक्षित करा रखी थी और म्युनिसिपल को इसका टेक्स भी देते थे। भारत मे उनकी मौत होने पर उन्होंने मंडला में अपने वालिद की कब्र के बगल में सुपर्द ए ख़ाक होने की ख्वाइश जाहिर की थी, जो पूरी हुई। उन्होंने बताया कि रज़ा ने पेरिस में भी एक मंडला और एक भारत बना रखा था। जब भी वो मंडला से वापस लौटते तो नर्मदा का पानी और यहां की मिट्टी अपने साथ ले जाते और पेरिस के अपने घर की टेबल पर रखते। वे इन्हें रोज़ देखकर मंडला की अपनी माटी और अपने देश को याद करते।

हवाओं में दीपक जलाने की कोशिश –
महात्मा गांधी से उनका गहरा जुड़ाव था। जब भी वो दिल्ली आते तो राजघाट जरूर जाते। उनकी चित्रकारी में भी अहिंसा का संदेश छिपा होता था। महात्मा गांधी से उनका कनेक्शन बताते हुए मनीष पुष्करे कहते है कि चौरी चौरा कांड से नाराज़ होकर महात्मा गांघी ने सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत 5 फरवरी 1922 को की थी और इसी दिन हैदर रज़ा का जन्म हुआ था। हैदर रज़ा 23 जुलाई 2016 को हम सब से विदा हो गए और इसी तारीख को पूरे 100 साल पहले महात्मा गांधी ने हिटलर को चिट्ठी लिखी थी। उन्होंने कहा कि हैदर रज़ा ने अपना पूरा जीवन चक्र पूरा किया। वो मंडला और नागपुर से होते हुए देश – विदेश तक पहुंचे और इसी रास्ते अपना अंतिम सफर पूरा कर मंडला में सुपुर्द ए खाक हुए। हैदर रज़ा आधुनिक समय के ऋषि थे। ये चित्रकला कार्यशाला एक कोशिश है ताकि दीपक हवाओं में जलता रहे।

शानदार है कार्यशाला का अनुभव –
चित्रकला कार्यशाला में शामिल होने भोपाल से मंडला आई शिवांगी गुप्ता बताया कि हैदर रज़ा, मकबूल फ़िदा हुसैन सहित अन्य विदेशी कलाकारों के बारे में पढ़कर वे भी चित्रकारी करने लगी। चूँकि वो टेक्सटाइल फील्ड से है लिहाजा उन्होंने अपने आर्ट में इसका भी समावेश किया ताकि बुरे दौर से गुजर रही टेक्सटाइल इंडस्ट्री के बारे में भी अपनी पेंटिंग के ज़रिये जागरूक किया जा सके। उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला का अनुभव शानदार है। नर्मदा के खूबसूरत किनारे पर चित्रकारी करने का मौका अपने आप में बहुत ख़ास है। आयोजकों का कोई बंधन भी नहीं है कलाकार अपने मर्ज़ी की कलाकारी स्वतंत्र है। कार्यशाला के दौरान अच्छे – अच्छे कलाकारों से भी मिलने का मौका मिल रहा है।
@सैयद जावेद अली

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