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मोदी जी भोजपुरी को कब मिलेगा वाजिब हक

modiभोजपुरी को आठवीं अनुसूची में डाल कर किया जा सकता है बिहार और उत्तरप्रदेश पर राजनैतिक कब्जा… बिहार और उत्तर प्रदेश में चुनाव नजदीक है. हर दल अपनी अपनी रणनीति बनाने में जुट गए है. मोदी लहर के दिल्ली में थमने के बाद भाजपा और संघ के लिए ये चुनाव और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए है. इन चुनावों को जीतने के लिए ये कुछ भी करने को तैयार होंगे. शाम,दाम,दंड,भेद सब कुछ. इन राज्यों में क्षेत्रीय पार्टिओं का कब्ज़ा है वो भी इन्हें इतनी आसानी से अपने हाथ से नहीं जाने देंगी.पूरा दम लगाएंगी. सीमा से हट कर भी कुछ नया करने की सोचेंगी. भाजपा और मोदी से, जहाँ सभी दल लोकसभा चुनाव के बाद डरे – डरे दिख रहे थे उनको लग रहा था की उनका जनाधार लगभग समाप्त हो गया है .
 
दिल्ली के चुनाव ने उनमे जान फुकने का काम किया है. सभी के मन में ये आ गया है की सही रणनीति और जज्बे से भाजपा को हराया जा सकता है.जनाधार जुटाया जा सकता है. जद यू ने नया गठबंधन कर ये जता भी दिया है. उनकी जीतने की प्रतिबधता इस से भी साफ़ दिखती है की मुलायम के कहने पर वर्तमान में नीतीश कुमार की धूमिल छवि के बाद भी उनको सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार चुन लिया गया है. लालू यादव ने इस पर चू तक नहीं किया. लालू यादव से किसी को ऐसी उम्मीद नहीं थी. मगर भाजपा को रोकना है और अपनी पार्टी को जिन्दा रखना है तो ये करना ही पड़ेगा.
सभी पार्टियो ने धीरे धीरे चुनाव को केंद्र में रख कर काम करना शुरु कर दिया है…. दलों में गठबंधन, जिमेदारिओं में फेरबदल, नातिगत वोटों की प्रतिशतता की गड़ना, जोड़ तोड़ सहित तमाम चीजें सामने आने लगीं है. कोई विकास का बिगुल फूंक रहा है तो कोई जातिगत समीकरण बैठा रहा है. बिहार और उत्तर प्रदेश जातिगत राजनीति के लिए सबसे अधिक जाने जाते है. मगर कोई दल इन जातिओ को एक झंडे के नीचे ला पाने में सदा नाकाम रहा है. सर्वाधिक आबादी वाले ये दो राज्य शुरु से ही राजनीति का केंद्र रहे है.जो जितनी जातियों को अपने पक्ष में लाता है उसकी उतनी ही बड़ी जीत होती है. मायावती, लालू यादव,नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है.
इन दो राज्यों में सर्वाधिक भोजपुरी भाषी निवासरत है. इनकी जनसँख्या इतनी है की किसी भी पार्टी को ये जब चाहे तब जीता दें.कोई भी पार्टी इनको एक गोल में नहीं रख पायी. ये विभिन पार्टिओं और मुद्दों में बटें हुए है.इतिहास गवाह है समय समय पर सब ने इन्हें छला है. इस पट्टी में गरीबी सबसे ज्यादा व्याप्त है.यहाँ के मजदूर कई राज्यों और देशों को विकाश के सोपान पर अग्रसर कर चुके है. मगर इनका प्रदेश अब भी बीमारू ही है.इनके विकास का किसी पार्टी के पास कोई एजेंडा नहीं है. पहले रास्त्रपति डॉक्टर राजेंद्र बाबू, पूर्व प्रधान मंत्री लालबहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर,जयप्रकाश नारायण सहित कई रास्ट्रीय नेता यहाँ से हुए है. मगर किसी ने इनकी सुध नहीं ली. आजादी के बाद कांग्रेस का यहाँ सबसे ज्यादा बोलबाला था…फिर भाजपा काबिज हुई. और उसके बाद क्षेत्रीय दल.
इस क्षेत्र के लोगो के साथ सदा राजनैतिक स्तर पर धोखा हुआ है. चाहे वह कल कारखाने की बात हो, रोजगार की बात हो, चाहे इनका सतत विकास हो हर जगह इनसे दोहरा व्यवहार हुआ है. यहाँ के लोग भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में डालने की लड़ाई आज से नहीं लड़ रहे है, आजादी के बाद से ही यह जारी है….मगर यहाँ भी पंडित नेहरु के ज़माने से इन्हें ठगा जा रहा है…
 
बगैर केंद्र की सहमती के भोजपुरी को आठवी अनुसूची में जाने का सम्मान नहीं मिल सकता है…भाजपा के चुनावी रणनीति कारों के पास ये सुनहरा मौका है…भोजपुरी को वो सम्मान दे कर इस पट्टी की सहानुभूति ले सकते है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज इसी क्षेत्र से विजयी हुए है.मोदीजी का ये नैतिक कर्तव्य बनता है की भोजपुरी को उसका वाजिब हक़ दिलाएं. मोदीजी इस क्षेत्र के लोगो को जातिगत आधार से ऊपर उठ कर उन्हें सदा के लिए अपना बना सकते है. क्यूँ की भोजपुरी एक जाति की नहीं, बल्कि एक पट्टी की भाषा है..आज यह बगैर किसी मदद के एक वैश्विक भाषा के पटल पर उभर कर आ गई है…मोदीजी भाजपा और संघ चाहे तो उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों पर फतह हासिल कर सकते है …बस जरूरत है एक सही राजनैतिक चाल की…और उस चाल को वहां के क्षेत्रीय नेता भी नहीं काट पाएंगे…क्यूंकि वह राजनीतिक चाल नहीं बल्कि एक सही कदम होगा…

:- कमल किशोर उपाध्याय

kamal kishor upadhyayलेखक परिचय :-
कमल किशोर उपाध्याय : माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के विस्तार परिसर कर्मवीर विद्यापीठ में अतिथि व्यख्याता के तौर पर कार्यरत है । साथ ही पत्रकारिता से लम्बे समय से जुड़ कर विभिन्न सस्थानों में भी सेवा दे चुके है । और वर्तमान में असम विश्वविद्यालय से शोधार्थी है ।

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