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मोदी का व्यक्तित्व और आभामंडल इन दोनो नेताओं से कई गुना भारी

एक साथ हो गये ठीक वैसे ही जैसे बीते विधान सभा चुनाव के पहले राहुल और अखिलेश जोड़ी बनाकर निकले थे। हालाँकि राहुल और अखिलेश की जोड़ी का ही फल है कि 325 विधायकों का नेत्रत्व करते हुए योगी आज मैदान में डटे हुए हैं।
सवाल 2019 का चुनाव लोकसभा का है ऐसे में जिन दो पार्टियों के मुखिया एक साथ आयें हैं, उनके ट्रैक रिकार्ड को जाँचने की आवश्यकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पाँच और बसपा को शून्य सीटें प्राप्त हुईं थी, ऐसे में दोनों साथ आयें हैं।
शायद पाँच और शून्य को जोड़कर पचास करने की फ़िराक़ में हैं। सवाल यहीं शुरू होता हैं। क्या ऐसा चमत्कार सम्भव है।
दरअसल मोदी का व्यक्तित्व और आभामंडल इन सभी नेताओं से कई गुना बड़ा दिखता है। हाँ इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है की दोनों के साथ आ जाने से भाजपा को हाल ही में हुए उपचुनाव में अपनी दो सीटें गवानी पड़ी थी। लेकिन जिस प्रकार से आज दोनों नेताओं ने अपने गठजोड़ की मंशा को सभी के समक्ष रखा वह एक-एक वाक्य बड़े-बड़े सवालों को जन्म देता है, जिनका जवाब दिए बग़ैर ही दोनों नेताओं ने मंच छोड़ दिया। माया ने कहा हमारे वोट सपा को ट्रान्स्फ़र होंगे और सपा के वोट बसपा को ट्रान्स्फ़र होंगे यह सुनकर ऐसा लग रहा था कि जैसे बात जनता और वोटर की नहीं हो रही बल्कि किसी धनराशि को किसी एक अकाउंट से दूसरे अकाउंट में ट्रान्स्फ़र किया जाना हो।
क्या जनता के मन को उसकी पूरी की पूरी विचारधारा को इस पाले से उस पाले में भेज पाना सम्भव है ?
क्या वोटर का मन किसी पार्टी नेत्रत्व के निर्देशों पर चलता है ?
माया स्वार्थ में भूली पर क्या बसपा समर्थक गेस्ट हाउस कांड भूल पाएँगे ? आज माया ने राहुल को जमकर कोसा , कांग्रेस पार्टी को भ्रष्ट कहा साथ ही भविष्य में कांग्रेस से किसी भी प्रकार का गठबंधन करने से इनकार किया। मुझे माया की यह बात सुनते ही उनकी झूँठ-फ़रेब की तकनीक साफ़ नज़र आइ क्योंकि हाल ही में राजस्थान और मध्यप्रदेश में उन्होंने कांग्रेस को समर्थन दे रखा है और अगर कांग्रेस से माया को इतनी ही दिक्कत है तो अमेठी-रायबरेली की सीट कांग्रेस के लिए क्यों छोड़ी ? साथ ही सबसे बड़ी बात यह है कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए अगर माया कांग्रेस उनके कथन अनुसार भ्रष्ट कांग्रेस के साथ नहीं जाएँगी तो ज़रूर उन्हें भाजपा के साथ जाना होगा क्योंकि देश में राष्ट्रीय स्तर पर मात्र भाजपा और कांग्रेस ही विकल्प है।
उत्तर प्रदेश निर्णायक ज़रूर है किंतु निर्णय पूरे देश के संसदीय क्षेत्रों से होगा।दूसरी बड़ी बात यह है कि इनके गठबंधन का पीएम उम्मीदवार कौन होगा ? अगर राहुल अपने स्तर पर उम्मीदवारी पेश करते हैं तो माया तो राहुल को सर्थन देंगी नहीं , अगर अखिलेश समर्थन देंगे तो क्या राहुल के लिए वो बुआ को धोखा देंगे ? अगर अखिलेश उम्मीदवारी पेश करते हैं तो माया बर्दाश्त कर पाएँगी
? और राहुल अपनी माताजी से अखिलेश को समर्थन देने की अनुमति ले पाएँगे ?
चलिए ठीक है सबकी उम्मीदवारी तो समझ आती है लेकिन मुलायम के पुत्र ने जो पिता को प्रधानमंत्री बनाने का वादा किया था उसका क्या होगा ? कथनी करनी में बहुत फ़र्क़ है तस्वीर साफ़ हैं लेकिन वोटर असमंजस में ज़रूर पड़ेगा आख़िर वोट तो दें लेकिन नेता कौन होगा ? ऐसे में नयी पार्टियाँ राष्ट्रीय पार्टियों के आंतरिक संरक्षण में कुछ सीटों पर सपा-बसपा के अच्छे वोट कटवा साबित होंगे और अपने एक-दो सांसद बनाने में कामयाब भी होंगे। इस गठबंधन से नयी राजनैतिक कलह का जन्म होगा यह कहना अतिशयोक्ति ना होगी ख़ैर प्रधानमंत्री कोई भी बने लेकिन पहले कांग्रेस के साथ अपनी नाव डूबा चुके अखिलेश अब जिस राह पर चल निकले हैं उससे धीरे-धीरे अपना नुक़सान करते हुए अपने व्यक्तित्व और अपनी विचारधार के क्षरण की ओर बढ़ते हुए राजनैतिक बौने बनते जा रहे हैं।

@शाश्वत तिवारी
(लेख: शाश्वत तिवारी तेज न्यूज़ नेटवर्क के यूपी हेड एवं राजनीतिक विश्लेषक)

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