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अब मध्य प्रदेश में गेहूं घोटाला !

 भोपाल– सूखे की मार झेलते मध्यप्रदेश में भारतीय खाद्य निगम [FCI] की ओपन मार्केट सेल स्कीम (OMSS) के डेडीकेशन मूवमेंट के तहत कारोबारियों को गेहूं बेचे जाने में बड़ा घोटाला हुआ है।

अगर एफसीआई के दो अधिकारियों की जांच रिपोर्ट पर ध्यान दें तो वह भी इस घोटाले की ओर इशारा कर रही है। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि दो जांच रिपोर्ट एफसीआई के मुंबई मुख्यालय भेजे छह माह का वक्त गुजर जाने के बाद भी एफसीआई ने अफसरों और गड़बड़ी करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करना मुनासिब नहीं समझा है।

देश के अन्य हिस्सों की तरह मध्यप्रदेश में भी एफसीआई द्वारा नई फसल आने से पहले पुराने गेहूं की ओएमएसएस के तहत खुली बिक्री की जाती है, ताकि नई फसल को रखने के लिए गोदाम में स्थान सुनिश्चित किया जा सके।

इस प्रक्रिया से गेहूं वही कंपनियां खरीद सकती हैं, जो निगम में पंजीकृत (इम्पेनल्ड) होती हैं। गेहूं विक्रय के लिए प्रति सप्ताह ई-निविदाएं जारी की जाती हैं। बोली में तय मात्रा का गेहूं उसी कंपनी को दिया जाता है, जो तय शर्तो का पालन करते हुए सबसे ऊंची बोली लगाता है। इसी में गड़बड़ी सामने आई है। ऐसी दो कंपनियों को 15 हजार 900 मीट्रिक टन गेहूं का आवंटन किया गया, जिन्होंने शर्तो का उल्लंघन किया था। इस गेहूं की कीमत करीब 25 करोड़ रुपये थी।

एफसीआई के एजीएम (विजलेंस) अनिल कुमार ने 24 जुलाई 15 और डीजीएम वी के पाटिल ने चार सितंबर 15 को अपनी जांच रिपोर्ट सौंपीं है। इसमें दोनों अफसरों ने साफ तौर पर कहा है कि नियमों का ताक पर रखने वाली दो कंपनियों के छह मामले सामने आए है, जिनमें गड़बड़ी हुई है।

ये मामले दिसंबर 14 से जनवरी 15 के मध्य के है। इनमें छह रैक गेहूं आवंटन की प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। एक रैक में 2650 मीटिक ट्रन गेहूं जाता है। निगम की मुख्य शर्त है कि कोई भी कंपनी बोली (बिड) मंजूर होने से पहले रेलवे में इंडेंड (माल के लिए रैक) नहीं कर सकता, अगर ऐसा कोई कंपनी करती है तो उसे माल नहीं दिया जाएगा, मगर इन कंपनियों ने बोली मंजूर होने के पहले ही इंडेंड बुक करा लिए थे।

निगम का नियम है कि बोली मंजूर होने के बाद संबंधित कंपनी को रेलवे में इंडेंड की प्रक्रिया पूरी करना चाहिए, अगर कोई बोली मंजूर होने से पहले इंडेंड बुक कराता है तो उसे गेहूं नहीं दिया जाएगा, मगर शर्त का उल्लंघन होने के बाद भी रिलीज ऑर्डर जारी किए गए।

दोनों अधिकारियों की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि मॉडल टेंडर फार्म (एमटीएफ) के 11डी का सीधे तौर पर उल्लंघन कर दो कंपनियों की छह बोली मंजूर की गई है। इन कंपनियों ने प्रति रैक 2650 मीट्रिक टन गेहूं के लिए बोली लगाई थी। छह रैक में से तीन रैक हरदा रेलवे स्टेशन और तीन रैक इटारसी स्टेशन के है।

दोनों अधिकारियों की एजेंसी के हाथ आई जांच रिपोर्ट बताती है कि अगस्त 2014 से फरवरी 2015 तक मध्य प्रदेश से ओएमएसएस के तहत नीलामी के दौरा गेहूं परिवहन के लिए कुल 302 रैक का उपयोग हुआ। इनमें से हरदा से 73 और इटारसी से 46 रैक गए हैं, इन्हीं दो स्थानों से छह मामलों में गड़बड़ी सामने आई है।

इतना ही नहीं, जिन दो कंपनियों ने गड़बड़ी की है, उन्होंने कुल 105 रैक गेहूं लिया है यानी 2.95 लाख मीट्रिक टन। इस गेहूं की कीमत 431 करोड़ रुपये से ज्यादा है। इन दोनों कंपनियों को जांच से पहले जून 15 में कारण बताओ नोटिस दिए, मगर कार्रवाई नहीं हुई।

यह बताना लाजिमी है कि ओएमएसएस की डेडीकेशन मूवमेंट स्कीम के तहत एसफसीआई द्वारा गोदाम से गेहूं को संबंधित क्षेत्र के नजदीकी रेलवे स्टेशन तक पहुंचाया जाता है, इस परिवहन पर होने वाला खर्च एफसीआई वहन करती है, जबकि रैक का खर्च संबंधित कंपनी।

पूर्व में गोदाम स्तर पर नीलामी होती थी, मगर 2013-14 में इसमें बदलाव कर इसे रैक लेबिल पर किया गया, इसका अर्थ यह है कि एक रैक में जितना माल आएगा उतने गोदाम के माल की नीलामी एक साथ होगी। इस योजना में वर्ष 2014-15 में कुल 100 लाख मीट्रिक टन गेहूं बेचने का लक्ष्य तय किया गया था, इस योजना में निजी कंपनियों के अलावा अन्य राज्य सरकार या केंद्र शासित राज्य सरकारों को भी हिस्सा लेने की पात्रता होती है, जिन्हें पीडीएस या अन्य जनकल्याणकारी येाजनाओं के लिए गेहूं की जरूरत है।

एफसीआई अफसरों की जांच में जिन दो कंपनियों द्वारा की गई गड़बड़ी का खुलासा हुआ है, उन्होंने एफसीआई की ओर से जांच से पहले जारी नोटिस में अपने जवाब में कहा था कि आटा कंपनियों के मांग पर उन्हें लदान योजना में बदलाव कर इडेंड बुक कराने का कदम उठाना पड़ा है। इन दोनों कंपनियों के जवाब की भाषा एक जैसी है, जो उनके आपस में जुड़े होने की ओर भी इशारा करती है। जांच में इस जवाब को भी यह कहते हुए खारिज किया गया है, समझौता किसी तीसरी पार्टी से नहीं, बल्कि एफसीआई और बोली लगाने वाले के बीच हुआ है।

एफसीआई के अधिकारियों के बीच हुए पत्र भी एजेंसी के हाथ आए हैं, जो इस बात का खुलासा करते हैं कि रिलीज ऑर्डर के बगैर ही बोली लगाने वाली कंपनी माल का उठाव कर लेती है। इसके लिए एक तरफ कंपनी दवाब डालती है, तो दूसरी ओर उच्च अधिकारी के दूरभाष पर मिले निर्देश का अनुपालन करते हुए लदान करना पड़ता है।

इस गड़बड़ी की जांच रिपोर्ट छह माह पूर्व मुंबई कार्यालय को भेजी जा चुकी है। जांच रिपोर्ट आईएएनएस के हाथ लगने पर एफसीआई के मुंबई स्थित कार्यालय के कार्यपालन अधिकारी (ईडी) सुरेंद्र सिंह से संपर्क किया गया।

उन्होंने एजेंसी से 28 जनवरी को ईमेल पर ब्योरा मांगा, मगर जवाब छह फरवरी तक नहीं आया। इसके अलावा भोपाल के क्षेत्रीय कार्यालय के महाप्रबंधक एम.एस. भुल्लर ने चाही गई जानकारी का ब्योरा देने के लिए 27 जनवरी को लिखित में सवाल मांगे, मगर छह फरवरी तक कोई ब्योरा नहीं दिया गया।

भोपाल स्थित कार्यालय के एजीएम (कामर्शियल) पुष्पेंद्र सिंह ने शनिवार को एजेंसी से कहा कि यह बात सही है कि छह मामलों में गड़बड़ी पाई गई है, जिस पर कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है। उन्होंने कहा कि संबंधित कंपनियों ने नियम व शर्त का उल्लंघन किया है, मगर रैक पहले बुक कराने से किसी तरह की आर्थिक अनियमितता नहीं हुई है। [आईएएनएस]

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