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उपभोक्ता दिवस पर विशेष :हमारे शोषण के कारण,समाधान

Jago Grahak Jago

आज समाज में बढ़ते उपभोक्तावाद, स्वार्थवाद, भ्रष्टाचार, नैतिक मूल्यों के पतन, पश्चिमीकरण, के चलते खाद्य पदार्थाे में अखाद्य पदार्थाे की मिलावट, फलों को जहरीले रसायनो में पकाने, गाय – भैसो को आक्सीटोसिन का इंजेक्शन देने,सब्जियों में अंधाधुन्द कीटनाशको का प्रयोग सिंथेटिक दूध जैसी घटनाओं से आम उपभोक्ता की चेतना झनझना उठी है।बाजार में उपलब्ध जहरीले पदार्थाे की विषवेळ में वह लिपट कर रह गया है।वह वह सिर्फ छटपटाने के आलावा कुछ भी कर सकने में अपने को पूर्णता असमर्थ महसूस कर रहा है।अब समय आ गया है, कि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो और इस व्यवस्था के विरुद्ध जंग का ऐलान करें।
उपभोक्ताओं के अधिकार – भारत में उपभोक्ताओं को निम्न लिखित अधिकार मिले हुए है –
1. जीवन एवं संपत्ति के लिए हानिकारक सामान और सेवाओं के विपणन के खिला़फ सुरक्षा का अधिकार।
2. सामान अथवा सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, स्तर और मूल्य, जैसा भी मामला हो, के बारे में जानकारी का अधिकार, ताकि उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार पद्धतियों से बचाया जा सके।
3. जहां तक संभव हो उचित मूल्यों पर विभिन्न प्रकार के सामान तथा सेवाओं तक पहुंच का आश्वासन।
4. उपभोक्ताओं के हितों पर विचार करने के लिए बनाए गए विभिन्न मंचों पर प्रतिनिधित्व का अधिकार।
5.अनुचित व्यापार पद्धतियों या उपभोक्ताओं के शोषण के विरुद्ध निपटान का अधिकार।
6. सूचना संपन्न उपभोक्ता बनने के लिए ज्ञान और कौशल प्राप्त करने का अधिकार।
7. अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने का अधिकार।

माप-तोल के नियम: हमारे देश में हर व्यापारी के लिए माप-तोल के नियम के नियम बनाये गये है, जो निम्न लिखित है –
1. हर बांट पर निरीक्षक की मुहर होनी चाहिए।
2. एक साल की अवधि में मुहर का सत्यापन ज़रूरी है।
3. पत्थर, धातुओं आदि के टुकड़ों का बांट के तौर पर इस्तेमाल नहीं हो सकता।
4. फेरी वालों के अलावा किसी अन्य को तराज़ू हाथ में पक़ड कर तोलने की अनुमति नहीं है।
5. तराज़ू एक हुक या छड़ की सहायता से लटका होना चाहिए।
6. लकड़ी और गोल डंडी की तराज़ू का इस्तेमाल दंडनीय है।
7. कपडा मापने के मीटर के दोनों सिरों पर मुहर होनी चाहिए।
8. तेल एवं दूध आदि के मापों के नीचे तल्ला लटका हुआ नहीं होना चाहिए।
9. मिठाई, गिरीदार वस्तुओं एवं मसालों आदि की तुलाई में डिब्बे का वज़न शामिल नहीं किया जा सकता।
10. पैकिंग वस्तुओं पर निर्माता का नाम, पता, वस्तु की शुद्ध तोल एवं क़ीमत कर सहित अंकित हो। साथ ही पैकिंग का साल और महीना लिखा होना चाहिए।
11. पैकिंग वस्तुओं पर मूल्य का स्टीकर नहीं होना चाहिए।

उपभोक्ताप संरक्षण अधिनियम
भारत में 24 दिसंबर के दिन राष्ट्रीय उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है, क्योकि इसी दिन उपभोक्ताकओं के अधिकारों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्यअ से उपभोक्तात संरक्षण अधिनियम 1986 लागू किया गया। इस अधिनियम में मुख्यातरू दंडात्मेक या निवारणात्मोक मार्ग के स्थािन पर शोषण और अनुचित रूप से लेनदेन के विभिन्न प्रकारों के ख़िलाफ़ उपभोक्तामओं को प्रभावी सुरक्षा प्रदान की जाती है। यह सभी वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होता है।इसमे त्वरित और,काम खर्चीले न्याय के पहलू को शामिल किया गया है। 

उपभोक्ताा संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत अधिकार भारत के संविधान की धारा 14 से 19 बीच वर्णित मूल अधिकारों से आरंभ होते हैं। अधिनियम के अनुसार ‘उपभोक्तार‘ को निम्नारनुसार परिभाषित किया हैः 

कोई व्यंक्ति जो विचार हेतु सामान ख़रीदता हैं और कोई व्यश्क्ति जो बिक्री करने वाले की अनुमति से इन वस्तुरओं का उपयोग करता है। कोई व्यरक्ति जो विचार हेतु कोई सेवा किराए पर लेता है और इन सेवाओं के कोई लाभार्थी, बशर्तें कि सेवा का लाभ उस व्ययक्ति के अनुमोदन से लिया गया है जिसने विचार हेतु सेवाएं किराए पर ली थीं।
इसके अलावा किसी ऐसी वस्तुो या सेवा को विचार में लेना जिसके लिए या तो भुगतान किया गया है अथवा इसका वचन दिया गया हैं या आंशिक भुगतान किया गया है अथवा वचन दिया गया है अथवा इसे एक आस्थभगित भुगतान की प्रणाली के तहत प्रदान किया गया है।
इस अधिनियम में उपभोक्तानओं को निम्न लिखित 6 अधिकार प्रदान किये गये है –
1. सुरक्षा का अधिकार, 2. सूचना पाने का अधिकार, 3. चुनने का अधिकार, 4. सुने जाने का अधिकार, 5. विवाद सुलझाने का अधिकार, 6. उपभोक्ताल शिक्षा का अधिकार

उपभोक्ताओं की परेशानियाँ
बढ़ते बाज़ारवाद के दौर में उपभोक्ता संस्कृति तो देखने को मिल रही है, लेकिन उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी है। आज हर व्यक्ति उपभोक्ता है, चाहे वह कोई वस्तु ख़रीद रहा हो या फिर किसी सेवा को प्राप्त कर रहा हो। दरअसल, मुना़फा़खोरी ने उपभोक्ताओं के लिए कई तरह की परेशानियां पैदा कर दी हैं। वस्तुओं में मिलावट और निम्न गुणवत्ता की वजह से जहां उन्हें परेशानी होती है, वहीं सेवाओं में व्यवधान या पर्याप्त सेवा न मिलने से भी उन्हें द़िक्क़तों का सामना करना पड़ता है। हालांकि भारत सरकार कहती है, जब आप पूरी क़ीमत देते हैं तो कोई भी वस्तु वज़न में कम न लें। बात सही है या नहीं, यह सुनिश्चित करने के लिए क़ानून है। यह स्लोगन सरकारी दफ्तरों में देखने को मिल जाएगा। सरकार ने उपभोक्ताओं को संरक्षण देने के लिए कई क़ानून बनाए हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ताओं से पूरी क़ीमत वसूलने के बाद उन्हें सही वस्तुएं और वाजिब सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं।

1.सेहत के लिए नुक़सानदेह पदार्थ मिलाकर व्यापारियों द्वारा खाद्य पदार्थों में मिलावट करना या कुछ ऐसे पदार्थ निकाल लेना, जिनके कम होने से पदार्थ की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ता है, जैसे दूध से क्रीम निकाल कर बेचना।
2. टेलीविजन और पत्र-पत्रिकाओं में गुमराह करने वाले विज्ञापनों के ज़रिये वस्तुओं तथा सेवाओं का ग्राहकों की मांग को प्रभावित करना।
3. वस्तुओं की पैकिंग पर दी गई जानकारी से अलग सामग्री पैकेट के भीतर रखना।
4. बिक्री के बाद सेवाओं को अनुचित रूप से देना।
5. दोषयुक्त वस्तुओं की आपूर्ति करना।
6. क़ीमत में छुपे हुए तथ्य शामिल होना।
7. उत्पाद पर ग़लत या छुपी हुई दरें लिखना।
8. वस्तुओं के वज़न और मापन में झूठे या निम्न स्तर के साधन इस्तेमाल करना।
9. थोक मात्रा में आपूर्ति करने पर वस्तुओं की गुणवत्ता में गिरावट आना।
10.अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का ग़लत तौर पर निर्धारण करना।
11. एमआरपी से ज़्यादा क़ीमत पर बेचना।
12. दवाओं आदि जैसे अनिवार्य उत्पादों की अनाधिकृत बिक्री उनकी समापन तिथि के बाद करना।
13. कमज़ोर उपभोक्ताएं सेवाएं, जिसके कारण उपभोक्ता को परेशानी हो।
14. बिक्री और सेवाओं की शर्तों और निबंधनों का पालन न करना।
15. उत्पाद के बारे में झूठी या अधूरी जानकारी देना।
16. गारंटी या वारंटी आदि को पूरा न करना। 

समस्या का समाधान यहीं
गांधी जी का कहना था ‘शोषक से अधिक अपना शोषण करवाने वाला जिम्मेदार होता है‘ ठीक यही स्थिति आज सनज में देखने को मिल रही है। हम खुद उत्पादक, व्यापारी, और विक्रेता को आपने शोषण करवाने का अवसर देते है, इस भ्रष्ट व्यवस्था को जाने – अनजाने में हम खुद बढ़ावा दे रहे है।हमारे शोषण के कारण, हममें ही निहित है।
एक जागरूक उपभोक्ता न केवल अपने आप को शोषण से बचाता है, बल्कि पूरे निर्माण,सेवा क्षेत्र में दक्षता, पारदर्शिता और उत्तूरदायित्वा को भी प्रोत्साहित करता है। और समाज के अन्य लोगो को भी प्रोत्साहित करता है।अगर हम आज से ही इन बातो को आपने जीवन का अंग बना ले, तो हम न केवल स्वथ्य समाज की कल्पना साकार कर सकेंगे, वल्कि भ्रष्टाचार पर भी काफी लगाम लग जाएगी –
1. कैश मेमो या रसीद जरूर मांगे।कैश मेमो लेने की आदत डालें, बिना कैश मेमो के आप कही भी शिकायत नहीं कर सकते, और विक्रेता आपको झूठा सावित कर देगा।
2. खरीदते समय पैकेट पर निर्माता का नाम, ब्रांड नाम, पैकिंग और एक्सपायरी तारीख, वजन, अधिकतम कीमत, सम्बंधित मार्क जरूर देखे, और अगर ये सब उस पर अंकित नहीं है तो उसे ना ख़रीदे।
3. मिलावटी और निम्न गुणवत्ता वस्तुओ का पुरजोर विरोध करे।
4.जल्दी लालच में न आये।याद रखिये बाजार में कभी भी कोई अपना नुकसान करके दूसरे का फायदा कभी नहीं करता है।
5. उपभोक्ता इण्टतरनेट के जरिये अपनी शिकायत कोर सेण्टीर को कर सकते हैं।
कोर सेण्टपर में शिकायत किये जाने हेतु वेबसाइटसीओआरई डॉट एनआईसी डॉट इन पर लॉगइन करें तथा सीधे कंपलेंट रजिस्ट्रे शन पर क्लिक करें और शिकायत फार्म को भर दें। आपको ऑनलाइन ही आपकी शिकायत दर्ज होने का का शिकायत क्रमांक प्राप्त होगा, इस क्रमांक सहित फार्म का प्रिन्टर से प्रिन्ट प्राप्ते कर लें। यहॉं 72 घण्टेम के भीतर कार्यवाही सम्पापदित की जाती है और आपको ई मेल के जरिये सम्पाादित कार्यवाही से अवगत कराया जाता है। तथा दूसरे पक्ष को 14 दिन के भीतर उपभोक्तो की शिकायत दूर करने के निर्देश जारी किये जाते हैं। अन्घ्यथा उन्हें काली सूची में डाल कर ब्लै1कलिस्टक कर दिया जाता है।
6. उपभोक्ता अगर चाहे तो 20 लाख से काम के मामलो में सीधा जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कर सकता है।शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत सादे कागज पर की जा सकती है। शिकायत में शिकायतकर्ताओं तथा विपरीत पार्टी के नाम का विवरण तथा पता, शिकायत से संबंधित तथ्य एवं यह सब कब और कहां हुआ आदि का विवरण, शिकायत में उल्लिखित आरोपों के समर्थन में दस्तावेज साथ ही प्राधिकृत एजेंट के हस्ताक्षर होने चाहिये। इस प्रकार की शिकायत दर्ज कराने के लिये किसी वकील की आवश्यकता नही होती। साथ ही इस कार्य पर नाममात्र न्यायालय शुल्क ली जाती है।
शिकायत कहां की जाये, यह बात सामान सेवाओं की लागत अथवा मांगी गई क्षतिपूर्ति पर निर्भर करती है। अगर यह राशि 20 लाख रूपये से कम है तो जिला फोरम में शिकायत करें। यदि यह राशि 20 लाख रूपये से अधिक लेकिन एक करोड़ रूपये से कम है तो राज्य आयोग के समक्ष और यदि एक करोड़ रूपसे अधिक है तो राष्ट्रीय आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज करायें। वैबसाईट एफसीए एमआईएन डॉट एनआईसी डॉट इन पर सभी पते उपलब्ध हैं।
7. राष्घ्ट्रीय उपभोक्ता हेल्प लाइन – विभाग ने एक राष्ट्री य हेल्पहलाइन शुरू किया है। टॉल फ्री नंबर 1800-11-4000 की सुविधा सभी कार्यदिवसों में 09.30 बजे सुबह से लेकर 05.30 बजे शाम तक उपलब्धर है।
8 मुख्यमंत्री शिकायत प्रकोष्ठ पर शिकायत करे, शिकायत हेतु 181 नंबर डायल करे। यहाँ की गयी शिकायत कर तुरंत कार्यवाही होती है।
अगर इनमे से कुछ बातो को भी हम आपने जीवन में अपना ले तो हम न केवल पर्यावरण, पशु पक्षियों और समाज की रक्षा कर सकेंगे, वल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्वस्थ, स्वच्छ, भ्रष्टाचारमुक्त समाज की कल्पना साकार कर सकेंगे।

लेखक -योगेंद्र मिश्रा

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