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नेपाल का ईश्वर ही मालिक है

नेपाल फिर डांवाडोल हो रहा है। प्रधानमंत्री के.पी. ओली के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ गया है। यह प्रस्ताव माओवादी पार्टी के नेता पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने रखा है। प्रचंड की माओवादी पार्टी और ओली की एकीकृत मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट पार्टी (एमाले) ने काठमांडों में गठबंधन सरकार बना रखी थी।

इस सरकार को बने अभी साल भर भी नहीं हुआ है कि यह अधर में लटक गई है। 21 जुलाई को सदन में होने वाले शक्ति-परीक्षण में ओली-सरकार का गिरना तय है, क्योंकि माओवादियों का नेपाली-कांग्रेस से समझौता हो गया है। दोनों की सदस्य-संख्या मिलकर 290 हो जाती है और 40 मधेसी सदस्य मिलकर कुल 330 हो जाएंगे जबकि 598 के सदन में स्पष्ट बहुमत के लिए सिर्फ 300 सदस्य चाहिए।

लेकिन यह जरुरी नहीं है कि संसद में हार जाने के बावजूद ओली इस्तीफा दे ही दें। वे पहले ही संसद भंग करवा सकते हैं और अगले चुनाव तक ‘कामचलाऊ’ प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं। सदन में हारने के बाद भी वे अगले चुनाव तक टिके रह सकते हैं, बशर्ते कि राष्ट्रपति या सर्वोच्च न्यायालय उन्हें बर्खास्त न कर दे।

नेपाली संविधान की इस ढील का फायदा ओली को इसलिए भी मिल सकता है कि इस समय राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी उन्हीं की पार्टी की एक नेता रही हैं। पिछले समय में तीन प्रधानमंत्रियों ने ‘कामचलाऊ’ काल को कई महिनों तक खींच दिया था। यदि अब भी ऐसा होता है तो नेपाल अराजकता के नए दौर में प्रवेश करेगा। यों भी 26 साल में नेपाल 23 प्रधानमंत्री देख चुका है।

ओली ने भारत के मत्थे अपना ठीकरा फोड़ा है। उनके अनुसार उनके खिलाफ ‘प्रचंड’ को भारत ने उकसाया है। ‘प्रचंड’ तो चीन के मित्र हैं, माओवादी हैं और भारत के खिलाफ वे लड़ते रहे हैं। ये अलग बात है कि नए संविधान में मधेसियों के अधिकारों की रक्षा की बात वे कर रहे हैं, जो भारत को प्रिय है।

वास्तव में प्रचंड ने ओली से इसलिए हाथ खींचा है कि ओली ने अभी तक माओवादियों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस नहीं लिये, उन्हें मुआवजे नहीं दिए, भूखंड उनके नाम नहीं किए, सरकारी बंदरबांट में उन्हें कुछ नहीं मिला और ‘प्रचंड’ को प्रधानमंत्री पद सौंपने के बारे में भी ओली अपने वादे से मुकर गए। इसके अलावा ओली-सरकार भूकंप-पीड़ितों की भी मदद नहीं कर पाई। विदेशी मदद का उपयोग तक नहीं हो पाया। चीन से पीगें बढ़ाईं लेकिन ओली ने भारत के प्रति दोमुंहा रवैया बनाए रखा।

अब नेपाली कांग्रेस और माओवादी मिलकर सरकार बनाना चाहते हैं। पता नहीं, वह कितने हफ्ते चलेगी? क्योंकि दोनों पार्टियां लगभग 10 साल तक एक-दूसरे की जानी दुश्मन रही हैं। कई मुद्दों पर दोनों में अभी भी मतभेद है। कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा और ‘प्रचंड’ बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनेंगे। पौन-पौन साल में दोनों क्या-क्या कर लेंगे, वे ही जानें। नेपाल का ईश्वर ही मालिक है।

लेखक:- @डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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