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दिल्ली के बजट ने पेश की देश में एक नजीर

delhi-budget manish sisodiyaक्या कभी आपने किसी भी सरकार को जनता से पूछ कर बजट बनाते हुए सुना है…मैंने कभी नहीं सुना…पाठकों का मै कह नहीं सकता.हालाँकि किसी भी सरकार ने कभी ऐसा किया भी नहीं है, कि आम जनता से पूछे की हमारे देश और राज्य का बजट कैसा होना चाहिए.बजट बन ने जा रहा है किसी को कुछ कहना है. मीडिया वाले ही आम जनता से पूछने की जहमत उठाते है की इस बजट से आपको क्या उम्मीद है.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने विधानसभा में बजट पेश किया. यह बजट कई मामलो में अनोखा है .देश में पहली बार आम जनता से पूछ कर किसी सरकार ने बजट बनाया और पेश किया. लोगो से उनकी आम राय जानी गई बजट के बारेमे . फिर बना उसके अनुसार दिल्ली का बजट.दिल्ली के उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री मनीष सिसोदिया ने ऐसा बजट पेश कर देश की राजनीति में एक नयी लकीर खींच दी है. अक्सर जनता को लगता है की वोट देने के बाद उसका काम ख़त्म. मगर पहली बार दिल्ली के लोगो को लगा की नहीं वोट देने के बाद भी कोई सरकार हमसे हमरा निर्णय पूछती हैऔर पूछती ही नहीं है अमल भी करती है. कुल 1500 सुझाव मिले आम जनता से बजट पर. जब बजट बनकर लोगो के सामने आया तो.वैट में कोई वृद्धि नहीं हुई. लाइसेन्स राज की समाप्ति का प्रस्ताव. प्रदुषण पर अंकुश.जिम क्लब स्पा मल्टीप्लेक्स में जाना महंगा हुआ. इन जगहों पर आम गरीब जनता कभी नहीं जाती. अमीरों के ये शौख है.कुकर, बर्तन,मोमबत्ती सस्ते हुए.शिक्षा, हेल्थ,परिवहन,जल, बिजली के लिए बजट आवंटन में वृद्धि की गई है. दिल्ली के महाविद्यालयों और गांवों में मुफ्त वाई फाई के लिए अलग से 50 करोड़ रखा गया है.253 करोड़ रूपये का एक स्वराज कोष बना है. ये पैसे कैसे खर्च होंगे ये जनता की आवश्यकताओं पर निर्भर करेगा. यह एक नयी पहल है.

कई चीजों से हाल ही में यहाँ की सरकार काफी चर्चा में रही.फर्जी डिग्री और पत्नी की पिटाई के साथ ही अन्य कई मामले. राजनीतिक चोचलेबाजियो की वज़ह नकारात्मक ख़बरें ही ज्यादा चर्चा में रहती है.लगता ही नहीं है की कुछ अच्छा हो रहा है. सब बेकार है.मगर छोटी छोटी पहल भी काफी सुकून देती है.इस मामले में मोदीजी की सोच भी मुझे काफी अच्छी लगती है. मेक इन इंडिया.डिजिटल इंडिया.स्वच्छ भारत अभियान योग जागरूकता सहित कई ऐसे काम है जो उनके बहुत ही अच्छे है.आज ही वो कह रहे है हर बेघर को घर दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है.

दिल्ली की सरकार ने एक और अच्छी योजना बनाई है निर्माण कार्यो के शिला पट्टी पर मजदूरों का नाम अंकित करवा कर. बचपन से मैंने देखा है हर शिला पट्टी पर उद्घाटन करने वाले का ही नाम होता है.उसे बनाने वाले मजदूर का नहीं.ये संभव भी नहीं है कितने लोगो का नाम लिखा जायेगा. शायद इस वजह से कभी लिखा ही नहीं गया. मगर दिल्ली में अब ये हो रहा है. कुछ लोगो के नाम जुड़ रहे है….

जनता के द्वार चुनी गई सरकारों का काम है जनता का मनोबल सकारात्मक कामो के लिए ऊँचा उठाना.विकास करना.आज की राजनीति के मायने ही बदल गए है राजनीति यानि पॉवर और पैसा. इस वजह से राजनीति करने वाले अब इस क्षेत्र में करियर बनाते है. जनता की सेवा नहीं. इसीलिए झूट,फरेब,लूट,घपला.भ्रस्टाचार,ओछी राजनीति सब कुछ देखने को मिलता है.किसी भी हद तक जा कर स्वहित देखो,परोपकार तो ओल्ड फैशन हो गया है.इससे कुछ मिलना थोड़े ही है.इस पे बेजा समय क्यूँ बर्बाद करें.

क्या ऐसी ही राजनीति से देश आगे बढेगा.हमारी आने वाली पीढ़ी सद्गुण,सद्विचार सीखेगी.भारत अपनी संस्कृति की वजह से जाना जाता है.क्या ये हरकते हमारी संस्कृति को बचाने में मददगार साबित होंगी. ऐसे क्या विश्व में हम नज़ीर बन पायेंगे.देखिये विचार शुरु हुआ था आप के बजट से और कहाँ पहुच गया प्रवचन पे. माफ़ी चाहता हूँ.क्या कभी आपने किसी भी सरकार को जनता से पूछ कर बजट बनाते हुए सुना है…मैंने कभी नहीं सुना…पाठकों का मै कह नहीं सकता.हालाँकि किसी भी सरकार ने कभी ऐसा किया भी नहीं है, कि आम जनता से पूछे की हमारे देश और राज्य का बजट कैसा होना चाहिए.बजट बन ने जा रहा है किसी को कुछ कहना है. मीडिया वाले ही आम जनता से पूछने की जहमत उठाते है की इस बजट से आपको क्या उम्मीद है.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने विधानसभा में बजट पेश किया. यह बजट कई मामलो में अनोखा है .देश में पहली बार आम जनता से पूछ कर किसी सरकार ने बजट बनाया और पेश किया. लोगो से उनकी आम राय जानी गई बजट के बारेमे . फिर बना उसके अनुसार दिल्ली का बजट.दिल्ली के उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री मनीष सिसोदिया ने ऐसा बजट पेश कर देश की राजनीति में एक नयी लकीर खींच दी है. अक्सर जनता को लगता है की वोट देने के बाद उसका काम ख़त्म. मगर पहली बार दिल्ली के लोगो को लगा की नहीं वोट देने के बाद भी कोई सरकार हमसे हमरा निर्णय पूछती हैऔर पूछती ही नहीं है अमल भी करती है. कुल 1500 सुझाव मिले आम जनता से बजट पर. जब बजट बनकर लोगो के सामने आया तो.वैट में कोई वृद्धि नहीं हुई. लाइसेन्स राज की समाप्ति का प्रस्ताव. प्रदुषण पर अंकुश.जिम क्लब स्पा मल्टीप्लेक्स में जाना महंगा हुआ. इन जगहों पर आम गरीब जनता कभी नहीं जाती. अमीरों के ये शौख है.कुकर, बर्तन,मोमबत्ती सस्ते हुए.शिक्षा, हेल्थ,परिवहन,जल, बिजली के लिए बजट आवंटन में वृद्धि की गई है. दिल्ली के महाविद्यालयों और गांवों में मुफ्त वाई फाई के लिए अलग से 50 करोड़ रखा गया है.253 करोड़ रूपये का एक स्वराज कोष बना है. ये पैसे कैसे खर्च होंगे ये जनता की आवश्यकताओं पर निर्भर करेगा. यह एक नयी पहल है.

कई चीजों से हाल ही में यहाँ की सरकार काफी चर्चा में रही.फर्जी डिग्री और पत्नी की पिटाई के साथ ही अन्य कई मामले. राजनीतिक चोचलेबाजियो की वज़ह नकारात्मक ख़बरें ही ज्यादा चर्चा में रहती है.लगता ही नहीं है की कुछ अच्छा हो रहा है. सब बेकार है.मगर छोटी छोटी पहल भी काफी सुकून देती है.इस मामले में मोदीजी की सोच भी मुझे काफी अच्छी लगती है. मेक इन इंडिया.डिजिटल इंडिया.स्वच्छ भारत अभियान योग जागरूकता सहित कई ऐसे काम है जो उनके बहुत ही अच्छे है.आज ही वो कह रहे है हर बेघर को घर दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है.

दिल्ली की सरकार ने एक और अच्छी योजना बनाई है निर्माण कार्यो के शिला पट्टी पर मजदूरों का नाम अंकित करवा कर. बचपन से मैंने देखा है हर शिला पट्टी पर उद्घाटन करने वाले का ही नाम होता है.उसे बनाने वाले मजदूर का नहीं.ये संभव भी नहीं है कितने लोगो का नाम लिखा जायेगा. शायद इस वजह से कभी लिखा ही नहीं गया. मगर दिल्ली में अब ये हो रहा है. कुछ लोगो के नाम जुड़ रहे है….

जनता के द्वार चुनी गई सरकारों का काम है जनता का मनोबल सकारात्मक कामो के लिए ऊँचा उठाना.विकास करना.आज की राजनीति के मायने ही बदल गए है राजनीति यानि पॉवर और पैसा. इस वजह से राजनीति करने वाले अब इस क्षेत्र में करियर बनाते है. जनता की सेवा नहीं. इसीलिए झूट,फरेब,लूट,घपला.भ्रस्टाचार,ओछी राजनीति सब कुछ देखने को मिलता है.किसी भी हद तक जा कर स्वहित देखो,परोपकार तो ओल्ड फैशन हो गया है.इससे कुछ मिलना थोड़े ही है.इस पे बेजा समय क्यूँ बर्बाद करें.

क्या ऐसी ही राजनीति से देश आगे बढेगा.हमारी आने वाली पीढ़ी सद्गुण,सद्विचार सीखेगी.भारत अपनी संस्कृति की वजह से जाना जाता है.क्या ये हरकते हमारी संस्कृति को बचाने में मददगार साबित होंगी. ऐसे क्या विश्व में हम नज़ीर बन पायेंगे.देखिये विचार शुरु हुआ था आप के बजट से और कहाँ पहुच गया प्रवचन पे. माफ़ी चाहता हूँ.

नोट :- यह लेख लेखक कमल किशोर उपाध्याय की फेसबुक वाल से लिया गया है 

:- कमल किशोर उपाध्याय

kamal kishor upadhyayलेखक परिचय :-
कमल किशोर उपाध्याय : माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के विस्तार परिसर कर्मवीर विद्यापीठ में अतिथि व्यख्याता के तौर पर कार्यरत है । साथ ही पत्रकारिता से लम्बे समय से जुड़ कर विभिन्न सस्थानों में भी सेवा दे चुके है । और वर्तमान में असम विश्वविद्यालय से शोधार्थी है ।

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