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अवैध संबंधों का दोषी केवल पुरुष ही क्यों: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : शादी के बाद अवैध संबंध से जुड़े कानूनी प्रावधान को गैर संवैधानिक करार दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है। याचिका में कहा गया है कि आईपीसी की धारा-497 के तहत जो कानूनी प्रावधान है वह पुरुषों के साथ भेदभाव वाला है।

अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी और शादीशुदा महिला के साथ उसकी सहमति से संबंधित बनाता है तो ऐसे संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ उस महिला का पति व्यभिचार का केस दर्ज करा सकता है लेकिन संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ मामला दर्ज करने का प्रावधान नहीं है जो भेदभाव वाला है और इस प्रावधान को गैर संवैधानिक घोषित किया जाए।

याचिकाकर्ता के वकील के. राज की ओर से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के गृह मंत्रालय को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि पहली नजर में धारा-497 संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती है। अगर दोनों आपसी रजामंदी से संबंध बनाते हैं तो महिला को उस दायित्व से कैसे छूट दी जा सकती है।

याचिका में कहा गया है कि ये धारा पुरुष के खिलाफ भेदभाव वाला है। याचिका में कहा गया है कि ये संविधान की धारा-14 (समानता), 15 और 21 (जीवन के अधिकार) का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता ने कहा कि एक तरह से ये महिला के खिलाफ भी कानून है, क्योंकि महिला को इस मामले में पति की प्रॉपर्टी जैसा माना गया है। अगर पति की सहमति हो तो फिर मामला नहीं बनता।

याचिका में कहा गया है कि ये प्रावधान भेदभाव वाला है और जेंडर जस्टिस के खिलाफ है। इससे समानता के अधिकार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। याचिका में कहा गया है कि इस आईपीसी के प्रावधान को अवैध, मनमाना और गैर संवैधानिक घोषित किया जाए।

आईपीसी की धारा-497 के तहत प्रावधान

कानूनी प्रावधान के मुताबिक कोई किसी शादीशुदा महिला की मर्जी से संबंध बनाता है और महिला के पति की इसको लेकर सहमति नहीं है तो ऐसे संबंध बनाने वाले शख्स के खिलाफ आईपीसी की धारा-497 के तहत व्यभिचार का केस दर्ज होगा और दोषी पाए जाने पर 5 साल तक कैद की सजा हो सकती है। सीआरपीसी की धारा 198 (2) कहती है कि धारा-497 के तहत किए गए अपराध के मामले में पति ही शिकायती हो सकता है।

विरोधाभास

अगर महिला के साथ कोई संबंध बनाता है तो पुरुष के खिलाफ अगर व्यभिचार का केस बनता है तो फिर उस महिला के खिलाफ भी केस क्यों नहीं बनता जो पुरुष के साथ सहमति के साथ बराबर की भागीदार है। महिला की सहमति नहीं होने पर तो सीधे तौर पर रेप का केस बनता है, लेकिन धारा-497 का इस्तेमाल तब होता है जब महिला की ऐसे संबंध के लिए सहमति हो। ऐसे मामले में उस महिला को आरोपी नहीं बनाया जा सकता, जिसके साथ संबंध बनाए गए हैं।

अजीब स्थिति

महिला की ओर से उसका कोई रिश्तेदार महिला से संबंध बनाने के मामले में शिकायत नहीं कर सकता। यहां भी महिला को एक प्रॉपर्टी की तरह माना गया है। महिला के बेटे, बेटी किसी के ऐतराज का कोई मायने नहीं है अगर महिला का पति ऐसे संबंध के मामले में शिकायती नहीं है।

कानून में हैं कई पेच

हाई कोर्ट की वकील रेखा अग्रवाल बताती हैं कि इस कानून में कई भेदभाव दिखते हैं। अगर किसी महिला का पति किसी और महिला के साथ संबंध बनाता है और उक्त दूसरी महिला की सहमति है तो फिर ऐसे मामले में महिला अपने पति या फिर उक्त दूसरी महिला के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकती। जिस महिला के पति ने व्यभिचार का अपराध किया है उसके खिलाफ महिला सिर्फ उस आधार पर तलाक ले सकती है, लेकिन महिला खुद शिकायती बन आपराधिक केस नहीं दर्ज करा सकती।

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