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पीके किसी के खिलाफ नहीं

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इन दिनों बालीबुड के सबसे कामयाब निर्देशक राजकुमार हीरानी की लंबे इंतजार के बाद फिल्म पीके पदें पर आ गई है। जैसा कि अब होता है हर बड़ी कामयाब फिल्म पहले सुर्खियां बटोरती है फिर पैसा। अजीबोगरीब नाम वाली ये फिल्म कुछ दिनों पहले तब चर्चा में आई थी जब उसका पहला पोस्टर रिलीज हुआ था जिसमें नंग धडंग आमिर खान गले में टांजिस्टर कम टेपरिकार्डर लिये खड़े दिखे थे। इसी पोस्टर को लेकर अश्लीलता फैलाने के आरोप लगे और देश की अदालतो में मुकदमे दर्ज कराने की कोशिशें की गर्इं। मगर अब अदालतें फिल्म को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में रखकर ऐसे मामलों में सख्त फैसले सुनाने से बचतीं हैं। आमिर और फिल्म निर्माता निदेशक को जैसा हाइप इस पोस्टर से चाहिये था मिल गया। हैरानी की बात ये रही कि आज जब हर छोटी बड़ी फिल्म के प्रमोशन के लिये हीरो हीरोइन न्यूज चैनल से लेकर टीवी सीरियलों के स्टूडियो-स्टूडियो भटकते हैं मगर इस फिल्म के लिये ऐसा कुछ नहीं किया गया।

राजू हिरानी और आमिर ने इस फिल्म की कहानी की गोपनीयता बचाये रखी। मगर अब जब फिल्म पर्दे पर आ ही गई है और चार दिन में सौ करोड़ रुपए से ज्यादा कमा चुकी है तो फिल्म कुछ दूसरे कारणों से चर्चा में आ रही है। फिल्म पीके की कहानी को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं कहा जा रहा है कि फिल्म में हिंदू धार्मिक भावनाओं का मखौल उड़ाया गया है। देवी देवताओं, मंदिर, पुजारी और प्रवचन देने वाले बाबाओं का अपमान किया गया है। आमिर खान की जाति से जोड़कर ये सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं कि यदि वे इस्लाम धर्म के आड़बंरों को लेकर भी ऐसी चोट करते तो बहादुर माना जाता। एक आरोप फिल्म पर ये भी लग रहा है कि फिल्म की कहानी कुछ दिनों पहले आई फिल्म ओएमजी यानी कि ओ माई गाड़ से मिलती-जुलती है और इस फिल्म को रोकने के लिए पीके के निर्माताओं ने कई करोड़ की रकम देने की पेशकश की थी। वगैरह वगैरह।

फिल्म को लेकर उठ रहे इन सारे सवालों का सिलसिलेवार जबाव देने के लिए पहले फिल्म के निर्देशक राजकुमार हीरानी की बात की जाए। राजू हीरानी इन दिनों बालीवुड के सबसे कामयाब फिल्मकार माने जा रहे हैं। फिल्में मात्र मनोरंजन और पैसे कमाने का जरिया ही नहीं होती है बल्कि बडा संदेश देने का माध्यम भी होती हैं। वी शांताराम, विमल राय, राजकपूर से लेकर हपिकेष मुखर्जी और बासु चटर्जी तक के हमारे पुराने फिल्मकारों की इस गौरवशाली परंपरा को बढ़ाने वाले निर्देशकों में हिरानी की गिनती होने लगी है। पीके उनकी लगातार चौथी फिल्म है जो कामयाबी की ऊंचाई को छू रही है।

लोग एक फिल्म की कामयाबी के बाद ही इतराने लगते हैं, मगर पंद्रह साल में चार सुपर डुपर हिट फिल्म बनाकर भी राजू जमीन पर हैं। मूल रूप से फिल्म के एडीटर हीरानी की खासियत है कि वो बड़े से बड़े जटिल विपय को भी बहुत हल्के और सरल तरीके से डील करते है। बिना कोई उपदेश ओर प्रवचन दिए वो गहरी बात कह जाते हैं फिर चाहे वो मुन्ना भाई एमबीबीएस हो जिसमें मेडिकल कालेज के एडमीशन से लेकर डाक्टरों की असंवेदनशीलता की पर्ते उधाड़ी गयीं हो या फिर लगे रहो मुन्ना भाई हो जिसमें तकरीबन भुला दिए गए गांधीवाद को गांधीगिरी में तब्दील कर उसे दोबारा युवाओं के बीच चर्चा में लाना या फिर थ्री ईडियट हो जिसमें आईआईटी में नंबरों की दौड़ में कैसे हमारे युवा अपने सपनों का गलाघोटते दिखे हों। इन सारे गंभीर कहे जाने वाले विपयों पर राजू हीरानी ने बड़े करीने से हमारी व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए फिल्में बनाई हैं।

ऐसा नहीं है कि इन फिल्मों को लेकर सवाल नहीं उठे। चिकित्सा व्यवस्था की जब पोल खोली गई तो डाक्टरों ने ही निर्माता निदेशक को कोर्ट में घसीटने की कोशिश की। मुन्ना भाई सरीखे मवाली से जब गांधीगिरी कराई गई तो गांधीवादियों ने नाक भों सिकोड़ी। कालेज में जब नंबरों की दौड़ कम कराने की कवायद कराई गई तो शिक्षा व्यवसाय से जुड़े लोगों ने कहा कि बड़ी नौकरी तो नंबरों से ही मिलती है। कहने का मकसद ये है कि परंपरागत व्यवस्था पर किया गया व्यंग्य हास्य के साथ तिलमिलाहट पैदा करता है जो हीरानी की फिल्मों की खासियत है। इन तीनों फिल्मों में दर्शकों को पेट पकड़कर हंसते हमने देखा है। व्यंग्य की यही परंपरा हीरानी ने पीके में दोहराई है। इस बार निशाने पर हैं हमारे धर्म और उनसे जुड़े रीति रिवाज। सदियों पुराने धर्म और सामाजिक परंपराएं जो अब रुढियों का रूप ले चुकी हैं। कई बार हमें भी कोफत पैदा करती हैं।

मगर ये परंपराएं हमको उतनी अजीब नहीं लगती जितनी कोई बाहर वाला देखे। हीरानी ने इस गंभीर विषय को दूसरे गृह जिसे उन्होंने बोला कहा है के व्यक्ति या एलियन की मदद से पूरी फिल्म में विस्तार दिया है। एलियन या पीके इस धरती पर आते ही मुसीबत में फंसता है तब उसे हर आदमी भगवान जाने की बात कहकर टालता है, फिर पूरी फिल्म में पीके भगवान को ही तलाशता रहता है। ये तलाश उसकी मंदिर से लेकर मजार, मस्जिद, गिरिजाघर और गुरुद्वारे में भी जारी रहती है। सभी धर्मों के प्रतीकों को वो पहनता है परंपराओं को निभाता है मगर भगवान मिलता नहीं है, तब उसे पता चलता है कि यहां विश्व और ब्रह्मांड को बनाने वाले भगवान नहीं बल्कि लोगों ने अपने-अपने भगवान तैयार कर लिए हैं। सभी धर्म के अलग अलग पहनावे और फैशन हैं, जिनसे धर्म को पहचाना जाता है। सभी धर्मों के अलग अलग रीति रिवाज है किसी एक धर्म में सफेद कपड़े शोक में पहने जाते हें तो वही दूसरे धर्म में सफेद कपड़े शादी में पहने जाते हैं। काले कपड़ों से कहीं दुख प्रकट होता है तो कही काला रंग हमेशा पहना जाता है।

निर्देशक पीके के सहारे ढेर सारी बातें भोलेपन और तार्किकता के साथ उठाता है। जिन पर कभी हंसी आती है तो कभी रोना। इन हरकतों से तंग आकर उसे पीके उर्फ पियक्ड़ यानी कि शराब पिए हुए समझा जाने लगता है। वो कहता है कि यदि हम ईश्वर की संतान हैं तो ईश्वर अपने बच्चों से भक्ति के लिए कष्ट उठाने को क्यों कहेगा। धर्म की गलत बातों को वो रांग नंबर कहता है। मतलब भगवान को फोन तो किया गया, मगर गलत जगह लग गया है। पीके अपनी ठेठ भोजपुरी मे दकियानूसी परंपराओं पर चोट करता चलता है। धर्म के नाम पर हो रही लूट तो फिल्म में दिखाई ही है साथ ही धर्म के नाम पर हो रहा आतंकवाद भी फिल्म में हैं। इसलिए किसी एक धर्म को निशाना बनाने की बात गले नहीं उतरती। वैसे राजकुमार हीरानी की फिल्में किसी एक धर्म के इर्द गिर्द ही होती हैं। अभिजात जोशी के साथ उन्होंने इस फिल्म की कहानी लिखी है। जिसकी धीम बेतुकी धार्मिक परंपराआें पर चोट करनी रही है।

पहले वो ये बात किसी जंगली आदमी की मदद से कहना चाह रहे थे मगर बाद में उन्होंने एलियन को चुना। दूसरी दुनिया से आया व्यक्ति हमारी दुनिया के आडंबरों और कुरीतियों पर भोलेपन मासूमियत और बड़ी संवेदनशीलता के साथ बिना फूहड़ और निर्मम हुए प्रहार करते चलता है। देश दुनिया की फिल्म को रेंटिंग देने वाली चर्चित इंटरनेट साइट आईएमडीबी यानी इंटरनेट मूवी डाटा बेस ने पीके को आठ दशमलव नौ की रेंटिग दी है। जो किसी भी हिन्दी की फिल्म के लिए सबसे ज्यादा है। इसलिए पीके को मनोरंजक फिल्म के रूप में देखिए किसी धर्म पर प्रहार करने के औजार के रूप में नहीं। वैसे भी कोई धर्म किसी फिल्म में किए गए कमेंट से कमजोर नहीं होता जो ये समझ रहे हैं वो गलतफहमी में हैं।
:-बृजेश राजपूत

Brajesh Rajputलेखक :- बृजेश राजपूत ABP न्यूज़ के मध्यप्रदेश प्रभारी है व जाने-माने लेखक भी है हाल ही में प्रसिद्ध  ” चुनाव राजनीति और रिपोर्टिंग”  पुस्तक भी लिख ख्याति प्राप्त कर चुके है । 

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