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बुरहानपुर : नोटबंदी से तवायफों का कारोबार ठप्प

बुरहानपुर में मुगलकालीन पारंपरिक मुजरे का 400 वर्ष पूर्व का इतिहास है जिसे डेरेदार समाज ने यहां कायम रखा है। समाज के पदाधिकारियों के मुताबिक 1616 में मुगल सम्राट जहांगीर ने जयपुर से डेरेदार समाज की दो तवायफों को बुरहानपुर में बसाया था। डेरेदार समाज के 60 घरानों में से 22 में आज भी मुजरा किया जाता है।

बुरहानपुर : मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी की पहचान मुजरे और रेड लाइट एरिया के रूप में भी होती रही है । कुछ वर्ष पूर्व वेश्यावृत्ति का कारोवार तो बंद हो गया लेकिन 400 वर्ष पुरानी मुगलकालीन मुजरे की परंपरा को डेरेदार समाज ने यहां कायम रखा है। नोटबंदी के चलते मुगलकालीन मुजरे को इन गलियों में जीवित रखने वाले 22 परिवारों के सामने अब आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। छुट्टे स्र्पए नहीं होने पर मुजरा नहीं हो रहा।

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बुरहानपुर में बोरवाड़ी नाम से पहचाने जाने वाला यह एरिया कभी घुंघरुओं गूंज से गुज करता था शाम होते ही यहाँ मुजरे के शौकीनों की महफ़िल सजा करती थी लेकिन अब इन गलियों में सन्नाटा पसरा है। न वहां घुंघरुओं की खनक गूंज रही है और न साजों की आवाज। नोट बंदी का असर मुगलकालीन मुजरे पर सीधा दिखाई दे रहा है

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मुजरे के घुंघरू पर जीवित रखने वाले करीब 22 परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। नॉट बंदी के चलते देशभर से यहां आने वाले मुजरे के शौकीनों की संख्या घट गई है। छोटे नोटों से किसी तरह काम चल रहा है लेकिन वह इन घरों के चूल्हे जलाने के लिए काफी नहीं है।

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बुरहानपुर में मुजरा पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर पूरी शालीनता से होता है जिसे देखने शौकीन देशभर से आते हैं। इनमें मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, बेंगलुरु, पुणे, सूरत सहित कई महानगरों आने वालों की संख्या ज्यादा है। बोरवाड़ी में आमतौर पर हर दिन 5-7 मुजरे होते थे। रात 11 से सुबह के 5-6 बजे तक शौकीन यहां मुजरा सुनने में मशगूल रहते थे। रातभर स्र्पए की बरसात होती थी, वहीं अब 2-3 मुजरे ही हो रहे हैं। 500 व 1000 के नोट बंद होने से तवायफें मुजरे से पहले 100, 50, 20 व 10 स्र्पए की गड्डी देने की हिदायत दे रही हैं। छुट्टे स्र्पए नहीं होने पर मुजरा नहीं हो रहा।

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डेरेदार समाज के अध्यक्ष अमीन अहमद के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लिए गए नोट बंदी के इस निर्णय का हम स्वागत करते हैं वह कहते है देश की सुरक्षा के लिए कुछ दिन की इस मुफलिसी को हम सहने के लिए तैयार हैं।

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अमीन अहमद आगे कहते है 500 व 1000 स्र्पए के नोट बंद होने और छोटे नोटों की किल्लत से मुजरा कलाकारों की परेशानी बढ़ गई है। मुजरा नहीं होने से उनके परिवारों के सामने संकट खड़ा हो गया है । दरअसल एक मुजरे में औसत 3 से 4 हजार स्र्पए मिलते हैं। इसमें 40 प्रतिशत हिस्सा संगतकारों और साजिंदों को मिलता है और शेष 60 प्रतिशत मुजरा कलाकार (तवायफ) को। इस आमदनी से ही इन कलाकारों के परिवार चलता है। एक मुजरा कलाकार के पीछे 5 से 7 लोगों का परिवार है, जो इन्ही की कमाई पर पल रहा है।

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बुरहानपुर में मुगलकालीन पारंपरिक मुजरे का 400 वर्ष पूर्व का इतिहास है जिसे डेरेदार समाज ने यहां कायम रखा है। समाज के पदाधिकारियों के मुताबिक 1616 में मुगल सम्राट जहांगीर ने जयपुर से डेरेदार समाज की दो तवायफों को बुरहानपुर में बसाया था। डेरेदार समाज के 60 घरानों में से 22 में आज भी मुजरा किया जाता है।




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