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धारा 66-A पर नरम मोदी सरकार

social-media-logosनई दिल्ली [ TNN ] आईटी ऐक्ट की धारा 66-A पर लचीला रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार ने साफ किया है कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक विरोध या आलोचना करने पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ समय से ‘आपत्तिजनक’ कॉन्टेंट पोस्ट करने के आरोप में पुलिस और अन्य एजेंसियों के निशाने पर चल रहे साइबर वर्ल्ड को केंद्र के इस रुख से राहत मिल सकती है।

केद्र ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर राजनीतिक असहमति जताना या आलोचना करना किसी की गिरफ्तारी का आधार नहीं हो सकता। सरकार ने यह साफ किया कि आईटी ऐक्ट का सेक्शन 66-A उन लोगों से निबटने के लिए है, जो दूसरों को शारीरिक या सांस्कृतिक रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में इस कानून के आधार पर हर किसी पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

सूत्रों ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सीधे दखल के बाद सरकार ने इस मामले पर यह रुख अपनाया है। सूत्रों का कहना है कि विभिन्न मीटिंग्स के दौरान पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी की मजबूती से पैरवी की है। पीएम का मानना है कि आईटी ऐक्ट को संविधान के आर्टिकल 19(2) के अनुरूप देखा जाना चाहिए, जो कि नागरिकों को अभिव्यक्ति की पूरी आजादी देता है।

इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स ने सीनियर ऐडवोकेट के.के. वेणुगोपाल के माध्यम से कोर्ट से कहा कि लोकतंत्र में सरकार के पास किसी कॉन्टेंट को बैन करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसे मिसयूज किया जा सकता है। इस पर अडिशनल सलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आतंकवादी संगठन आईएस के ट्विटर हैंडल को चलाने के मामले का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार को कॉन्टेंट हटाने के लिए कहने का पूरा अधिकार होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक असहमति जताने या किसी विषय पर चर्चा करने पर ऐक्शन नहीं लिया जाना चाहिए।

क्या है आईटी ऐक्ट की धारा 66-A?
आईटी ऐक्ट की धारा 66-A के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कंप्यूटर या संचार उपकरण के जरिए ऐसी सूचना भेजता है, जो आपत्तिजनक या डराने वाली हो, तो उसे 3 साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है। इस धारा का विरोध करने वालों का कहना है कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत मिले अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर अंकुश लगाता है।

तुषार मेहता ने कहा कि यह इकलौता ऐसा मीडिया है जिसपर सेंसर नहीं है और इमर्जेंसी के दौर में यह होता तो वह कामयाब ही नहीं हो पाती। मेहता ने कोर्ट को बताया कि बहुत कम मामलों में ही सरकार ने सर्विस प्रोवाइडर्स से कॉन्टेंट हटाने को कहा है और इसके पीछे भी वाजिब वजहें रही हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई ट्वीट या फेसबुक पोस्ट लोगों को आतंकी संगठन में शामिल होने के लिए प्रेरित करती है तो उसे हटाने के लिए कहने का सरकार के पास अधिकार होना चाहिए।

गौरतलब है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के निधन के बाद साल 2012 में मुंबई बंद का फेसबुक पर विरोध करने वालीं दो लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। हालांकि बाद में इन लड़कियों को रिहा भी कर दिया गया था। इसी तरह की एक और घटना महाराष्ट्र के ही पालघर में कुछ दिन बाद घटी थी, जिसमे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे के खिलाफ फेसबुक पर एक पोस्ट के लिए एक 19 साल के लड़के से पूछताछ की गई थी। इसके बाद केंद्र की तत्कालीन सरकार ने राज्यों की पुलिस को सुझाव दिया था कि उच्च अधिकारियों की मंजूरी के बिना आईटी ऐक्ट के तहत गिरफ्तारी न की जाए।

 

 

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