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बार्डर फ़िल्म के इस गाने पर रो पड़ी शहीद की पत्नी

खंडवा : खंडवा में प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस शहीदों की पत्नियों से मिलकर भावुक हो गई। उन्होंने मंच पर ही शहीदों की पत्नियों के आंसू पोछे और गले लगाकर सांत्वना दी। श्रीमती चिटनीस ने कहा कि आगे से शाहिद की पत्नी को शहीद की विधवा नही कहा जाए। उन्हें अमर शहीद की पत्नी कहा जाए, जिससे उन्हें गर्व की अनुभूति हो। मंत्री शाहिद के परिवारों से मिलने उनके घर भी गई।

मध्य प्रदेश सरकार ने 14 अगस्त को शहीद सम्मान दिवस घोषित किया । आज गौरी कुंज सभागृह में महिला बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस ने शहीदों की पत्नियों को शॉल श्रीफल देकर सम्मानित किया । सम्मान के दौरान बार्डर फ़िल्म का गाना चल रहा था। “संदेशे आते है, मुझे बुलाते है,तुम घर कब आओगे…. इस मौके पर शहीदों की पत्नियों की आंखों में आंसू आ गए और माहौल गमगीन हो गया। मंत्रीजी ने पहले खुद को संभाला फिर शाहिद की पत्नी की आंखों से आंसू पोछते हुए उन्हें गले लगा लिया। यह दृश्य सभागृह में देखने वालों को भी शहीदों की कुर्बानी की याद दिला गया।
कार्यक्रम में मंत्री ने मंच से कहा आज से हम ये प्रण ले कि शहीद की पत्नी को विधवा कहने की बजाय उन्हें गर्व से शाहिद की पत्नी कहेंगे।

सरकार की पहल पर आजादी की पूर्व संध्या पर शहीदों के परिवारों को बुला कर सम्मानित किया गया । इस मौके पर खंडवा में आंतक विरोधी दस्ते के शहीद सीताराम यादव और ग्वालियर के शहीद कैप्टन उपमन्यु सिंह के परिवार का सम्मान किया गया।,इस कार्यक्रम में शहर के नागरिक ओर स्कूली बच्चे भी शामिल हुए ।

कार्यक्रम के बाद मंत्री अर्चना चिटनीस शाहिदो के घर पहुची । पहले सीता राम यादव के घर पहुचकर शाहिद की पत्नी से हाल चाल जाने । शाहिद सीताराम की पत्नी ज्योति यादव ने मंत्री को समस्या बताई । मंत्री अर्चना चिटनीस इसके बाद कैप्टन उपमन्यु की पत्नी मोनिका सिंह से मिलने पहुची । कैप्टन अभिमन्यु कश्मीर में आतंकियों से मुठभेड़ में 2010 शहीद हुए थे ।

मोनिका सिंह ने कहा कि शाहिद के परिवारों को साल में एक या दो बार याद किया जाता है , बाद में भूल जाते है । ऐसा नही होना चाहिए । साथ ही इन्होंने कहा कि कोई ऐसी हेल्प लाइन हो या संस्था बने जो शहीदों के परिवारों को होने वाली हर परेशानियों को दूर कर सके । उन्होंने कहा कि हर सैनिक की पत्नी इतनी ताकत रखती है कि वह सभी तरह के दबाव झेलने की आदि हो जाती है। उन्हें सिम्पेथि के शब्दों की बजाय समाज से गर्व के शब्द की आशा रहती है।

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